धीरज …

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Image Credit: Webneel

 

धीरज …

मुस्कुराते क्यों नहीं
क्या कोई जख़्म बड़ा गहरा है
या आज लबों पर तेरे
किसी गैर का पहरा है?

खोयी तेरी निगाहें
क्यों उतरा तेरा चेहरा है
तेरी आँखों में पानी
किसी झील सा ठहरा है!

साँसे क्यों बेचैन सी
क्यों नींद तेरी उजड़ी है
लेकर किसी का नाम शायद
कई रातें तेरी गुज़री है!

धीरज रखो कि,
जो सावन है बीत गया
वापस फिर से आएगा
ख्वाब थे जो बिखरे से
फिर से उन्हें सजायेगा
जब वापस वो आएगा…..

……..अभय……..

 

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22 thoughts on “धीरज …

  1. Pingback: अल्हड़ होली | the ETERNAL tryst

  2. ye kavita to maine padha tha …..pata nahi mere comments kahan gaye……
    laajwab hai…..aise jaise saamne baithi aur baaten chal rahi ho…..

    खोयी तेरी निगाहें
    क्यों उतरा तेरा चेहरा है
    तेरी आँखों में पानी
    किसी झील सा ठहरा है!

    Liked by 1 person

    1. धन्यवाद भाई कि आपको मेरी कविता इस योग्य लगती हैं कि आप दुबारा आकर पढ़ते हैं! अपने कमेंट किया होगा उस पोस्ट पे जिसको मैंने re-blog किया है. वहाँ पर वह तंदरुस्त अवस्था में होगा.. 🙂

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