ओ मेघा !

 

Cloud
Clouds are building up in my city, Clicked it in the morning. A place, from where I love watching rains

ओ मेघा !

अलग सी प्रतीक्षा, अलग सा समां है

है आने को मेघा, सभी हर्षित यहाँ हैं

ओ मेघा!

इस बार मेरे छत के ऊपर

तुम आकर केवल मत मंडराना

जो दूर से आये हो तुम लेकर

उस जल को हम पर बरसाना


सूखी जमीं है, सूखा है तन

पीले पड़े पत्ते, रूखा है मन

ओ मेघा!

इस बार तुम अपनी भीषण गर्जन से

तुम हमे केवल मत डरना

जो दूर से आये हो तुम लेकर

उस जल को हम पर बरसाना


नदियां भी प्यासी, कुँए हैं प्यासे

बूंदों को तरसते, हम भी ज़रा से

ओ मेघा !

इस बार अपनी बिजली की चकाचौंध से

तुम आतिशबाज़ी केवल मत कर जाना

जो दूर से आये हो तुम लेकर

उस जल को हम पर बरसाना

…..अभय….

कुछ और..

कुछ और..

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Credit: Internet

कुछ और नहीं मन में मेरे

बस मिलने को आ जाता हूँ

मत पूछो तेरी यादों में

मैं क्यों घर बसाता हूँ


मिलते ही तेरी आँखों से

आँसू झर-झर बहते हैं

लोग कहे उन्हें पानी,  मुझे वो 

मोती ही लगते हैं


अगणित रातों में जब-जब

नींद तुम्हे न आती हो

मेरी क्या गलती है उसमें, जो तुम

दोषी मुझे बताती हो


माना अपना दूर शहर है

मंज़िल भी नहीं मिलती है

मेरी आँखों में झाँक के देखो

तुमसे वो क्या-क्या कहती है


तिमिर चीरने के खातिर

मैं एक  दीया जलाता हूँ

मत पूछो तेरी यादों मैं

मैं क्यों घर बसाता हूँ

……अभय……

पर्यावरण संरक्षण

pb

On 5th June, World Environment Day is celebrated all across the globe. On this day I am republishing one of my poem,  which is dedicated to this theme . Hope you would like it.

पर्यावरण संरक्षण

सड़के हो रही हैं चौड़ी
पेड़ काटे जा रहे!
बांध बनाकर नदियों के
अविरल प्रवाह हैं रोके जा रहे!

ध्रुवों से बर्फ है पिघल रहा
समुद्रों का जल भी है बढ़ रहा ,
कहीं तपिश की मार से,
पूरा शहर उबल रहा!

कहीं पे बाढ़ आती है
कहीं सुखाड़ हो जाती है,
तो कहीं चक्रवात आने से
कई नगरें बर्बाद हो जाती है

कहीं ओलावृष्टि हो जाती है
तो कहीं चट्टानें खिसक जाती है
प्रकृति का यूं शोषण करने से,
नाज़ुक तारतम्य खो जाती है

है देर अब बहुत हो चुकी
कई प्रजातियां पृथ्वी ने खो चुकी
सबका दोषी मानव ही कहलायेगा,
पर्यावरण संरक्षण करने को जो
अब भी वो कोई ठोस कदम नहीं उठाएगा!

………….अभय ………….

वो रास्ता..

contemplation
Credit: Internet

वो रास्ता..

सच्चाईयों से मुँह फेरकर,

मुझपर तुम हँसते गए

दल-दल राह चुनी तुमने, 

और गर्त तक धसते गए


खुद पर वश नहीं था तुम्हें ,

गैरों की प्रवाह में बहते गए

जाल बुनी थी मेरे लिए ही,

और खुद ही तुम फँसते गए


नमी सोखकर मेरे ही जमीं की,

गैरों की भूमि पर बरसते रहे

सतरंगी इंद्रधनुष कब खिले गगन में,

उस पल को अब हम तरसते रहे

……….अभय ………..

नाव में छेद / Hole in the boat

At many occasions, I have experienced and also heard from different people that they are willing to move forward, yet they find it difficult in doing so due to some past failure, some memories which remains only in imagination, some unpleasant happenings in their life etc etc.

These impediments just work as a drag in their forward march. Yesterday I was discussing this subject with one of my friend. In doing so, few lines came to me and I am presenting it in public domain for your scrutiny and contemplation. I have termed the topic as “Hole in the Boat”. Do let me know your views.. 🙂

 

नाव में छेद 

धारा के विपरीत जाने से
न मैं कभी घबराता हूँ
हवा के वेग और दिशा को भी
चपलता से मैं भांप जाता हूँ

मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि
हैआज सिंधु कितनी वीरान 
या आगे मेरा बाट जोहता
 है कोई समुद्री तूफ़ान

पर मुझे बस एक बात का डर है
एक बात की खेद है
मेरी नाव को जर्जर करती
इसमें एक छोटी सी छेद है

मैं जितनी तेजी से पतवार चलता हूँ
उतनी ही तेजी से इसमें जल भर आती है
फिर मेरी आधी शक्ति और समय भी
इसे खाली करने में लग जाती है

मैं यात्रा में कुछ दूर ही जा पाता हूँ
फिर वापस प्रस्थान बिंदु पर आता हूँ
अपनी यात्रा फिर से शुरू करने को
मैं विवश हो जाता हूँ

………अभय ……..