मैं और मेरी नाव

शुक्रवार की रात से अगर कुछ अच्छा हो सकता है तो वो है शनिवार का दिन, psychologically थोड़ा सुकून रहता है कि चलो एक और दिन तो बचे हैं छुट्टी के. आज सवेरे बाइक लेकर मॉर्निंग वॉक पर निकला :-P. जैसा कि मैंने पहले भी शायद किसी लेख में लिखा है कि मुझे नदी किनारे अपने शहर की मरीन ड्राइव पर, जो शायद 10-12 किलोमीटर लम्बी होगी, सुबह सुबह गाड़ी चलाने में मज़ा आता हैं. उसी मरीन ड्राइव पर एक स्थान ऐसा भी हैं जहाँ दो नदियाँ मिलती हैं. वहां बैठने का प्रबंध भी हैं. मैं अक्सर वहां जाता हूँ तो कुछ देर रुकता हूँ. आज भी रुका.

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I was discussing about the same place, It is known as “Domuhani“, meaning two mouthed. A term to refer meeting of the two rivers. Clicked it few months back.

वातावरण, जो दिन में आज-कल काफी गर्म हो जाता हैं, सुबह में काफी सुहावना सा हो रहा था. कोयल उसमें मिठास घोल रही थी. कल रात की तेज बारिश और तूफ़ान के बाद आम के पेड़ से काफी मंजर नीचे गिरे हुए थे, पर उनकी अलग से खुसबू अब तक आ रही थी, एक पका हुआ बेल भी गिरा हुआ था, मैं उठाने जा ही रहा था कि एक अधेड़ उम्र की माता जी ने उस पर दूर से ही चिल्लाकर कब्ज़ा जमा लिया, मैंने उठाकर उनको दे दिया और बोला कि मैं आप ही के लिए उठा रहा था 😛 😛 …..वो भी मेरे परोपकार को  समझ रही थी . उन्होंने मुस्कुरा के कहा चलो रहने दो , मैंने भी अपनी दांत दिखा दी.
उसके बाद कुछ देर बैठा, तो कुछ विचार निकले…फ़ोन पर ही ड्रॉफ्ट कर लिया. थोड़ी संसोधन के पश्चात आपके सामने प्रस्तुत है…अपने मनोभाव को मुझ तक पहुँचाना मत भूलियेगा

Boat
Google se uthaya

मैं और मेरी नाव 

मैं नदी के इस किनारे
तुम बैठी थी उस पार
बारिश का मौसम
बाढ़ थी आयी
नदी हुई विकराल
पर मुझे तो था आना
कैसे भी तेरे पास
तैरकर जाना मुश्किल था
नदी में प्रचंड बहाव था
सोचा एक नाव बनाते हैं
सहारे नाव के
तेरे पास हो आते हैं
लग गया नौका बनाने में
सुध नहीं रही ज़माने की
ऐसा व्यस्त हुआ कि
मौसम तक बदल गया
बारिश बीत गयी
ग्रीष्म चरम पर आ गयी
नदी बरसाती थी
तलछटी तक वो सूख गयी
आज मेरी नौका तैयार है
विडंबना ऐसी कि
नदी में जल नहीं है
न ही तुम खड़ी हो उस किनारे पर
मैं हूँ और संग मेरे, मेरी नाव ….

…………..अभय ……………

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47 thoughts on “मैं और मेरी नाव

Add yours

        1. No need to apologise mate. Your intention is justified, yet I recommend you not to support anyone without knowing their intentions ☺️
          Let me tell you something about this write up. It is basically a poem in Hindi, a prominent language of India. Let me summarize it. The setup is that a hero is in one side and his beloved one is on the other side of the river. River is swollen due to flood. So he can’t cross the river by swimming. Hence he thinks of making a boat. Soon he starts making it. But he is so engrossed in it that he is unaware of its surrounding. It takes a lot of time to make the boat and in between, season changes. A hot dry season comes and the ephemeral river is dried up. In the mean time his boat is prepared and first time he his seeing the surrounding. He is shocked to see that the river is dried up due to extensive heat. He is perplexed to see that now when his boat is prepared there is no water in the river nor he is able to see his beloved one on the other side of the water body.
          That’s it.
          Namaste 🙏

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      1. भाई जी —–अपनी पत्नी की पीड़ा को देख उसे याद कर के किसी ने पहाड़ तोड़ रास्ता बना दिया——-आपके कलम ने एक ऐसे नायक को जन्म दिया जिसने अपने महबूबा से मिलने को नाव बनाने में इतना मसगुल हो गया कि उसे इतना भी मालुम नहीं चला की कब कौन सा मौसम बिता——- अफशोस की उसकी माशूका ना मिली——–क्या मैं सही समझा——?

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    1. Thank you Radhika for your kind words. I will try to incorporate English translation in upcoming posts, if time permits me. Thank you for your valuable suggestions. Keep visiting the post. ☺️

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  1. This is so beautifully written..I know it does not make sense but for me it is such a nice lesson that a man ahould not get so engrossed in his Karma that he forgets his goal and the destination point.I really liked this post..Good job Abhay..

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    1. Agree with you completely without a tinge of doubt. Even I grapple with this and hope many more people do. Gita gives the answer to this question by two words. “practice” and “detachment”.

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          1. छोटा सा नहीं बहुत खूबसूरत सा जगह है जमशेदपुर। मैं रांची और घाटशिला में रही हूं और अक्सर जमशेदपुर भी जाती थी। स्वर्णरेखा नदी की बात बता रहे हैं क्या आप?

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            1. अरे आप तो मेरी पडोसी निकलीं ☺️ हांँ यह स्वर्णरेखा और खरकाई का संगम स्थल है। सुंदर तो काफी है, इसमें कोई संदेह नहीं!

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