अंतिम न्याय

अंतिम न्याय ये जहाँ है आपका मुझपर आरोप भी आपके है न्यायलय भी आप ही का और न्यायाधीश भी आप ही के न कोई गवाह है संग मेरे और न कोई सबूत बचा है मेरी दलीलें को रखने को न कोई वकील रज़ा है सुना है कोई अदालत है इन सब अदालतों से ऊपर और कहीं... Continue Reading →

रिमिक्स “रस” :-D

नमस्ते दोस्तों! कविता या पद्य लेखन में विविध रस होते हैं, जैसे श्रृंगार रस, वीर रस, हास्य रस, शांत रस, भयानक रस, वीभत्स्य रस आदि.. यद्यपि मैं बहुत साधारण कविता लिख पाता हूँ, पर मेरा प्रयास रहता है कि इनमें विविधता रहे. मेरे द्वारा लिखी गयी श्रृंगार रस की कविता (जिसमें मिलन और विरह दोनों... Continue Reading →

मोरा मन..

घट-घट का पानी हमरे गले उतर आया सिर पर पड़ी कईयन पेड़ की छाया पर हमरे समझ ये नहीं आया काहे तोहरे पर ही आ के, मोरा मन भरमाया   🙂 @अभय

अनायास ही नहीं..3

मैं फिर से वापस आऊंगा... मैं कोई बरसाती झरना नहीं जो कुछ पल बहकर खो जाऊंगा हिमखंडो सा बना हुआ मैं अविरल प्यास बुझाऊंगा मैं कोई सतरंगी इंद्रधनुष नहीं जो पल भर में ग़ुम हो जाऊंगा मैं तो वो असीमित गगन हूँ जो हर पल तुम पर छाऊँगा मैं तुम्हारी छाया नहीं जो केवल दिन... Continue Reading →

मेरे संयम की परीक्षा मत लो अब मैं टूट पडूंगा किसी जाज्वल्यमान ज्वालामुखी सा अब मैं फूट पडूंगा ~अभय

ओ मेघा !

  ओ मेघा ! अलग सी प्रतीक्षा, अलग सा समां है है आने को मेघा, सभी हर्षित यहाँ हैं ओ मेघा! इस बार मेरे छत के ऊपर तुम आकर केवल मत मंडराना जो दूर से आये हो तुम लेकर उस जल को हम पर बरसाना सूखी जमीं है, सूखा है तन पीले पड़े पत्ते, रूखा... Continue Reading →

कुछ और..

कुछ और.. कुछ और नहीं मन में मेरे बस मिलने को आ जाता हूँ मत पूछो तेरी यादों में मैं क्यों घर बसाता हूँ मिलते ही तेरी आँखों से आँसू झर-झर बहते हैं लोग कहे उन्हें पानी,  मुझे वो  मोती ही लगते हैं अगणित रातों में जब-जब नींद तुम्हे न आती हो मेरी क्या गलती... Continue Reading →

पर्यावरण संरक्षण

On 5th June, World Environment Day is celebrated all across the globe. On this day I am republishing one of my poem,  which is dedicated to this theme . Hope you would like it. पर्यावरण संरक्षण सड़के हो रही हैं चौड़ी पेड़ काटे जा रहे! बांध बनाकर नदियों के अविरल प्रवाह हैं रोके जा रहे! ध्रुवों से... Continue Reading →

वो रास्ता..

वो रास्ता.. सच्चाईयों से मुँह फेरकर, मुझपर तुम हँसते गए दल-दल राह चुनी तुमने,  और गर्त तक धसते गए खुद पर वश नहीं था तुम्हें , गैरों की प्रवाह में बहते गए जाल बुनी थी मेरे लिए ही, और खुद ही तुम फँसते गए नमी सोखकर मेरे ही जमीं की, गैरों की भूमि पर बरसते... Continue Reading →

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