नाव में छेद / Hole in the boat

At many occasions, I have experienced and also heard from different people that they are willing to move forward, yet they find it difficult in doing so due to some past failure, some memories which remains only in imagination, some unpleasant happenings in their life etc etc.

These impediments just work as a drag in their forward march. Yesterday I was discussing this subject with one of my friend. In doing so, few lines came to me and I am presenting it in public domain for your scrutiny and contemplation. I have termed the topic as “Hole in the Boat”. Do let me know your views.. 🙂

 

नाव में छेद 

धारा के विपरीत जाने से
न मैं कभी घबराता हूँ
हवा के वेग और दिशा को भी
चपलता से मैं भांप जाता हूँ

मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि
हैआज सिंधु कितनी वीरान 
या आगे मेरा बाट जोहता
 है कोई समुद्री तूफ़ान

पर मुझे बस एक बात का डर है
एक बात की खेद है
मेरी नाव को जर्जर करती
इसमें एक छोटी सी छेद है

मैं जितनी तेजी से पतवार चलता हूँ
उतनी ही तेजी से इसमें जल भर आती है
फिर मेरी आधी शक्ति और समय भी
इसे खाली करने में लग जाती है

मैं यात्रा में कुछ दूर ही जा पाता हूँ
फिर वापस प्रस्थान बिंदु पर आता हूँ
अपनी यात्रा फिर से शुरू करने को
मैं विवश हो जाता हूँ

………अभय ……..

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मैं जैसा हूँ, मुझे वैसे देखो

इस कविता के “मैं” को, आप खुद से भी बदल कर देख सकते हैं . मुझ तक पहुँचाना न भूलिए कि  कैसी लगी.

मैं जैसा हूँ, मुझे वैसे देखो 

अपने-अपने चश्मे हटाओ ,

पूर्वाग्रह को दूर बिठाओ ,

फिर अपने स्वार्थ को तुम फेंको

मैं जैसा हूँ मुझे वैसे देखो !!!

 

कोई समझता मित्र मुझे,

कोई समझता बैरी है ,

कोई ढूंढता प्रेम है मुझमें ,

कोई समझता मुझे, नफरत की ढेरी है !!!

 

कोई चाहता हर पल उनके ,

प्रलय तक मैं संग निभाऊं

किसी की ख्वाहिश है फिर कभी अब,

उनके जीवन में, मैं न कोई रंग लगाऊं!!!

 

कोई कहता है जीवन में जो खुशियाँ है उसका ,

कारण भी मैं हूँ और सृष्टा भी मैं ही

फिर किसी को है लगता, जीवन में है अवसाद जितने

मैं ने ही बनाया, मैंने ही बसाया!!!

 

किसी को है मेरी, चुप्पी खटकती

किसी को झकझोरता है, मेरा बोलना

किसी के लिए बंद पुस्तक सही मैं

किसी को पसंद मेरा मन का खोलना!!!

 

जिसने मुझमें जो-जो ढूंढा ,

उसने मुझमें वो-वो पाया ,

पर मेरा नित्य स्वरुप है क्या?

शायद , किसी को अब तक समझ न आया

और सच कहूँ, तो शायद मुझे भी नहीं!!!

……..अभय ……….

शब्द सहयोग
पूर्वाग्रह: Prejudice

घोसला ..

आज मन थोड़ा उदास है. सामान्य दृष्टि से देखें तो इसका कारण कोई विशेष और व्यापक नहीं है. हुआ यूँ कि घर में निर्णय लिया गया कि घर का विस्तार किया जायेगा, ऊंचाई बढ़ाई जाएगी . इसकी आवश्यकता भी महसूस हो रही थी, सिर्फ इसलिए नहीं कि हमारा परिवार संयुक्त है पर इससे बड़ा कारण कि घर के आस पास भी लोगों का घर ऊँचा हो रहा है. दुनियाँ दिखावटी है, और हम भी इसके अपवाद नहीं हैं.

मैं इसलिए उदास नहीं कि घर का विस्तार हो रहा है, बल्कि मेरे बगीचे में लगे अमरूद के पेड़ को काटे जाने की बात हो रही है. वह पेड़ इंजीनियर द्वारा दिए गए प्लान में फिट नहीं बैठ रहा है, उसका कहना है कि शहर में जगह की बहुत किल्लत है और यह पेड़ अनावश्यक जगह घेरे हुए है. मेरे पापा जी भी इस बात से सहमत हैं और उनका निर्णय ही अंतिम और सर्वमान्य है.

