ढूँढता हूँ..

अमावस की ये रात घनेरी, मैं चाँद ढूंढता हूँ
डर के छुपा जहाँ है शेर बैठा, मैं वो मांद ढूंढता हूँ

सदियों से फैले सन्नाटों में, मैं कोई पैगाम ढूंढता हूँ
सारे नियमों को तोड़ कर, मैं अंजाम ढूँढता हूँ

उलझे सपनों की लम्बी सफर में, मैं राह ढूँढता हूँ
हर झूठी हंसी में तेरी , मैं छुपी कराह ढूँढता हूँ

….. अभय…..

Hello to my fellow bloggers. I came here after a long hiatus, as I was engaged in some hectic work. Hope you all would be fine. I missed your writings, and hoping you also would have missed my poems 😀 Would try to be in touch more frequently. Do let me know your views.

37 thoughts on “ढूँढता हूँ..”

  1. बर्षों बाद उनको याद आया,
    मेरे आँगन में फिर से चाँद आया|
    वैसे तो हमने भी बहुत ढूँढा उसे जो खो गया था,
    मगर जल्द ही जहाँ बैठा था वो शेर, मेरा साथी,
    नजरों के सम्मुख ही अचानक उसका मांद आया|

    बधाई हो मित्र सुन्दर कविता के साथ वापसी के लिए| बहुत बहुत स्वागत अपने घर वापसी के लिए|

    Liked by 1 person

    1. Thank You so much Madhusudan Bhai, I was really missing you and your comment since I posted my writing after a long time. Life thoda hectic ho chala hai…par main samay nikal ke likhta rahunga…Ashish bnaye rakhen

      Like

      1. जिंदगी का दूसरा नाम समस्या है।जो अंत तक साथ रहता है। मिले नहीं मगर कोई अपना आया ऐसा दिल को लगता है देखकर पोस्ट। मस्त रहिये।

        Liked by 1 person

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: