तमाचा

आज-कल गर्मी अपने चरम पर है और होनी भी चाहिए. समय पर सब कुछ हो तो उचित है. जलवायु परिवर्तन एक सच्चाई है और इसके कारण हम मौसम की अवधि और इसकी तीव्रता में बदलाव को सहज ही अनुभव सकते हैं. आपके उधर का मौसम कैसा है?

गर्मी का मौसम, शाम को दो चार दोस्तों का जमावड़ा और गन्ने के रस की दुकान, क्या जबरदस्त मिश्रण है. आपको नहीं लगता? कल रविवार था और लगभग कुछ ऐसा ही संयोग बना. जहाँ हम रुके उस गन्ने की दुकान को एक महिला चला रहीं थी. पास ही में उसके दो बच्चे खेल रहे थे. एक आठ-दस साल का होगा. उसका काम ग्लास में भरे गन्ने के रस को उचित ग्राहक तक पहुँचाना था और ख़ाली गिलास को वापस ले जाना था. दूसरा शायद उससे छोटा हो, पर पक्का पक्का नहीं कह सकता.

गन्ने का रस, उसमें पुदीने के पत्ते का मिश्रण और बर्फ की छोटी-छोटी सिल्ली. मैं फिर गिलास नहीं गिनता हूँ और खास कर तब जब कि पैसे देने की बारी अपनी न हो. कल ऐसा ही सुअवसर था.

दोस्तों के बीच बातें शुरू हुई. IPL की. राजनीति की. देश की अर्थव्यवस्था की. पेट्रोल के बढ़ते दामों की. एक मित्र ने Bollywood को बीच में घुसेड़ना चाहा. बाकि बचे हुए लोगों ने उसको जबरन चुप करवा दिया. मेरी भी मौन स्वीकृति थी.

बीच-बीच में गन्ने के रस आते रहे और निर्बाधित रूप से पेट में जाते रहे. इसी बीच वो दोनों छोटे बच्चे आपस में लड़ लिए. वजह पता नहीं और उस उम्र में वजह होती भी है क्या? मेरी दृष्टि एक बार उन दोनों की तरफ गयी पर मेरे एक मित्र ने मेरे पसंदीदा राजनितिक दल पर लांछन लगाना शुरू किया. मैं राजनितिक दृष्टि से काफी संवेदनशील (politically sensitive) हूँ. अपने ध्यान को उन बच्चों से खींचकर अपने पसंदीदा राजनितिक दल के बचाव में तर्क प्रस्तुत करने में लगा दिया. राजनितिक बहस की मर्यादा को कायम रखते हुए हमारी आवाज़ अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध समाचार चैनल के वक्ता के सामान तीखी हो चली. दुकान को चलाने वाली महिला के हाव भाव को देखकर यह लग रहा था कि शायद उसे हमारा उसके दुकान पर बहस करना पसंद नहीं आ रहा था. पीछे से दोनों बच्चों ने हमसे प्रेरणा लेकर और भी सक्रिय हो गए और जम के लड़ने लगे.

तभी आयी झन्नाटेदार आवाज़. जूस की दुकान वाली ने अपने बड़े बेटे के गाल पर रसीद कर दी एक जोरदार थप्पड़. उनकी लड़ाई ख़त्म. हम लोग आपस में एक दूसरे को देखने लगे. हमारी बहस जो ध्वनि की चोटी (highest pitch) पर पहुँच गयी थी, वो भी ख़त्म.

