चक्रवात..

चक्रवात ये जो तेरी यादों का समंदर है लगे जैसे कोई बवंडर है मैं ज्यों ही करता इनपे दृष्टिपात मन में उठता कोई भीषण चक्रवात मैं बीच बवंडर के आ जाता हूँ और क्षत विछत हो जाता हूँ इसमें चक्रवात का क्या जाता है वह तो तांडव को ही आता है अपने हिस्से की तबाही …

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विडंबना..

वो झूठ था मैं जानता था पर, सच को न जानने की ढोंग मैं करता रहा काश! मेरे उस ढोंग को तुम जान लेते मेरे हर झूठे हँसी में छिपे आह को , तुम पहचान लेते और अब जब कि वर्षों बाद तुमने ये जान लिया है कि मैं वो सच जानता था तो विडंबना …

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निहत्था ..

मैं निहत्था हूँ कब से और तेरे हाथों में है दो-धारी तलवार पर इतनी हड़बड़ाहट से, घबराहट से तुम उसे क्यों चला रहे हो ? कि मैं सुरक्षित हूँ और तुम खुद ही को घायल करते जा रहे हो ! कि तुम दो पल साँसे धरो पूरी ताकत इकट्ठी करो और फिर जो हमला करना …

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मेरा मन..

  मेरा मन जहाज़ सा, उड़ने वाला नहीं तैरने वाला, पानी का जहाज और तुम सागर सी, हिन्द महासागर नहीं प्रशांत महासागर अथाह, असीमित, अन्नंत मन चंचल था मेरा, तैरता तुममें कभी शांत कभी हिचकोले करता हुआ पर वह अब डूब रहा है गर्त में, तह तक जैसे किसी सागर में कोई जहाज डूबता है, …

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जिद्दी मन..

  पावों में हैं बेड़ियाँ हाथों में है पाश मैं खड़ा जमीं पे पर, दृष्टि में आकाश सुविधाएँ तो थी नहीं साधन भी मुझे मिला नहीं दर-दर की ठोकरे खायीं पर, किसी से कोई गिला नहीं सब कहते हैं, भाग्य में हो जितना केवल, उतना ही तो मिलता है पर करें क्या कि, जिद्दी है …

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एक दीपक

घनघोर अँधेरा नहीं कहीं सवेरा अंतहीन निशा भटकी दिशा   व्याकुल मन आँखे नम चित विचलित नहीं कोई परिचित   बैठे रहे मौन लगे सब कुछ गौण लगा जीवन गए हार विषाद अपार !! विषाद अपार !!   तभी कही एक दीपक जला विभावरी से एकल लड़ा गुप्प अंधकार किये सहस्त्रों प्रहार   कम्पित लौ …

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मुखौटे

आज मैंने फिर से इतिहास में डुबकी लगाई, और तभी अचानक मेरी, एक पुरानी कविता बाहर आयी ...चाहें तो आप भी डुबकी लगा आयें, या इसे ही पढ़कर इसमें, अपने भावों को पायें  .... 🙂 😉 मुखौटे चेहरे कम मुखौटे ज़्यादा दिखतें हैं इस बाज़ार में हम बेहतर हैं तुमसे सभी जुटे हैं इसी प्रयास में …

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