 

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 Representative Image, Credit: Google

पर चुकी मैं पर्यावरण संरक्षण और पेड़ लगाने  की बात हरेक प्लेटफार्म से करता हूँ तो मुझे थोड़ा अफ़सोस हो रहा है. पर पर्यावरण संरक्षण से ज़्यादा मुझे दुःख इसलिए है कि इस पेड़ से मेरा भावनात्मक लगाव सा हो गया है. और इस लगाव का अनुभव मुझे तब हुआ जब इसको काटने की बात सुनी. कई बार जीवन में ऐसा ही तो होता है न कि किसी चीज की  महत्ता उसके जाने के समय या जाने कि बाद ही समझ आती है.

यह पेड़ बहुत पुराना है. बचपन में मैं इस पेड़ पर चढ़कर अमरुद तोड़ा करता था और अब भी अमरुद वाले मौसम में सिर्फ मेरे परिवार के लोग ही नहीं अड़ोसी पड़ोसी भी तोड़ते हैं . मुझे यह भी याद है कि इसकी एक शाख पर एक झूला भी हुआ करता था. शाम को स्कूल के बाद तो आस पास के बच्चों का मेला सा लग जाता था. और सिर्फ बच्चों का ही नहीं, बड़े लोग भी इसकी छांव में राजनीती और  क्रिकेट के गप्पे लगाया करते थे. इस पेड़ ने नेचुरल अलार्म का भी काम किया, आप सोच रहेंगे कैसे? तो होता यूँ है कि इसपर सुबह सुबह कुछेक पक्षी आकर चहचहाना शुरू कर देते हैं और गर्मी के दिनों में वह आपकी नींद तोड़ने के लिए काफी है. पर मुझे इसका अफ़सोस कभी नहीं रहा क्योंकि मुझे सवेरे उठना पसंद है. इसपर कई बार मैं लाल चोंच वाले तोते भी देखे, मैना भी देखा. पर कौओं ने अपनी संख्या सबसे ज़्यादा होती थी.

इस पेड़ पर एक घोसला भी है, पर अब यह यहाँ नहीं रहेगा. मनुष्य का घोसला ज्यादा जरूरी है, उस घोसले का बड़ा होना भी आवश्यक है. चिड़ियों का क्या है, वो तो उड़ सकती हैं कहीं भी घोसला बना सकती हैं, उनको ईंट, गिट्टी, बालू और सीमेंट भी नहीं खरीदनी होती, तो वो तो मैनेज कर ही लेंगे.  पर्यावरण का क्या है, सिर्फ एक पेड़ काटने से ग्लोबल वार्मिंग पर क्या असर होगा? अमरूद के फल का क्या है, बाजार में मिल ही जायेगा, अलार्म की चिंता भी कहाँ है हमारे पास मोबाइल है घडी है और जहाँ तक झूले की बात है वो तो टेरेस पर लगा ही सकती हैं और उससे कहीं अच्छी  😦

मैंने घर में अपनी बात किसी से नहीं कहीं, और कहता भी तो कुछ होने वाला नहीं था. पेड़ का जीवन है ही ऐसा, पत्थर मारो वो फल ही देंगे, कुल्हाड़ी से काटो जलावन, फर्नीचर को लकड़ी देंगे, CO2 लेंगे और प्राणवायु देंगे, और पूरी तरह निपटा दो तो वह जगह देंगे……

मैं और मेरी नाव

शुक्रवार की रात से अगर कुछ अच्छा हो सकता है तो वो है शनिवार का दिन, psychologically थोड़ा सुकून रहता है कि चलो एक और दिन तो बचे हैं छुट्टी के. आज सवेरे बाइक लेकर मॉर्निंग वॉक पर निकला :-P. जैसा कि मैंने पहले भी शायद किसी लेख में लिखा है कि मुझे नदी किनारे अपने शहर की मरीन ड्राइव पर, जो शायद 10-12 किलोमीटर लम्बी होगी, सुबह सुबह गाड़ी चलाने में मज़ा आता हैं. उसी मरीन ड्राइव पर एक स्थान ऐसा भी हैं जहाँ दो नदियाँ मिलती हैं. वहां बैठने का प्रबंध भी हैं. मैं अक्सर वहां जाता हूँ तो कुछ देर रुकता हूँ. आज भी रुका.

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I was discussing about the same place, It is known as “Domuhani“, meaning two mouthed. A term to refer meeting of the two rivers. Clicked it few months back.