हम यह सोचने लगे कि ये तमाचा कहीं हमारे लिए ही प्रतीकात्मक (symbolic) रूप में तो नहीं था. हमारी चुप्पी तो यही बयां कर रही थी कि महिला अपने उद्देश्य में सफल रही. मैंने अपने एक मित्र (जिसकी आज पैसे देने की बारी थी) के तरफ इशारा करके पैसे बढ़ाने और वहां से खिसकने का संकेत किया. मेरे मित्र ने भी संकेत को भली भांति समझा.
कुछ सेकंड की चुप्पी के बाद वह बच्चा अचानक से रोना शुरू कर दिया. उसके स्वर की ऊंचाई काफी ज्यादा थी. अपनी माँ की तरफ देखकर वह फूट-फूट कर रोने लगा. आँखों से आँसू गिर रहे थे और वह अपने अलाप में “माँ-माँ” शब्द को दुहरा रहा था. (अब उसके रोने को मैं शब्दों में कैसे बयां करुँ, आशा है आप कल्पना कर पा रहे होंगे )

मेरे दोस्त ने पैसे बढ़ाये. मेरा ध्यान रोते हुए बच्चे पर टिका रहा. सच कहूँ, आप किसी से कहना मत, बचपन में मेरी भी खूब धुनाई हुई है पर हाँ, मुझे इस बात को कोई घमंड नहीं है. 😝 पापा से भी और माँ से भी. बराबर की कुटाई. पर अब जब हम तीनों कभी इस विषय पर बात करते हैं तो तीनों के बीच इस विषय को लेकर काफी विवाद रहता है. मैं कहता हूँ आप दोनों ने मुझे बराबर कूटा है. पापा कहते हैं कि मैंने नहीं, मम्मी ने ज़्यादा मारा, माँ कहती है कि पापा ने. इस विवाद का, कश्मीर मुद्दे के सामान, आज तक कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है. अब मैंने भी इस मुद्दे पर बात करना छोड़ दिया है. अंग्रेजी में कहे तो अब embarrassing लगता है.😀

ख़ैर वापस उस बच्चे पर. वो लगातार अपने विलाप में अपनी “माँ” को ही स्मरण कर रहा था. दोस्त ने पैसे दिए और हम आगे निकल गए पर मैं वही सोचता रहा कि बच्चे को उसकी माँ ने ही पीटा पर वह उन्हीं का नाम लेकर क्यों रो रहा है?

मैंने कई बार बच्चों में यही प्रवृति देखी है. ऐसा नहीं है कि बच्चे सिर्फ माँ से पिटाई खाते हैं. वो स्कूल में शिक्षकों से पीटते हैं, पर रोते समय वो अपने शिक्षक का नाम नहीं लेते, या दोस्तों से पीटने के बाद “दोस्त-दोस्त” कर नहीं रोते.

मैं निष्कर्ष पर निकला कि माँ का सम्बन्ध इन्हीं कारणों से भिन्न हैं. वो धुलाई भी करेंगी, खुद भी रोयेंगी, रुलायेंगी भी और हमें मन को शांत करने के लिए अपने नाम को बुलाने पर मजबूर भी करेंगी. ये माँ लोगों की भी अजीब प्रजाति होती है. आपको नहीं लगता ?

P.S. इस लेख को मैंने पहले अंग्रेज़ी भाषा में लिखा, पर मज़ा नहीं आ रहा था कारण की परिवेश देसी था। आशा है आपको पसंद आया हो, तो अपने विचारों को कमेंट के माध्यम से साझा करना न भूलें।

आम खरीद कर ही खाएँ :-P

Mango
Ye Gupta Ji ka aam nahi hai, Image Credit: Google

आम का मौसम अपने चरम पर है. तो आज जैसे ही मन्नू ने बताया कि गुप्ता जी अपनी बेटी को लाने 10 बजे स्टेशन जायेंगे, तो हम चार पांच मित्र काफी खुश हुए. पर मोहन ने संदेह भरी निगाह से मन्नू को देखा और पूछा “अबे मन्नू !!ये बता, गुप्ता जी 10 बजे अपनी बेटी को लेने स्टेशन जायेंगे, ये बात तुम्हे किसने बतायी?”
मन्नू शरमाते हुए मुस्कुरा के बोला “गुप्ता जी की बेटी ने व्हाट्सप्प किया”. मेरे सारे दोस्त एक स्वर में बोले “वोवो..ओओओओओ …..”
अब आप सोच रहे होंगे कि मैंने शुरू में आम की बात की और बात गुप्ता जी पर अटक गयी. गुप्ता जी का आम से क्या ताल्लुक? तो आप को कह दूँ कि दोनों के बीच गहरा ताल्लुक है.

बात ऐसी है कि गुप्ता जी का घर मेरे परम मित्र मन्नू के घर के बाजू में ही है. गुप्ता जी के घर के बगीचे में एक बड़ा सा आम का पेड़ है और इस साल उस आम के पेड़ ने तो सारी हदें ही पार कर दी हैं. उसपर इतने आम लदें हैं कि पत्तों की संख्या कम मालूम होती है. और आम भी कौन सा… लंगड़ा. आशा है आप सब लंगड़ा आम से अवगत होंगे, पूछ इसलिए रहा हूँ कि आज कल के युवा वर्ग से पूछो कि उनकों कौन सा आम पसंद है, यद्यपि वो खाएं हो या नहीं, एक ही उत्तर मिलता है “अल्फांज़ो..”

खैर मैंने भी बस एक बार ही खाया, या ऐसा कहिये कि एक बार ही अपने मामा के घर पर खिलाया गया. पर जो बात लंगड़े आम में है उसका जवाब नहीं. खासकर गुप्ता जी के लंगड़े आम को चोरी करने में. हम चार पांच मित्रगण बहुत दिनों से उस पेड़ पर हमला करने कि फ़िराक में थे, पर बीच में आ जाते थे गुप्ता जी और मन्नू कि इज़्ज़त.

थोड़ा गुप्ता जी का परिचय “गुप्ता जी हैं अव्वल दर्जे के खड़ूस, दूसरों की खुशी गुप्ता जी से देखी नहीं जाती खासकर बच्चों कि ख़ुशी. मुझे याद है बचपन में क्रिकेट खेलते समय न जाने कितनी बॉल गुप्ता जी के घर में गयी होंगी, पर वह मंगलयान कि तरह वापस कभी नहीं आयीं. आपको एक राज कि बात बताऊँ, कई बार तो बच्चे गुप्ता जी को बॉल न देने के पश्चात “कुत्ता जी ” “कुत्ता जी” कहते भाग फिरते थे. ” आशा है गुप्ता जी मेरा लिखा हुआ ब्लॉग नहीं पढ़ रहे होंगे. गुप्ता जी को आम के पेड़ से बड़ा लगाव है. वो जब काम करने के लिए कंपनी में जाते हैं तो उनका भूत मानो आम के पेड़ पर ही लटका रहता है, और उसकी रखवाली करता है “

खैर छोड़िये, तो वह मुहरत आ ही गया. समय हुआ था सुबह का साढ़े 9 , हम पहले से घात लगा कर बैठे हुए थे, गुप्ता जी जैसे ही अपनी मारुती ऑल्टो को लेकर निकले, हमने पत्थर के ढेलों से उनके पेड़ पर हमला बोल दिया. धपाधप – धपाधप -धपाधप की आवाज़ आ रही थी. उनकी पत्नी एक बार चिल्लाते हुए बाहर आयी, पर हम डटें रहे. हमला और तेज कर दिया. ये मौका दुबारा नहीं आने वाला था. पत्नी को लगा इन लड़कों के सर पर शायद आज खून सवार है, वो जान बचा के घर को भाग ली.

बहुत सारे आम जमीन पर पड़े थे. आशीष का काम था उन आम को चुनना. मैं, मन्नू, मोहन और सुजीत कश्मीरी पत्थरबाजों से प्रेरणा लेकर आम के पेड़ पर गोले बरसा रहे थे. तभी आशीष ने बोला भाई झोला भर गया है चल भाग अब. सब भागने को तैयार. मैं एक आम के ऊपर चार पांच पत्थर बर्बाद कर चूका था पर वह टूट ही नहीं रही थी. हाथ में आखिरी पत्थर. मैंने बोला, ये रहा आखिरी हमला. पर वह फिर भी नहीं टूटी.

आम की डालियों से टकरा कर वापस आयी और उसके साथ आयी चीखने के एक आवाज़. “अबे…. …साले…..सर फोड़ दिया…” हम सभी हतप्रभ. देखा तो मेरा आखिर फेका पत्थर डाली से टकराकर सीधा मन्नू के सिर पर गिरा …और उसमे से बहने लगी लाल लाल खून. .. मैंने जोड़ से बोला “यह पत्थर मैंने नहीं फेंका, शायद कोई पत्थर जो पहले पेड़ पर अटक गया होगा, वही गिरा हो…” बाकी चारो दोस्त मुझे ऐसी देख रहे थे जैसे भारत का पाकिस्तान से फाइनल हारने की वजह मैं ही था.

मैंने कान पकड़ कर मन्नू से माफ़ी मांगी, और तुरंत बाइक से डॉक्टर के पास ले गया. डॉक्टर ने दो स्टिच लगायी और पट्टी बाँध दी. कुछ दवा देकर उसे आराम करने को कहा.

कुछ भी कहिये मन्नू बड़ा दिलदार आदमी निकला. उसने कहा ” सालों! गुप्ता मेरे को छोड़ेगा नहीं, एक तो आम के पेड़ का सत्यानाश हो गया है और दूसरा मैं सर पर पट्टी बंधवा के उसके सामने सबूत के साथ खड़ा रहूँगा, उसकी बेटी क्या समझेगी?  इन सबमे मेरा योगदान सबसे ज्यादा रहा है, तो अब आम सबमे बराबर नहीं बटेगी, बल्कि दो आम मुझे ज़्यादा चाहिए…”
मैंने हँस के उसे गले लगा लिया, उसका दर्द शायद कुछ काम हो गया हो…
हम सोचने लगे कि जब गुप्ता जी अपनी बेटी को लेकर घर पहुंचेंगे तो उनका चेहरा देखने लायक होगा ….

और साथ ही में यह भी ख्याल आया कि आम खरीद कर खाने में भी कोई बुराई नहीं थी….पर ये मज़ा भी नहीं होता

और आप लोग इसको fiction की तरह ही लेंगे, और मुझतक पहुँचाना नहीं भूलेंगे कि कैसी लगी   …….

 

यह कौन सा मौसम है?

 

 

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Jubilee Park, Jamshedpur. Credit: Google Image.

 

शाम को पार्क में बैठा था. हवा में ठंडक थी, मानो पेड़ एयर कंडीशन में बदल गये हों. उसके हरेक झोके मन को सुकून पहुँचाने वाले थे.

तभी, अचानक एक लड़के ने “चिप्स, आलू का चिप्स ” की आवाज़ लगायी. मेरी ओर बढ़ा और पूछा क्या आप लोगे ? मैंने उसे देखा. 14-15 साल का होगा. चेहरा मासूम सा. मैंने पूछा कितने के दिए? उसने कहा 10 की एक पैकेट. फिर, मैंने उससे नाम पूछा और पूछा कि कहाँ रहते हो. उसने नाम बताया “मुन्ना” और जहाँ रहता था उस बस्ती का नाम बताया. फिर मैंने पूछा कि स्कूल नहीं जाते? उसने बोला “हाँ जाता हूँ न, मैथ्स में कुछ पूछिये”.

उसका आत्मविश्वास देख में हतप्रभ था. शायद ही मैं किसी को इतने विश्वास से कुछ पूछने को कह पाता. मैंने कहा एक पैकेट दे दो. उसने चिप्स के बोरे में से एक पैकेट मेरी तरफ बढ़ा दी और पूछा कि पानी की  बोतल भी लेंगे? मैंने कहा नहीं, इसकी जरुरत नहीं है.

