स्मरण

स्मरण

आशंकाओं से घिरे पहर में ,

   दुविधाओं के बीच भंवर में,

     दर्द भरी आहों में,

      या सूनी राहों में

         मरुभूमि के टीलों में

           नेत्र बनी जो झीलों में

             या बंजर मैदानों में

             सूखे खेत खलिहानो में

                स्वजनित विपदाओं में

                 या प्राकृतिक आपदाओं में

जब जब हम खुद को

   हारा हुआ पाते हैं

     नेत्र स्वतः बंद हो जाते हैं

       वंदन को हाथ जुड़ जाता है

         कभी अहम् से था जो मस्तक ऊँचा

          वह  भी झुक जाता है

            दुःख की घड़ी में तो अनायास ही

              ध्यान प्रभु का आता है

                पर सुख के पहर में स्मरण ईश्वर को

                     शायद ही कोई कर पाता है

                                                                                 ~अभय

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28 thoughts on “स्मरण

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  1. Bilkul sahi Abhay! We all remember him only when the days are tough. When everything is smooth going, we give ourselves the credit for it and forget to thank him.
    Your poem is such a beautiful portrayal of the human mind towards the divine 🙂

    Liked by 1 person

  2. बहुत अच्छा लिखा है आपने। सही है हम निराशा के वक्त ही इश्वर को ज्यादा याद करते है।जब सारे द्वार बंद हो जाए तब ही इश्वर का द्वार दिखाई देता है।

    Liked by 1 person

  3. Very true lines:
    दुःख की घड़ी में तो अनायास ही
    ध्यान प्रभु का आता है
    पर सुख के पहर में स्मरण ईश्वर को
    शायद ही कोई कर पाता है
    We humans get so selfish at times that we only remember God during our hardships while during euphoria moments we are so busy celebrating or rather I would say that we are so lost in our own created fake world that we forget being grateful towards the Almighty.

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  4. बिलकुल सही कहा आपने, हम सुख के समय ईश्वर को भूल जाते है | एक और बात जोड़ना चाहूंगा, असल मे हम ना सिर्फ ईश्वर को बल्कि जिनका हमारी कामयाबी के पीछे हाथ है, अक्सर कर उन को भी ख़ुशी के समय भूल जाते है |

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