वातावरण, जो दिन में आज-कल काफी गर्म हो जाता हैं, सुबह में काफी सुहावना सा हो रहा था. कोयल उसमें मिठास घोल रही थी. कल रात की तेज बारिश और तूफ़ान के बाद आम के पेड़ से काफी मंजर नीचे गिरे हुए थे, पर उनकी अलग से खुसबू अब तक आ रही थी, एक पका हुआ बेल भी गिरा हुआ था, मैं उठाने जा ही रहा था कि एक अधेड़ उम्र की माता जी ने उस पर दूर से ही चिल्लाकर कब्ज़ा जमा लिया, मैंने उठाकर उनको दे दिया और बोला कि मैं आप ही के लिए उठा रहा था 😛 😛 …..वो भी मेरे परोपकार को  समझ रही थी . उन्होंने मुस्कुरा के कहा चलो रहने दो , मैंने भी अपनी दांत दिखा दी.
उसके बाद कुछ देर बैठा, तो कुछ विचार निकले…फ़ोन पर ही ड्रॉफ्ट कर लिया. थोड़ी संसोधन के पश्चात आपके सामने प्रस्तुत है…अपने मनोभाव को मुझ तक पहुँचाना मत भूलियेगा

Boat
Google se uthaya

मैं और मेरी नाव 

मैं नदी के इस किनारे
तुम बैठी थी उस पार
बारिश का मौसम
बाढ़ थी आयी
नदी हुई विकराल
पर मुझे तो था आना
कैसे भी तेरे पास
तैरकर जाना मुश्किल था
नदी में प्रचंड बहाव था
सोचा एक नाव बनाते हैं
सहारे नाव के
तेरे पास हो आते हैं
लग गया नौका बनाने में
सुध नहीं रही ज़माने की
ऐसा व्यस्त हुआ कि
मौसम तक बदल गया
बारिश बीत गयी
ग्रीष्म चरम पर आ गयी
नदी बरसाती थी
तलछटी तक वो सूख गयी
आज मेरी नौका तैयार है
विडंबना ऐसी कि
नदी में जल नहीं है
न ही तुम खड़ी हो उस किनारे पर
मैं हूँ और संग मेरे, मेरी नाव ….

…………..अभय ……………

अपनी राह ..

 

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Clicked it, Yesterday Morning

अपनी राह..

 

राहों को अपनी, मैं खुद ढूंढ लूंगा
बन पथप्रदर्शक तुम, मुझे न उलझाओ||

मेरे उम्मीदों को अब, पर जो लगें है
अपनी आसक्तियों की, न जाल बिछाओ||

कष्टों का पहाड़ सीधे सिर पर सहा है
राह के रोड़ों से तुम, मुझे न डराओ||

सच है जो कड़वा, मैंने खुद चख लिया है
उसपर झूठ की मीठी तुम, परत न चढ़ाओ||

मंज़िल है मुश्किल औ’ लंबा सफर है
जो बीच में हो जाना, शुरू से साथ न आओ||

ज्ञान की दीपक अब जो जली है
अपने आंसुओं से उसे न बुझाओ||

जाना जहाँ है, राहों में कांटे बिछे हैं||
मेरे लिए अभी फूलों की हार न लाओ||

निराश लोगों की लम्बी पंगत लगी है
सांत्वना भरे गीत तुम, उन्हें ही सुनाओ||

नम्रता में मैंने जीवन है जीया
मेरे खुद पे भरोसे को, मेरा अहम् न बताओ||

………..अभय…………

 

 

शब्द सहयोग: पथप्रदर्शक: Guide; पर: Wings; रोड़ों: Pebbles; आसक्ति: Attachment; पंगत: Queue,  Line ;

नम्रता : Humility ;  अहम् : Ego ; सांत्वना: Sympathy; Condolence, Console.

Hit-Wicket on V -Day :-P

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River Swarnrekha, during Monsoon.

So, I am continuing from where I have left it yesterday, as some event prompted me to write it again.  If you haven’t read, and willing to do so, you can check it out @ भोर की खोज..

Today also I woke up early. It was dark outside. But a hope was there that sun will emerge soon out of this darkness. I prepared myself for the morning walk. At 05:00 hrs I left home. Outside, season was tantalizing as usual in Feb. Cold breeze was blowing. Aroma of mango flowers (we call it  Manjari in Hindi), conspicuous in this month, were enchanting.

I plugged  in my ear phones and played the same Song (Bhajan) which I have mentioned in my last blog भोर की खोज... The volume was at maximum. Contemplating on each words of the song and appreciating the classical music of India and the way Pt. Bhim Sen Joshi has sung, I was marching towards the river.

It was still dark yet the street lights were glowing. Some other people were also strolling on the street. I was completely observed in the song then suddenly someone hold my hand. I experienced how fast our mind could be. Before I could turn back, numerous bizarre thought came. Who it could be?

A ghost!!!!  Oh it’s Valentine Day, how can I forget the atmosphere which has been created since past week for 14th February, especially on WP. Someone hold my hand in the very morning. Thought, Saint Valentine must be very kind on me.