मेरी जिज्ञासा उसमे बढ़ी और पूछा कि पापा क्या करते हैं. उसने कहा “गोलगप्पे बेचते हैं, आप सोच रहे होंगे कि मुझे चिप्स क्यों बेचना पड़ता है”. मैं चुप रहा, वो खुद बोलने लगा “मेरी दसवीं की परीक्षा है और आगे मुझे और पढ़ना हैं. इंजीनियरिंग करना हैं. उसके लिए कोचिंग लगेगी. तो मैं शाम के खाली  समय में कभी कभी आकर बेचता हूँ. ज़्यादा नहीं पर थोड़े सही पैसे तो बच जायेंगे, जो बाद में काम आएगी नहीं तो सारा बोझ पिताजी पर आ जायेगा”.
तभी अचानक सिटी की आवाज़ सुनाई दी, दो सिक्योरिटी गार्ड मेरी तरफ दौड़ा, मुझे समझ नहीं आया कि हुआ क्या? तब  वो लड़का भागा. मैं हैरान. कुछ दूर तक गार्ड ने दौड़ाया, पर उसकी दौड़ काफी तेज थी, गार्ड मोटे थे, थक कर रुक गए. फिर वापस आने लगे.

मेरे मन में शंका हुई कि लड़का कहीँ चोर-वोर तो नहीं. गार्ड सामने से गुजर रहे थे, मैंने पूछा गार्ड साहब, उसको दौड़ाया क्यों? गार्ड साहब बोले “बदमाश हैं साले, बार बार मना करो फिर भी नहीं सुनते, पार्क में चिप्स या और कोई चीज बेचना मना हैं. प्लास्टिक का पूरा कचड़ा फ़ैल जाता हैं”.

चोरी वाली बात सोच मन मे लज्जा आयी. गार्ड भी अपनी ड्यूटी पर थे, पर लड़का अपनी ड्यूटी से ज़्यादा कर रहा था. रिस्क लेकर भी. तभी अचानक याद आया की इस अफरातफरी में मैंने तो उसको पैसे दिए ही नहीं और वह जाने कहाँ चला गया. सोचकर अच्छा नहीं लग रहा था. चिप्स का पैकेट लिए मैं घर की तरफ निकला. पार्किंग में लगी अपनी गाड़ी में जैसे ही चाबी लगायी की वो लड़का वापस आया और बोला “भैया पैसे”? सच कहूँ तो आज तक किसी को पैसे देने में इतना मज़ा नहीं आया था. जेब से 100 का नोट निकाला और बढ़ा दिया उसकी ओर उसने 90 रुपये वापस किये और मुस्कुराते हुए दूर जाने लगा …वह जिधर जा रहा था वहां अंधकार था, शायद  सरकार के  स्ट्रीट लाइट की रौशनी वहां तक नहीं पहुंचती होगी.

रात ढली और घर पहुंचा. खाना खाने के पश्चात, जब सोने की बारी आयी तो गर्मी का अनुभव हुआ, पंखा को 5 पर करके सोना पड़ा. रात ज्यों ज्यों ढली तो ठण्ड भी बढ़ने लगी, २ बजे के आस पास चादर शरीर पर जगह बना चुकी थी. 5 बजे नींद खुली तो देखा, पतली कम्बल ने भी मुझ पर अपना कब्ज़ा जमा लिया था. उठा तो ठण्ड थी. नहाने के लिए पानी को थोड़ा गुनगुना करना पड़ा. घर से निकला तो बाहर पार्क में घास पर ओस की बूंद पड़ी थी, मानो बारिश हुई हो रात में. 9 बजे थे, धुप तो निकल चुकी थी पर हवा के चलने से तपिश का एहसास न था. पर दो पहर के खाने के बाद, जब बाहर खुले में निकला, तो ग्लोबल वार्मिंग का प्रत्यक्ष आभास हुआ. सोचा की फूल शर्ट पहनना ही ठीक था. पीने का पानी तो ठंडी ही जच रही थी. पेड़ के अधिकांश पत्ते पीले पड़कर, उसका साथ छोड़ रहे थे. पर कुछ नए पत्ते शाखों पर दिख रहे थे, मानो पेड़ की उम्मीद अभी बची हो…..
इतनी विविधताएं, यह कौन सा मौसम है …..बसन्त 🙂

 

मुन्ना के जीवन में कभी कोई ऐसा समय आया होगा कि वह सोचे कि अभी कौन सा मौसम है?

