अब भी मेरे सपनो में आती हो…

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अब भी मेरे सपनो में आती हो…

हाथ पकड़ती थी वो,

कुछ दूर संग मेरे आती थी

देख न ले दुनिया,

जग से नज़रें चुराती थी

मेरे मन के हर कोने में

आशियाँ बनाती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…


अक़्सर लंबी थी जो राहें लगती,

संग तेरे सिमट जाती थी

जिसकी हर हँसी,

पीहू की याद दिलाती थी

हर सावन की पहली बारिश में,

संग मेरे भीग जाती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…


दिन तो बीते जैसे-तैसे,

पर रात ठहर जाती थी

अनायास ही मन को मेरे,

याद तेरी आती थी

हर पल हर क्षण संग हो मेरे,

एहसास कराती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…

………..अभय………..

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सुना है चुनाव है….

सुना है चुनाव है,
बहुत निकट है
परस्थितियां भी अबकी
घोर विकट है

भवसागर की छोड़ो,
किसे पड़ी है?
यहाँ चुनावी नैया
मझदार खड़ी है

“विकास” रूपी पतवार
गर्त में गया है
प्रतिमा के सिवा नहीं,
कुछ भी नया है

रफाएल पर विपक्ष का
पुरजोर है हमला
“भ्रष्टाचार मिटेगा”
क्या ये भी था जुमला?

जीवन में सहर्ष जो कभी
राम नहीं गाते हैं
मरणासन्न हो उन्हें क्या
राम याद आते हैं?

…….अभय ……

Note: A true poet doesn’t side with any establishment. Neither Left nor Right. Read it in this perspective.

समिधा

Samidha

समिधा

चहोदिशी यज्ञ की वेदी के
चौपाल लगाए लोग बैठे
सुधा कलश की आश लगाए ,
टकटकी लगाए, लोग बैठे
कह दो उन्हें कि इस यज्ञ की
समिधा पहले ही स्वाहा हो चुकी है
ज्वाला जो धधकती थी इसमें ,
शनैः शनैः कर अब बुझ चुकी है
समिधा बन अब खुद ही
यज्ञ कुंड में जलना होगा
सरिता हेतु अब हिमगिरि सा
मौन रह, खुद ही गलना होगा

…..अभय…..

समिधा-यज्ञ में आहुति हेतु प्रयोग की जाने वाली लकड़ी

सशर्त प्रेम …

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नेह अगर है मुझसे तो बोलो

तुम क्या क्या कर सकते हो

जान ले सकते किसी की

या अपनी जान दे सकते हो ?

 

निष्ठा को साबित करने को

मैंने भी मन में ठान लिया

निज प्राणाहुति हेतु

तलवार गले पर तान लिया

 

तभी कुटिल मुस्कान लिए

उसने मुझसे बोला

अपने अप्रत्यासित अनुरोध का

राज़ था उसने खोला

 

“मुझे तो बस ये देखना था

तुम किस हद तक जा सकते हो

मेरे लिए क्या तुम अपना

सर्वस्व त्याग कर सकते हो”

 

तलवार गले पर था मेरे

तब भी न कोई टीस थी

निष्ठा को सत्यापित करना पड़ा

ये यातना बड़ी गंभीर थी

…….अभय……

P.S. Tried writing something new in different genre, please let me know does it make sense to you! Thank You.

मैं, मेरी बहना और ये राखी …

संग आज नहीं हो तुम मेरे
ये कैसी होनी है?
मिठास नहीं है मुख में मेरे
कलाई भी सूनी है!

उदास मन से मैंने उसे
वीडियो कॉल  लगाया
राखी पर घर में न होने की
अंतर्व्यथा बताया

सोचा था मन की व्यथा
उधर भी वैसी ही होगी
मेरी अनुपस्थिति तो शायद
उसे भी खूब खली होगी

पर शैतानी हँसी देख
मैं भौचक्का रह गया
राखी के अवसर पर डिमांड  सुनकर
मैं हक्का-बक्का हो गया

कहा उसने
“तुम हो कहीं भी, अमेज़न पर मेरे लिए
आज ही iPhone X आर्डर कर  देना
और हो सके तो मेरी तरफ से
कलाई पर, एक राखी बांध लेना”

मैंने मन में सोचा
“क्या घोर कलयुग
इतनी जल्दी ही आ गया
भाई बहन के दिव्य रिश्ते को
भौतिक iPhone X खा गया !!!

😂😂😂

………अभय…….

क्यों भाईयों, क्या आपके संग भी ऐसा ही हुआ..और बहनों अपने कुछ ऐसा ही किया …….

दीप, अंधकार, प्रकाश और मैं..

नमस्ते मित्रों, कैसे हैं आप लोग? पिछले कुछ समय से समय की व्यस्तता के कारण हिंदी कविताओं का सृजन और उनका प्रेषण नहीं कर पा रहा था. पर सिर्फ समय को दोष दूँ तो कोई ठीक बात नहीं, समय के संग संग मन में भी विचार पनपने चाहिए और खास कर तब जबकि आप कोई पेशेवर कवि न हों.
कई दिनों बाद आज कुछ विचार आया आप तक पहुँचाता हूँ, ज़रा संभालना 🙂

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जो तुम दीप बुझा दोगे अपनी
घोर अँधेरी रातों में
और सोचोगे कि मैं अब संग मौजूद नहीं
तो मैं बता दूँ आपको कि
मैं न तो प्रदीप्त प्रकाश हूँ
न ही खामोश अंधकार कोई
मेरा अस्तित्व न तो
चंद दीयों पर निर्भर करता है
दीये के जलने पर भी मैं हूँ
दीये के बुझने पर भी मैं ही
माना नज़र न आ सकूँ
पर नज़र न आना और अस्तित्व न होना
दोनों एक बात तो नहीं
बोलो, है कि नहीं ?

…….अभय…….