मूल न भूलें..

During one of my outing, I was fortunate to come across a Banyan Tree. This Banyan Tree was gigantic in size and seemed antiquated. Though I have seen many Banyan trees with multiple prop roots, but after seeing the sheer size and spread of this wood I became mesmerized. I sat down under the Banyan …

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मुर्दों की बस्ती..

        मुर्दों की बस्ती मोल लगा लो पैसे हों तो यहाँ ईमान बहुत ही सस्ती है ये मुर्दों की बस्ती है   शुचिता के सब स्वांग रचे हैं पर, बिकी हुई हर हस्ती है ये मुर्दों की बस्ती है   कलंक का डर अब किसे यहाँ पर स्वाभिमान गर्त तक धसती है …

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एक और दिसंबर बीत गया..

एक और दिसंबर बीत गया अभी तो सूरज निकला ही था और झट में फिर वो डूब गया एक और दिसंबर बीत गया अभी बसंत की हुई थी दस्तक पर अब, पत्ता पत्ता सूख गया एक और दिसंबर बीत गया जनवरी में कई कस्में खायी थी हमने पर अगणित बार वो टूट गया एक और …

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सुलगती ज्वाला

सुलगती ज्वाला सुलगती ज्वाला, जन जन के मन में और तुम उसे ढकने चले वो भी, सूखे घास और पत्तों से नमी रहित कागज के टुकड़ों से फेकीं गयी कपड़ों के चिथड़ों से सूखे आम की डालों से शुष्क सागवान की छालों से उस दहकते अंगारों को ढक कर निश्चिंत होकर तुम बैठ गए अरे!!! …

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चक्रवात..

चक्रवात ये जो तेरी यादों का समंदर है लगे जैसे कोई बवंडर है मैं ज्यों ही करता इनपे दृष्टिपात मन में उठता कोई भीषण चक्रवात मैं बीच बवंडर के आ जाता हूँ और क्षत विछत हो जाता हूँ इसमें चक्रवात का क्या जाता है वह तो तांडव को ही आता है अपने हिस्से की तबाही …

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विडंबना..

वो झूठ था मैं जानता था पर, सच को न जानने की ढोंग मैं करता रहा काश! मेरे उस ढोंग को तुम जान लेते मेरे हर झूठे हँसी में छिपे आह को , तुम पहचान लेते और अब जब कि वर्षों बाद तुमने ये जान लिया है कि मैं वो सच जानता था तो विडंबना …

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निहत्था ..

मैं निहत्था हूँ कब से और तेरे हाथों में है दो-धारी तलवार पर इतनी हड़बड़ाहट से, घबराहट से तुम उसे क्यों चला रहे हो ? कि मैं सुरक्षित हूँ और तुम खुद ही को घायल करते जा रहे हो ! कि तुम दो पल साँसे धरो पूरी ताकत इकट्ठी करो और फिर जो हमला करना …

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