गरीबी क्या होती है ??

 

आज शनिवार की छुट्टी थी, तो घर पर ही पड़ा था दिन भर. साढ़े 4 या 5 बजे होंगे, घड़ी नहीं  देखी थी . मेरी चचेरी बहन, जो 5 साल की है, सोकर उठी और ब्रश करने लगी. मैं और माँ हैरान हो गए, कि लोग सुबह और रात को ब्रश करते हैं, ये शाम में ही शुरू हो गयी. मैंने पूछा कि छोटी तुम अभी ब्रश क्यों कर रही हो? उसने बोला, “बड़ा भैया, आज गुड मॉर्निंग नहीं बोले आप”.
मैं और माँ को बहुत हंसी आयी और सारा खेल समझ आ गया. दोपहर में काफी लंबे समय तक सोने के बाद शाम भी उसे सुबह जैसी लग रही थी और वैसे तो उसको रोज जबरदस्ती करके स्कूल के लिए तैयार करना पड़ता है और वो आज खुद तैयार हो रही थी. माँ से पता चला कि मैंने भी बचपन में एक दो बार ऐसी हरकत की  थी. बचपन होती ही ऐसी है, है ना ?
तभी मेरे नाम से कोई पुकारने लगा,पापा ने बताया कि अन्नू (मेरे बचपन का दोस्त, लड़का ही है :-P) मिलने आया है. हम बहुत अच्छे दोस्त हैं, पर बहुत दिनों से मुलाकात नहीं हो पायी थी. बहुत दिन मतलब 5-6 साल. वह कहीँ और रहता है. मैंने उसे घर में बुलाया. अब शाम रात में बदल रही थी और किसी तरह छोटी को  भरोसा हो पाया कि यह सुबह नहीं, बल्कि शाम ही था.
मैंने दो चेयर लिया और अन्नू को  छत पर चलने को कहा. छत पर शांति भी थी और हवा भी अच्छी चल रही थी. बहुत सारी बातें हुई. नयी-पुरानी. बात चीत के क्रम में उसने बताया कि वह कल अपने किसी संबंधी के बारात में गया था, पर वह मुझे थोड़ा उदास सा लग रहा था. मैंने पूछा कि भाई सब ठीक तो है. उसने बोला कि हाँ सब मस्त है. पर मुझे वह मस्त कहीं से भी नहीं लग रहा था. मुझे याद है कि हम दोनों काफी करीबी दोस्त हुआ करते थे . हम अपनी लगभग सारी बातें एक दूसरे से साझा करते थे. पर अब समय काफी बीत गया था. मैंने फिर से पूछा कि भाई सब सही में अच्छा है ना?
उसने कहा, अच्छा एक बात बताओ ये “गरीबी क्या है”? मैं गरीबी क्या है, को परिभाषित कर सकता था, पर इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं था, तो थोड़ा हिचकिचाने लगा और जो समझ आया बोला.

 

