Today while reading news paper , I came across a heartwarming narration. After reading this piece, four lines automatically came to me.

संकीर्णताओं की पिंजरे से
अब भी, आज़ाद कोई परिंदा है
इंसानियत की हर रोज़ लाशें बिछती हैं
किसी कोने में मानवता अब भी ज़िंदा हैं

…..अभय…..

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12 thoughts on “”

  1. यह कहानी अख़बार से बहुत अच्छी थी | और आपकी कविता सुन्दर (आर बिलकुल सही) है | मुझे दोनों बहुत पसंद है |

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      1. मैं और अपना परिवार बिलकुल ठीक हैं | महामारी का कारन अधिकतर हम घर में रहे पर हमारा स्थिथि अच्छा है | टोरंटो में बहुत ज्यादा केसेस हैं: अभी >2000 |

        सुरक्षित रहिये, भाई |

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        1. हम भी घर पर बने हुए हैं। स्थिति गंभीर है, ध्यान रखिए अपना और परिवार का।🙏

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    1. नमस्ते, आपके संदेश को पढ़ कर लिखने की प्रेरणा मिलती है, शुक्रिया

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      1. क्या बात!
        आपने लिखना कम क्या किया मेरे पास मुद्दों की कमी सी हो गई है।
        आपकी रचना जब भी पढ़ता था मेरी एक रचना स्वतः बन जाया करती थी।

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        1. हा हा, थोड़ी व्यस्तता हो गयी है जीवन में, लॉक डाउन ने कुछ समय दिया। आगे सतत लिखने का प्रयास करूंगा😀

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