जाल ..

“मानव ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ रचना है” एक वक्ता को जैसे ही मैंने कहते हुए सुना, मन में सैकड़ो ख्याल सरपट दौड़ने लगे. अब क्या कहूँ, कोई योगी तो हूँ नहीं कि एक बार में एक ही ख्याल से मनोरंजन कर सकूँ या विचारशून्यता की सतत स्थिति में रहकर परम आनंद का अनुभव ले सकूँ! हाँ भाई, विचार शून्यता भी आनन्द है..कभी खुद अनुभव नहीं किया तो उनसे पूछिये जो विचारों के अनंत प्रहार से सतत छत-विछत होते रहते हैं और सोचते हैं कि मन में कोई विचार न आता तो श्रेयस्कर रहता..

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खैर, वापस विषय वास्तु पर आते हैं “मानव ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ रचना है”. क्यों भाई? यदि कुत्ते आपस में बात कर रहे होते तो वे भी यह कह सकते थे “कुत्ते, ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ रचना है”!!! या फिर गधे!!! या शेर !!!

पर मनुष्य उनकी बातों पर विश्वास नहीं कर पाते. क्यों? कारण स्पष्ट है. मानव अपने विचारों का उपयोग करके जितने भी जीव हैं उन सब पर नियंत्रण कर सकता है. अपना प्रभुत्व जमा सकता है. अपने बुने हुए जाल में अन्य सभी जीवों को फ़ांस सकता हैं. अन्य जीव ऐसा नहीं कर सकते. क्या कभी सुना हैं कि मनुष्य मछली के जाल में फँस गया!!! हा!!! लोग पागल ही कहेंगे, यदि आपने अपने मन में ऐसा विचार भी लाया तो!!!

तो फिर मनुष्य महान क्यों ? और अधिक गहन चिंतन करने पर मेरे मन में यह विचार कौंधा. ब्लॉग पर विचार व्यक्त करने कि आजादी होती है, चाहे विचार कैसा भी हो, जो दूसरों को आहत न करे. और भारतीय संविधान के आर्टिकल 19(2) के तहत यह मेरा मौलिक अधिकार भी है. अब आप सम्भालिये इसे..

मनुष्य महान इसलिए कि यह वह जाल बुन सकता है, उस जाल कि विशेषता यह है कि अगर अन्य प्राणी जाल बनाते तो उसका उपयोग वह दूसरे प्रजाति को फांसने में लगाते. पर मनुष्य तो श्रेष्ठ जीव हैं, तो कुछ अलग तो बनता है. मनुष्य श्रेष्ठ इसलिए कि वह आपने बनाये जाल में खुद ही फँस सकता है और अक्सर ही फँसता हैं, खुद ही फँसकर उसमे तड़पता है, छटपटाता है, और जब कष्ट असह्य हो जाता है, तो वह पुनः मुक्ति का मार्ग ढूँढता है….

खुद ही जाल बुनो, उसमें फँसो और फिर मुक्ति का मार्ग ढूंढो…यह चक्र मजेदार है न??

चलिए अभी जाते-जाते संस्कृत की एक उक्ति आपके लिए छोड़ जाता हूँ.. ज्यादा चिंतन मत कीजिये.. क्योंकि अत्यधिक चिंतन भी एक जाल हैं

सा विद्या या विमुक्तये।
ज्ञान वह है जो मुक्त कर दे!!

13 thoughts on “जाल ..”

  1. Great post dear Abhay. This perfectly fits into my line of thinking. In my articles “Assembly of God In Hinduism” I wrote:

    our perception of God as being a creator with His mystical powers which sustains the universe, can not comprehend many universal and natural phenomenons.

    One reason is that man is just one of the millions of creatures who in actuality is microscopic in His infinite and colossal universe. Still our imaginations and metaphysical attempts know no boundaries to fathom His magnanimity.

    For a moment let us compare a human being to a small ant who is trying to study God up there in the celestial world.

    But we don’t. Because this has been ingrained in our cognitive senses that man is the favored work of God as being the most intelligent among all His living creations. And that we are the only ones capable of studying His multi-dimensional but conceptual-based existence.

    Perhaps, that little ant may be thinking the same. It may be believing humans walking tall up on the ground are the unintelligent creatures. Or we are the gods for the ant. Who knows!

    I like the originality in your writing. Thanks for sharing.

    Liked by 1 person

    1. Very nice explanation Sir! I completely endorse your views. With imperfect and limited senses, I don’t think it will be possible to completely know The Perfect.
      Thanks for your opinion.

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  2. खुद ही जाल बुनो, उसमें फँसो और फिर मुक्ति का मार्ग ढूंढो…यह चक्र मजेदार है न??
    बिल्कुल मजेदार है।इसमें सच मे हमें महारथ हासिल है—–जिसकी सजा भुगतना तो हमें ही पड़ेगा।बिल्कुल सत्य लिखा और सटीक लिखा आपने अभय भाई।

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  3. bhut badiya likha hai सटीक शब्दों में काफी अच्छा लिखा,,manav apna jaal khud bnata hai or kbhi kbhi dusro ko sahara lekr apne jaal mei dusro ka fasta hai dusro ki madad se or aakhir mei jeet b jaye to pta b nhi chlta ..aakhir mei kehta hai duniya badi khrab hai

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    1. शुक्रिया श्रुति, मेरे लिखने के तरीके को पसंद करने के लिए😊

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