जमी बर्फ़ ..

हर रोज़  कई  बातें

तुमसे  मैं  कर  जाता  हूँ

कुछ  ही  उनमें  शब्द  बनकर

जुबां तक आ पाती हैं

कई उनमें  से  मानो

थम  सी  जाती  हैं

ह्रदय  में  कोई  बर्फ़  जैसी

 ज़म सी  जाती  है!

रिश्तों  की  गर्माहट  पा दबे  शब्द  भी

कभी तो  निकलेंगे

सभी  पुरानी  जो  बर्फ़  जमीं  है

कभी  तो  वो  पिघलेंगे

पिघली हुई  बातें  जब

कल-कल  कर  बह  जाएँगी

तब  भी  क्या  तुम  किसी  शैल  सा

खुद  को  अडिग  रख  पाओगी

या  नदी  किनारे  की  मिट्टी  सी

खुद ही  जल  में मिल  जाओगी

तुम भी पिघल जाओगी

…….अभय…….

21 thoughts on “जमी बर्फ़ ..”

  1. हाँ मैं अडिग हूँ फिर भी हिल जाएँगे,
    छूकर तो देखो,पिघल जाएंगे,
    नदी किनारे मिट्टी सा पड़े,
    तेरे इंतजार में कब से हैं खड़े,
    तुम आओ तो सही,
    मैं अपना अस्तित्व भूल
    तुम में घुलमिल जायंगे,
    हाँ छूकर तो देखो पिघल जाएंगे।

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    1. Oh! Thank You so much. Really feel great to know someone is missing my creation. I am engaged in a lot of exam and assignments these days. Will be a bit free after 6th of April. Then will try to come up with something. Hope you are taking care of yourself and your family in this distressing time. I haven’t also looked your post since long.

      Liked by 1 person

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