मुखौटे

आज मैंने फिर से इतिहास में डुबकी लगाई, और तभी अचानक मेरी, एक पुरानी कविता बाहर आयी …चाहें तो आप भी डुबकी लगा आयें, या इसे ही पढ़कर इसमें, अपने भावों को पायें  …. 🙂 😉

मुखौटे

चेहरे कम मुखौटे ज़्यादा

दिखतें हैं इस बाज़ार में

हम बेहतर हैं तुमसे

सभी जुटे हैं इसी प्रयास में ||1||

 

जिसका चेहरा जितना बनावटी

वह उतना ही सफल है

छल प्रपंच से भरे खेल में

उसकी दांव प्रबल है ||2||

 

अपनापन का भाव कहाँ यहाँ पर

केवल स्वार्थ निहित है

भावना से भरे व्यक्ति की

हार यहाँ निश्चित है ||3||

…………अभय…………

 

35 thoughts on “मुखौटे”

    1. Hello Shaloo! I had written this one at a time when I entered to corporate world, just after passing out from college. This composition, by and large, came as a result of my perception of superficial nature in new world. But still I believe that every human being is intrinsically hankering for emotional well-being.
      Thank you for reading the post.

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  1. बहुत खूब। बहुत ही अच्छा लिखा है अभय जी। आपके भावना शब्द दो लाइन याद आ गया।
    जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहता रसधार नहीं। वह नर नहीं नर है निरा और मृतक समान है।
    अपना का भाव – – – – – – – – – – स्वार्थ निहित लाइन बहुत ही भावों से भरी और अच्छी लगी हमें।

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  2. Emotions well worded!
    Oh how I wish I could change this bitter truth:-
    भावना से भरे व्यक्ति की
    हार यहाँ निश्चित है ||

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  3. वाह—बहुत ही बढ़िया—-
    जिसका चेहरा जितना बनावटी
    वह उतना ही सफल है
    छल प्रपंच से भरे खेल में
    उसकी दांव प्रबल है …..

    मतलब से जुड़ते हैं,
    मुखौटा पहने इंसान का,
    मतलब निकलते ही हम,
    उनका किस काम का,
    जाते-जाते सब,
    नकली मुखौटा छोड़ जाते हैं,
    हम भावनाओ से भरे,
    उनकी यादों में रोते रह जाते हैं।

    Liked by 2 people

    1. अरे क्या बात है भाई ….बहुत खूब

      …..जाते-जाते सब,
      नकली मुखौटा छोड़ जाते हैं,
      हम भावनाओ से भरे,
      उनकी यादों में रोते रह जाते हैं…..

      जवाब नहीं आपका……

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        1. मैं कहाँ लिखता हूँ साहब, आप शब्दों के खिलाड़ी हैं, मूल कृत से भी श्रेष्ठ होती है आपकी रचनायें। ये मैं ऐसे ही नहीं कह रहा☺️

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          1. Sukriya Abhay ji hausla badhaane ke liye………meri kavitaon ki fehrist men lagbhag 10-15 kavitayen aisi hai jo aapke kavita se prerit hai……aapke likhe shabd bahut hi gahra chhap chhodte hain….main bhi aise nahi kah raha………..waise aapne meri taarif ki use main tahe dil se sweekar karta hun……..sukriya aapka.

            Liked by 1 person

  4. जो छोड़ गए वो मुखौटे
    उसी को पहन
    हम दर्द दुनिया से छुपाते हैं
    रोते हैं मगर उसी मुखौटे
    में हम भी मुँह छुपाते हैं ।। अच्छा प्रयास है पर सच्चाई यह है की हम से तो आइना भी सच नहीं बोलता तो ख़ुदने कौन सा मुखौटा लगाया है यह नहीं जान पाती हूँ ।

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