But when I turned around, all my imaginations were shattered in seconds :P. I saw an old man in his 50s. His face was frightened. I asked “चचा !! क्या हुआ ??” (Uncle! What happened?) He was telling something, but since the music was playing at maximum volume, I couldn’t hear him. I plugged out my ear phone. Then heard asynchronous and horrific sound of woof.. woof.. woof.. Nearly 5-6 stray dogs were behind him. He said, “साले ! कुत्ते  पीछे   हैं ” (Dogs are behind me). I said “वो  तो  देख  रहा  हूँ , आप घबराओ मत, मेरे पीछे आ जाओ ” (That I am seeing, don’t panic just stay behind me). Then I stayed calm and scarred the dog by pretending to throw pebbles at them, when there was no stones around. Somehow dogs got scarred and ran away.

I smiled at uncle and ask jokingly, “क्या  चचा!!!  वैलेंटाइन  डे  के  दिन  आज  मैं  ही  मिला  था  सुबह  सुबह  हाथ  पकड़ने  को 🙂“(Uncle! on this valentine day you only found me to hold hand ) . As it turned out, uncle was more humorous, he replied  “बेटा , खैर  मनाओ  बजरंग  दल  से  हूँ मैं , जान  नहीं  बचायी  होती  तो  वैलेंटाइन  डे  के दिन, दिन भर तुम्हारे पीछे अपने आदमियों को छोड़ता ” (Son! you are lucky, I am from Bajrang Dal, if you haven’t saved my life today, then for taking the name of Valentine, I would have sent my men to have a watch on you for the entire day). I said jokingly, “ये पराक्रम कुत्तो  पर  क्यों  नहीं  दिखाया” (Why don’t you displayed your valor to the dogs). He replied more wittingly, “कुत्ते  थोड़े  ही न  वैलेंटाइन  डे  मानते  हैं ” (Dogs never celebrate Valentine Day).

I burst in to laughter, he followed me too. I said “Namste”  to him and marched forward towards the river. He replied “Thank You“. On reaching there, I removed  my shoes off and dipped my feet in to the water. Water was colder than the wind. Someone has just rang the temple bell. Birds were taking flights towards their destination. I was smiling……

 

Maiden Century

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Maiden Century

Well, in cricket, first century is always very special for any Batsman. When I was notified by one of the reader and later by the WordPress as well, that I had garnered 100 followers here, this event is more special for me than any of the cricketer would feel after hitting his first century. The reason is very simple. A cricketer can again hit a century, but this phenomenon is not going to happen again, as I hope, followers will tend to get add on from this tally.

My journey on WordPress, is associated with an incident. I generally preferred, in past,  to keep my poems and other write ups  close to  heart (which I still do, but not all) and occasionally revealed to the people, whom I deemed that they will understand it and value it. I kept my writings in a Diary, which contained nearly all my creations. I lost that Diary in  a journey. I was baffled and frustrated by this happening. Some of the poems I still remember, but many of them have gone forever. Due to that loss, I stopped writing for a while as I was not getting the feeling.  Then came a suggestion from a friend to write a blog, which initially I hesitated. But the fact that it will not meet the same fate of my diary due to its digital nature, I agreed upon.

When I joined WP, I find it a different world altogether. Exciting things happening around. New authors in making. Outbursts of emotions. Improvised writing and many more.

Yet, I find a terminology called “Follower” in WP very vague and unjustified. In my opine, followers in real sense are the appreciator, booster, motivator, critique and even guiding lamp for the author, who through their constant feedbacks encourages writer to improve their writings. By their motivating words, author gets a sense satisfaction, which is the oxygen for them.

On this occasion, when I reach this small yet significant landmark, I thank all of you who appreciated me even when my writing was not so good,  read the whole write ups when it was not very exciting, gave your valuable time when it the is most scarce thing in the world.

Thank you once again!!!

मेरे हिंदी के दोस्तों, इस अवसर पर आपको धन्यवाद कहे बिना तो मैं रह ही नहीं सकता. मेरी अधिकांश रचनाएँ हिंदी में ही है, अंग्रेजी समझ कम आती है और उसमें भावना आना तो मेरे लिए नामुमकिन ही है, और बिना भावना के कवितायेँ नहीं लिखी जा सकती. पर क्या करें फॉलोवर बेस अंग्रेजी से भी है और देश में अंग्रेजी प्रायः सभी समझते हैं खासकर जो इन्टरनेट का उपयोग करते हैं. इसलिए शुरुआत अंग्रेजी से की पर खत्म हिंदी से कर रहा हूँ. हिंदी के प्रति विशेष लगाव है और रहेगा.

आगे भी अपना आशीष बनायें रखें…

…………………………….अभय……………………………..