उसने कहा “कल कि एक घटना सुनोगे”? मेरे मन में बहुत अलग अलग विचार आ रहे थे. सोचने लगा कि शायद इन बीते दिनों वह शायद किसी बड़े आर्थिक संकट से गुजरा होगा. मुझे सोचता देख उसने झट से कहा, तुम्हे यह अजीब लग रहा हो पर मुझे तुम्हारे अलावा इसको शेयर करने वाला कोई और योग्य  नहीं मिला. मैंने कहा तुम सुनाओ घटना.
उसने शुरू किया. अब उसके शब्द ..
कल रात में मेरे सम्बंधित के घर से 8-9 बजे के करीब बारात निकली. मैं बहुत उत्साहित थे क्योंकि बहुत दिन हो गए थे किसी बारात में गए. माहौल भी बहुत अच्छा था, सबके चेहरे पर ख़ुशी, सबके चेहरे मुस्कुरा रहे थे, कोई जोक क्रैक कर रहा था तो कोई नए कपड़ों में तस्वीर लेने में व्यस्त था. दूल्हा, कार में पीछे, उसके आगे बारात. बारात के दोनों तरफ लाइट लिए हुए पंक्ति में बैंड बाजे वाले चल रहे थे. जैसा कि किसी भी अन्य भारतीय बारात में होता है. बीच में बैंड बाजे वाले अपने बाजे गाजे के साथ बारात में सामान्यतः बजने वाले गीत बज रहे थे.

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Representative Image, Source: Google.

चुकि, मुझे नाचना आता नहीं और नाचने में  शर्म भी आती है तो मैं बस भीड़ में खड़ा देख रहा था, पर यह भी सच है कि गानों के धुन पर पैर थिरक रहे थे . तभी मेरी नजर एक बैंड बाजे वाले कि तरफ पड़ी. वह मुँह से फूक कर बजने वाला इंस्ट्रूमेंट (नाम नहीं पता, नीचे की तस्वीर में देखिये ) बजा रहा था और उसकी आँखों से आंसू आ रहे थे. मैं विचलित हो गया. मन तो किया कि उससे पूंछू कि क्या हुआ पर क्योंकि  वह बजाने में व्यस्त था और उसके चुप होने से सारे बाराती, जो सब नाचने में व्यस्त थे, का ध्यान उधर आता. मैंने सोचा कि हो सकता है वह नया होगा और बजाने में शक्ति तो लगती होगी, इस वजह से आंसू आ गए हों.  पर अचानक से बारात के बीच में से किसी ने आवाज़ लगायी अरे!!  ज़ोर से बजा… जोर से.. मेरे यार कि शादी है….और कुछ देर बाद एक नवयुवक (जो मुझे नशे में लगा) गाली गलौज पर उतर आया और कहने लगा पैसे दिए हैं जोर से बजा जोर से, दुबारा ये शादी नहीं होगी…

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Representative Image, source: Google

तभी उस बाजे वाले जिसके आँखों  से आंसू बह रहा था उसकी इंस्ट्रूमेंट किसी और बाजे वाले ने ले ली और उसके हाथ में छन-छन करने वाली झालर पकड़ा दी. मैंने सोचा चलो ठीक है. पर मेरा ध्यान उसपर ही था. बीच बीच में मैं इधर उधर होता पर मेरा ध्यान पता नहीं क्यों उसपर ही टिका रहा. कुछ देर बाद देखा तो वह रो ही रहा था. अब तो मैं बस बारात पहुँचने का इंतज़ार करने लगा।

 

