अहेतु की कृपा ..

हैरान हूँ!
तेरी सृष्टि से अनजान हूँ
पहेलियों से परेशान हूँ
दर दर भटकता हूँ
छोटे से प्रश्नों पर भी अटकता हूँ
तुम्हें हर जगह ढूँढता हूँ
आँखे भी मूँदता हूँ
पर तुम हो कि तुम्हारा कोई
पद चिन्ह नहीं दिखता
मन से मेरे संशय का
बादल भी नहीं छटता
शास्त्रों को सुना
तत्वदर्शियों से मिला
तुम से मिलने का मार्ग भी जाना
अफ़सोस है कि मैंने अब तक
खुद को न पहचाना
मार्ग मिलन का तुमसे
दुर्गम है, कठिन है
पर हम तो सामर्थ्यविहीन हैं
अहेतु की कृपा का मैं हूँ प्रार्थी
कब कृपा होगी मुझपर भी, हे पार्थ के सारथी !!!

…….अभय ………

शब्द सहयोग:

अहेतु की कृपा : Causeless Mercy
तत्वदर्शियों: Those who know the ultimate reality
सामर्थ्यविहीन : Without having any capacity
पहेलियों : Enigma
संशय: Doubt

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32 thoughts on “अहेतु की कृपा ..”

  1. “Krishna’s causeless Mercy is always there. If we take up that causeless Mercy a little seriously than further causeless Mercies are bestowed one after another unceasingly. Krishna is more anxious to bestow His benediction upon us than we are ready to take it. If we therefore sincerely engage ourselves in Krishna Consciousness activities, certainly we will advance more and more by the causeless Mercy of the Lord.”

    (Srila Prabhupada Letter, February 3, 1970)

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  2. आखिर हनुमान जी जाग गए। बहुत उत्तम सोच और बेहतरीन रचना।
    कुछ पंक्तियाँ मेरी भी बन गयी—–

    हे रब मैं अनजान पथिक,
    मैं सच क्या ना आडम्बर जानूँ,
    तूँ पत्थर,पाषाण बना मैं
    ना इंसा ना रब पहचानूँ,
    दुर्गम पथ असहाय बटोही,
    राह दिखा कोई महायोगी,
    सब कहते हैं जान राम से,
    आर्यव्रत की शान राम से,
    त्रयी,त्रिमूर्ति,रघुपुंगवह,
    हमसब की पहचान राम से,
    रब है या पूर्वज ना जाने,
    पर तुमको हम अपना मानें,
    जिससे हम और अवध शुशोभित वही पड़ा क्यों टाट में,
    वाह रे भारत के वासी हम सोते कैसे ठाट में,
    वाह रे भारत के वासी हम सोते कैसे ठाट में।

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    1. काहे का हनुमान जी! वो तो भक्त शिरोमणि हैं। हम तो कुछ भी लिख लेते हैं वो भी आप लोगों की प्रेरणा से!
      आपकी रचना तो कई बार मूल कृति से भी आगे निकल जाती है

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      1. दुर्गम पथ पर वही चलते हैं
        हनुमानजी को ही रामजी मिलते हैं।
        हम सब में एक हनुमान छुपे,
        हे राम कहाँ तुम सो बैठे,
        हम राह निहारे गोकुल में,
        हे श्याम कहाँ तुम खो बैठे।

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            1. मतलब मेरे वक्तव्य का जवाब अब कविता के रूप में देंगे तो मैं इतना बड़ा कवि तो हूं नहीं कि आप के वक्तव्य का जवाब कविता के रूप में दे पाऊं इसलिए चुप ही रहना ठीक है😂🙏

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              1. हा हा हा।मैं भी कवि नही भाई बस कभी कभी निकल जाता है। आप यूँ ही लिखते रहिये।स्वागत आपका।

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  3. in praise of lord Krishna you show your empathy and woderness in having a glimpse of the lord but he is elusive and keeps his worshippers guessing all along.
    One more amazing poesy.

    Dear ABHEYJI Can you help me in understanding the add support of your poems. Idonot know it .

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