अकेला छोड़ गया..

Credit: artranked.com

नदी में रेत ही हैं रेत
क्या ये पानी खुद ही पी गया!
मानवता की उम्र लेकर के नफ़रत
क्यों सदियों तक जी गया!

आसमान में तारे दिखते नहीं
क्या खुद ही ये निगल गए!
हिमशिखर जो था कल तक
क्या खुद में ही वे पिघल गए!

वृक्षों में अब फल नही
क्या खुद ही ये तोड़ गए!
उन्मुक्त था जो जीवन में
अवसाद नया ये जोड़ गए!

तेरा चेहरा उदास है क्यों
क्या कोई तुझसे भी मुँह मोड़ गया?
भीड़ में क्या वह तुझे
फिर से अकेला छोड़ गया?

…..अभय…..

23 thoughts on “अकेला छोड़ गया..”

  1. कमाल का लिखते हैं आप।
    एक और लाजवाब रचना।
    पता नही पाठक अब पढ़कर
    वाह करने से क्यों कतराने लगे।
    शायद रचनाएं भी अब कोरोना की तरह
    उन्हें भी डराने लगे।

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    1. हा हा ..पहले तो शुक्रिया की आपको पसंद आया. पाठकों को शिकायत भी होगी कि बहुत दिनों तक गायब था और समय किसी के लिए रुकता नहीं है. खैर मुझे अच्छा लगता हाउ इसलिए लिखता हूँ आप सब से प्यार मिल जाता है तो प्रेरणा भी मिलती है और लिखने की

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  2. ये पँक्तियाँ सबसे बेहतरीन लगी।

    तेरा चेहरा उदास है क्यों
    क्या कोई तुझसे भी मुँह मोड़ गया?
    भीड़ में क्या वह तुझे
    फिर से अकेला छोड़ गया?

    Liked by 1 person

    1. सच कहूं तो लिखने की प्रेरणा इन्ही पंक्तियों से मिली और क्लाइमेक्स की तरह इसको अंत में डालने का सोचा..

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  3. What a melancholy that everyone can relate to some line or the other. However, I must say the Corona effect has borne good results in terms of rivers with clean waters and trees with unplucked fruits, rare views are again visible sir.

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