मेघा फिर से आएगा

तुम किसी तेज नदी सी
मैं मिट्टी का, दोनों किनारा
चिर अन्नंत से हो मानो जैसे
मैंने दो बाहें पसारा
तुम तीव्र , प्रवाहमान
कल-कल ध्वनि से गुंजमान
मैं मूक, गुमनाम!
तुम तेज बहती गयी
मैं तेजी से कटता गया!
कण कण मेरा तुममे
घुलता गया , मिलता गया
ये कहानी तबकी जब की
सब कुछ हरा भरा था
पर अब रूखा-सूखा है
तुम संकरी हो चली
किनारों से दूर कहीं खो चली
सब हैं कहते हैं कि
सागर से ही, तुम्हारा वास्ता है
मेरी उपस्थिति तो किंचित, एक रास्ता है
पर मैं अटल हूँ, आश्वस्त हूँ
कि तुम फिर से आओगी
फिर मुझे छू जाओगी
कि मेघा भी तो फिर से आएगा

…….अभय …….

Oh, I love rivers. Sitting on the banks of it, is my favorite task. I have also talked about my this hobby in some of my previous posts. Many of my poetry has taken its shape on these places. Sharing a latest one.

हिंदी साहित्य की जिस विधा का मैंने अतिसय प्रयोग इस कविता में किया हैं, उसे मानवीय अलंकार कहते है. आशा हैं आप तक सही शालमत पहुँचेगी.

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19 thoughts on “मेघा फिर से आएगा”

  1. वाह।बेहतरीन लेखन भाई।👌👌👌
    तुम किसी तेज नदी सी 
    मैं मिट्टी का, दोनों किनारा 
    चिर अन्नंत से हो मानो जैसे 
    मैंने दो बाहें पसारा ।
    तेरे संग मैं घुल जाऊं।
    खुद को मिटा मैं खुशियाँ मनाऊँ।

    Liked by 1 person

  2. बहुत अच्छा पोस्ट है।
    पर मैं अटल हूँ, आश्वस्त हूँ 
    कि तुम फिर से आओगी 
    फिर मुझे छू जाओगी
    कि मेघा भी तो फिर से आएगा।👌👌
    मुझे ये लाइन बहुत अच्छी लगी क्यों कि इसमें आशा और एक विश्वास है।
    सब हैं कहते हैं कि
    वाली लाइन में मुझे लगता है एक हैं से ही भाव स्पष्ट है दो हैं थोड़ा अटपटा लग रहा है पढ़ने में।

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