मॉनसून और मैं

रेलगाड़ी का सफर, अगर कोई परिचित सहगामी न हो तो, काफी उबाऊ हो जाता है. वैसे यह कहना भी गलत न होगा की कई बार सफर में अपरिचित भी वार्तालाप के क्रम में परिचित बन जाते हैं और खासकर रेलगाड़ी में ऐसी घटनाएं तो बहुत ही आम है. लोग इस तरह बातो में मशगूल हो जाते हैं मनो जन्मों जन्मांतर से उनका संबंध रहा हो और रेलगाड़ी तो
मात्र उनके मिलन की वजह बनी हो. भारत में क्रिकेटर और राजनीतिज्ञ उन बातो के केंद्र में रहते हैं. हालांकि अगर सिनेमा के कुछ कलाकारों को यदि मैं इस लीग में शामिल न करूँ तो उनके साथ बेईमानी होगी.
हाल ही मैं एक ऐसी ही रेलयात्रा से कलकत्ता (जिन्हे पसंद न आये कोलकाता पढ़िए) गया था. मैं भारत के ऐसे क्षेत्र से हूँ, जहाँ के लोगो को बात करने में बड़ा मज़ा आता है. बिना बात किये तो हम रह ही नहीं सकते. बहुत बार आपने सुना होगा कि आपको जीवन में खुश रहना है तो वैसे काम को अपना प्रोफेशन बनाइये जो आपके दिल के करीब है और जिसे करने में बड़ा मज़ा आता हो, फिर काम, काम नहीं लगेगा. पर हमारे लिए अफ़सोस की बात है कि जो काम हमें पसंद है (गप्प करना समझिए) उससे पेट तो नहीं चल सकता. इसीलिए हमें दूसरे काम ढूंढने पड़ते हैं, और फिर उसमे अपना १००% देना तो नाइन्साफ़ी होगी.
खैर मैंने भूमिका बहुत लम्बी खींच दी, सीधे मुद्दे पे आता हूँ. इस बार कि यात्रा में, अपने स्वाभाव के विपरीत, मैंने चुप रहने को तवज्जोह दी. हालांकि ऐसा नहीं था कि मैं पूरी तरह चुप रहा, अंतर सिर्फ इतना था कि इस बार लोगों के बजाये, अपने स्मार्टफोन से (के जरिये नहीं) गुफ्तगू में लगा रहा. और फिर जो निष्कर्ष निकला आपके सामने है. समझ में आये और अच्छा लगे तो ताली मत बजायेगा, सुन नहीं पाउँगा:-) इस बार की कविता का genere (इसके जगह शैली भी उपयोग कर सकता था, पर वो फील नहीं आ रहे थी) भी थोड़ी अलग है .
मैं वहीं हूँ
मैं जहाँ था
जहाँ तुम हो
मैं वहीं हूँ
खुद से पूछो
तुम कहाँ हो ?

सावन भी वही है
बादल कुछ नये है
पर बूंदों का एहसास
नहीं है बदला
क्या तुम भी नहीं बदले ?

वो पहली सड़क
जहाँ संग दो कदम चले थे
कुछ अलग सा
दिख रहा है
समय की मोटी परते
मानों उसको ढक रहा है
क्या तुम उसको ढकने दोगी ?

दिवाली अब भी आती है
होली भी बीत जाती है
मैं एक ही दीया जलाता हूँ
क्या तुम भी
एक ही रंग लगाती हो ?

वो जो ऐहसास
सीने में दबाए रख था
पूरे जग से
छिपाए रख था
तब चिंगारी सी सुलगती थी
अब ज्वाला सी धधकती है
क्या तुम्हारी धड़कन तुमसे
नहीं कुछ कहती है ?

सोते ही सपने आते हैं
तुम , जगते ही चली जाती हो
पहले रातों को सोता था
सपनो में ही मिलने के बहाने
अब दिन में भी लेट जाता हूँ
मन में जो मेरे इतना चलती हो
क्या फिर भी नहीं तुम थकती हो ?

अबकी जो मेघा आया है
संग अपने कुछ ऐसी फुहारे लाया है
भींगने से न खुद को रोक पाओगे
और यदि भींग गए
तो दौड़े चले आओगे
क्या इस बारिश को तुम रोक पाओगे?

…………अभय…………

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13 thoughts on “मॉनसून और मैं

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