वो रास्ता..

Blast From the Past…

the ETERNAL tryst

contemplation Credit: Internet

वो रास्ता..

सच्चाईयों से मुँह फेरकर,

मुझपर तुम हँसते गए

दल-दल राह चुनी तुमने,

और गर्त तक धसते गए


खुद पर वश नहीं था तुम्हें ,

गैरों की प्रवाह में बहते गए

जाल बुनी थी मेरे लिए ही,

और खुद ही तुम फँसते गए


नमी सोखकर मेरे ही जमीं की,

गैरों की भूमि पर बरसते रहे

सतरंगी इंद्रधनुष कब खिले गगन में,

उस पल को अब हम तरसते रहे

……….अभय ………..

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आस्तिक हूँ या नास्तिक हूँ ?

मैं तुम्हें ढूंढता हूँ तब , जब कि मैं खुद को खाई में पाता हूँ मुझे तुम्हारा ध्यान कहाँ जब मैं शिखर पे छाता हूँ .. मैं संबंधों के सिलसिले में मशगूल अक्सर तुम्हे भूल जाता हूँ , और जब तनहाई आती है तो सिर्फ तुम याद आते हो.. तुम होते हो, तो एक यकीं होता …

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Lowdown of Simultaneous Election

When it comes to the celebration of festivals, probably no other country in the world can beat us in terms of sheer numbers which we have here in India. The dates of our annual calendar are always filled with colours, signifying one festival or the other. Festivals are generally a cultural and historical attribute of …

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मुर्दों की बस्ती..

        मुर्दों की बस्ती मोल लगा लो पैसे हों तो यहाँ ईमान बहुत ही सस्ती है ये मुर्दों की बस्ती है   शुचिता के सब स्वांग रचे हैं पर, बिकी हुई हर हस्ती है ये मुर्दों की बस्ती है   कलंक का डर अब किसे यहाँ पर स्वाभिमान गर्त तक धसती है …

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एक और दिसंबर बीत गया..

एक और दिसंबर बीत गया अभी तो सूरज निकला ही था और झट में फिर वो डूब गया एक और दिसंबर बीत गया अभी बसंत की हुई थी दस्तक पर अब, पत्ता पत्ता सूख गया एक और दिसंबर बीत गया जनवरी में कई कस्में खायी थी हमने पर अगणित बार वो टूट गया एक और …

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