Adaptation..

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बस तेरा इंतज़ार है..

धम से गिरे धरनी पर शिखर से, ज़ख्म गहरा हुआ चोट हरा हुआ पर गिरने का यह पहला वाक़या तो न था कई पहले भी लुढ़के गिरे गर्त में वर्षों तक सिसकते रहे मरणासन्न रहे संवेदनहीन रहे निर्जीव सा गौण रहे व्योम सा मौन रहे पर लड़ते रहे जूझते रहे झुलसते रहे आपदाओं में विपदाओं …

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चलें?

चलोगे ??? निश्चित से अनिश्चित की ओर ज्ञात से अज्ञात की ओर सीमित से अनंत की ओर परिचित से अपरिचित की ओर किनारे से भंवर की ओर सुलझन से उलझन की ओर स्थिरता से गति की ओर निर्विवाद से विवाद की ओर शांति से फसाद की ओर याद रहे, हिम्मत चाहिए!!! .....अभय.....