ओ माँ ..

समयाभाववश कविता को उतना लयबद्ध नहीं कर पाया, जितनी मेरी अपेक्षा थी. पर भावनाएं हर क्षण लय में ही हो, यह आवश्यक नहीं. सो मैं इस कविता को यथारूप प्रेषित कर रहा हूँ, पहुँचाना मत भूलिए कि कैसी लगी..

ओ माँ ..

बिन अपराध किये भी जग के
कई आरोप सह जाता हूँ
एक माँ की नज़रें ही है जहाँ
दोषी रहकर भी, हर पल खुद को
मैं निर्दोष पाता हूँ!

बिना शर्त सम्बन्ध की बातें,
कहाँ सुनने को मिलती हैं!
एक सम्बन्ध है इन शर्तों से ऊपर
माँ का स्नेह मुझपर,
हरक्षण झर झर कर बहती है!

जटिल जगत है, कुटिल है दुनियाँ
षड़यंत्र हर पग पर मिलते हैं
माँ की निर्मल सरलता
और स्नेहमयी आशीर्वचन से
हर पग फूल खिलतें हैं

……अभय…..

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57 thoughts on “ओ माँ ..

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  1. माँ ——-जितना भी लिखा जाए जितने तरह से लिखा जाए काम होगा। सच कहा ओ केवल माँ ही है जहाँ गुनाहगार होकर भी इंसान बेगुनाह खुद को पाता है। बहुत सुंदर माँ की ब्याख्या—।

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      1. नापसंद की कोई जगह ही नहीं—हम इस वेबसाइट पर एक परिवार हैं—एक दूसरे की कमी बता सकते हैं ,तारीफ़ कर सकते है—-नापसंद बिलकुल नहीं। आपने बढ़िया लिखा—सुक्रिया

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  2. Bhut Sundar abhivyakti Hai
    Ye hi ek mauka Hai JB hm maa k liye kuch vyakt kr pate hain 😉😉😉
    और हां आपके उस प्रारम्भ के लिए यही कहूंगा
    ये लिखावट बनावट
    सब धरी रह जाती है
    दिल की अभिव्यक्ति कुछ ऐसी ही होती है
    लय बनाने से कुछ नहीं होता 😀

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    1. शुक्रिया! पर मैं सच कहूँ तो इस मौके पर भी माँ के समक्ष शायद व्यक्त न कर सकूँ! ☺️

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  3. Bahut sunder poem likhi he abhay ji”the ETERNAL tryst.magar bahut afsos hota he jaan ke -aap rohit ji ki “bharosa”naam ki poem ka majaak banaate ho.do you know-what is love.it is not like changing dresses time to time.understand.

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    1. Thank you Aruna Ji for your compliment. Pleased that you liked it.
      No, I don’t know what the Love is.
      And by the way, I have to revisit the Rohit’s blog to see my comment. ☺️
      It was just an attempt to create humor and I think you have taken it horribly wrong.

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  4. “एक माँ की नज़रें ही है जहाँ
    दोषी रहकर भी, हर पल खुद को
    मैं निर्दोष पाता हूँ!”…..wow!👏…..but yeh line☺👌👌

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