समिधा

Samidha

समिधा

चहोदिशी यज्ञ की वेदी के
चौपाल लगाए लोग बैठे
सुधा कलश की आश लगाए ,
टकटकी लगाए, लोग बैठे
कह दो उन्हें कि इस यज्ञ की
समिधा पहले ही स्वाहा हो चुकी है
ज्वाला जो धधकती थी इसमें ,
शनैः शनैः कर अब बुझ चुकी है
समिधा बन अब खुद ही
यज्ञ कुंड में जलना होगा
सरिता हेतु अब हिमगिरि सा
मौन रह, खुद ही गलना होगा

…..अभय…..

समिधा-यज्ञ में आहुति हेतु प्रयोग की जाने वाली लकड़ी

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When to speak…Whom to speak

बसंत तो अब बीत चुका है

कुहू तो बस अब मौन रहेगा

क्षितिज पर कालिख बदरी छायी है

सब दादुर अब टर-टर करेगा

                                       ~अभय

 

Spring has gone

Cuckoo will not sing any more

Dark clouds are hovering in the sky

Oh! It’s time for the frogs

                                                                                                 ~Abhay

 

कुहू- कोयल
दादुर- मेढ़क

आप पंक्तियों को खुद से जोड़ पाए तो मैं अपनी सफलता मानूंगा..

सशर्त प्रेम …

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नेह अगर है मुझसे तो बोलो

तुम क्या क्या कर सकते हो

जान ले सकते किसी की

या अपनी जान दे सकते हो ?

 

निष्ठा को साबित करने को

मैंने भी मन में ठान लिया

निज प्राणाहुति हेतु

तलवार गले पर तान लिया

 

तभी कुटिल मुस्कान लिए

उसने मुझसे बोला

अपने अप्रत्यासित अनुरोध का

राज़ था उसने खोला

 

“मुझे तो बस ये देखना था

तुम किस हद तक जा सकते हो

मेरे लिए क्या तुम अपना

सर्वस्व त्याग कर सकते हो”

 

तलवार गले पर था मेरे

तब भी न कोई टीस थी

निष्ठा को सत्यापित करना पड़ा

ये यातना बड़ी गंभीर थी

…….अभय……

P.S. Tried writing something new in different genre, please let me know does it make sense to you! Thank You.

संदेह कैसा?

 

तुम होते हो वही, जो तेरे मन में चलता है

फिर न जाने क्यों ये मन तेरा, पल-पल बदलता है

लक्ष्य दुर्लभ है, पता है.. विपदाओं के बादल भी घने हैं

आशंकाएं कैसी? संदेह कैसा? जब संग स्वयं जनार्दन खड़े हैं

शुभकामनायें!

मेरी तरफ से आप सभी को हिंदी दिवस की असीम शुभकामनायें. चुनौतियों से भरा प्रहर है. आज जब भारत में अंग्रेजी भाषा बुद्धिजीवी व्यक्तियों का परिचायक बन चुकी है, तो अन्य भाषाओं में विचार व्यक्त करना एक चुनौती है इस विषम परिस्थिति में दृढ विश्वास और गर्व के संग हिंदी भाषा का ध्वज वाहक बने रहिये और स्मरण रहे कि यह विश्वास काल्पनिक न हो, हिंदी रचनाओं का यदि हम अध्ययन संवेदनशीलता के साथ करेंगे तो, तो इसकी महानता अनायास ही दृष्टि में आएगी…

मातृभाषा हमारी अलग हो सकती है (मेरी भी अलग है, हिंदी नहीं) पर राष्ट्र को एकीकृत करने में हिंदी से श्रेष्ठ और कोई नहीं. तब जब कि आने वाले कुछ दशकों में हम विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के कगार पर हैं, तो स्मरण रहे की हमारी बोल-चाल की भाषा उधार की न रहे. क्योंकि उधार ली गयी चीजें सर्वदा बोझ ही रहती हैं

 

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लिखा था, जो आज भी प्रासंगिक है:-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

भावार्थ:
निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति सम्भव है, क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है।
मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण सम्भव नहीं है।
विभिन्न प्रकार की कलाएँ, असीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान,
सभी देशों से जरूर लेने चाहिये, परन्तु उनका प्रचार मातृभाषा में ही करना चाहिये