भूमिपुत्र

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Image Credit: Internet

भूमिपुत्र

मेरे देश में अब भी कृषक

भूखे पेट सोता है

हत्यारे कर्ज के बोझ तले वह

बिलख बिलख कर रोता है 

 

सरकारें आती हैं

सरकारें जाती हैं

उनकी वयथा फिर भी

जस की तस रह जाती हैं

 

हमे शर्म नहीं क्यों आता जब

खुद को हम कृषि प्रधान देश कहते हैं

कृषकों के नाम पर  राजनीति करके

नेता केवल अपनी जेब भरते हैं

 

डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बनेगा

इंजीनियर का बेटा खुद को इंजीनियर कहेगा

पर कृषकों की यही व्यथा रही तो

देश में न कोई भूमिपुत्र बचेगा

 

तो क्या सॉफ्टवेयर हम खायेंगे ? 

या बढ़ते हुए GDP का गुण जाएंगे ? 

या डेवलपिंग कंट्री के तमगे से  

खुद को सांत्वना देते रह जायेंगे

……….अभय…….

 

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38 thoughts on “भूमिपुत्र

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    1. शुक्रिया मधुसूदन जी, लेकिन किसानों की व्यथा काफी चिंताजनक है!
      दुष्यंत जी की कविता ” हो गई है पीर पर्वत सी पीघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए” , काफी प्रासंगिक लग रही है

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      1. बिलकुल अभय जी–…सभी लोग गांव से ही शहर में आये हैं परन्तु कुछ भाइयो की पीढियां शहर में बीत जाने के बाद भी किसानों की दुर्दशा को आज भी समझ जातेे हैं जबकि मैं गांव से आज भी जुड़ा हुआ हूँ—–किसानों की जैसी दुर्दशा और दर्द आज है शायद किसी का नहीं है। जब भी कोई किसान का नाम लेता है अनगिनत दर्द आँखों के सामने दिखने लगता है।

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  1. I wish we are able to repay our famers debt!! It’s takes pain, time and hard work to harvest the crop and how well we waste food in seconds.. as government are responsible for their situation . We too are because we have got that food easily so respect is paid!!

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    1. So true Radhika, in reality the sympathy towards them pouring from all corners but non is translating in to effective policy implementation. And the irony is that last year the crop yield in India was huge, yet high yield resulted in lower price. This is where government had to step in.

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  2. It is very easy to write on flourishing conditions of our nation however it requires a vigilant eye and a sensitive heart to write on such heart wrenching reality.Glad you chose to throw light on our great farmers on whom are survival depends!!

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