जल्द ही बारात पहुंची और मैं सीधे उसके पास. 35-40 के बीच में उसकी उम्र होगी. मैंने पूछा, क्या हुआ भैया कोई तकलीफ. वो चेहरे का रंग गिरगिट कि तरह बदल के बोला “नहीं नहीं बाबू कोई बात नहीं . हो सकता है कि उसने सोचा हो कि मैं उसकी क्लास लूंगा.  पर मैंने फिर उससे पूछा कि  बजाते समय रो क्यों रहे थे. अब मानो कि उसके दर्द की  बाँध टूट गयी हो. वो फबक कर रोने लगा और बोला “बाबू  मेरा बेटा कल गुजर गया . वह 15 साल का था. डॉक्टर बाबू बोले रहे कि ठीक हो जायेगा, 17 दिन तक इलाज भी होता रहा, महाजन से 35 हजार कर्जा भी लिए पर वह कल गुजर गया गया. मैं यहाँ बैंड बाजा बजा रहा हूँ, झाल बजा रहा हूँ… आकाश में पठाखे देख रहा हूँ… लोग नाच रहें हैं… मेरा बेटा मर गया….
इसी बीच मेरे एक संबंधी, जो शायद सिगरेट पीने बहार आये थे,  ने मुझे वहाँ देखा और बोले चलो अंदर यहाँ क्या कर रहे हो..मैंने बोला आप चलिए मैं बस आता हूँ. उसकी व्यथा सुनकर उसके दर्द का आंकलन करने में भी मैं असमर्थ था . मैंने पूछा,  तो आज आये क्यों? उसने बोला बाबू  गरीबी लाती है खींच के, हम कहाँ आते हैं. कर्जा चुकाना होगा महाजन का 35,000 का 6 महीना बाद 50,000 लेगा. हम कहाँ से पैसा लाएंगे. दिन भर मजदूरी किये, ये बारात का मौषम बार बार नहीं आता है. चला गया तो बहुत दिन बाद आता है. बेटा चला गया पर घर में दो बेटी है, पत्नी है, काम नहीं करेंगे तो खाना भी मुश्किल होगा.
मेरी आँखे भर आयी. मुझे लग ही नहीं रहा था कि मैं बारात में आया हूँ. पॉकेट में हाथ डाला 1500 निकले, उसके हाथ में थमाने लगा. पहले तो उसने बहुत मना किया पर मैंने शादी कि बख्शीस बता के दे दी. उसने आशीर्वाद में कुछ बोल बोले, मैंने ध्यान से सुना नहीं मेरे मन में बस एक ही बात चल रही थी…बेटा खो गया और उसको बैंड बजाना पड़ रहा है, झाल बजाने पड़ रहे हैं, लोगों को नाचता देखना पड़ रहा है, पटाखे जलाते देखने पड़ रहे हैं…

 

उसने कहा “अभय, गरीबी कुछ और नहीं, यही है” और कह कर चुप हो गया. घटना पूरी तरह झकझोरने वाली थी. और जिस तरह मेरे दोस्त ने वर्णन किया वह भी अद्वितीय था. मुझे उसपर गर्व हुआ कि उसने दर्द को देखकर अपना चेहरा नहीं फेरा. वह आज भी पहले की  तरह था, मुझे खुद पर संदेह हुआ कि क्या मुझे अब लोगों का कष्ट नहीं दीखता.

 

तभी माँ हमारे लिए गर्म-गर्म समोसे और इमली की चटनी बना के लायी. मैंने अपने दोस्त को  देखा उसने मुझे और फिर उसने  समोसे को उठाया. वह मुस्कुरा रहा था. माँ ने पूछा समोसे कैसे बने हैं ……

गांव का एक और दिन

एक और यात्रा एक और कहानी. जीवन भी तो ऐसी ही है न? हर एक की अलग अलग कहानी। कुछ भविष्य तक टिक पाती है, कुछ इतिहास में समा जाती है. पर होती सबकी है. चलिए तर्क में न जाकर, यात्रा वृतांत सुनाता हूँ. तर्क नीरस होती है, घटनाएं रोचक.

वर्षों बाद अपने पैतृक गांव जाने का प्रयोजन बना. कुछ काम से ही, वहां से निकलने के बाद वर्ना गांव लौटता कौन है?
खैर मैं बहुत उत्साहित था. घर पहुंचा, तो हैरान हुआ. वातावरण पूरी तरह बदला हुआ सा था. सड़क पक्की, बिजली 20 घंटे, घरों के छत पर कभी खप्पड़  राज किया करती थी, अब अल्पसंख्यक हो गई है, सड़कों से बैलगाड़ी तो डायनासोर की तरह   विलुप्त हो गई है, साप्ताहिक हाट की जगह घर के पास ही सभी आवश्यक चीजों की दुकान जम गई थी. मोटर साइकिल जो इक्के दुक्के दिखते थे, अब बहुतायत उपलब्ध है.

सोचा गांव के आसपास का एक चक्कर लगा लूं. एक पड़ोसी  से मोटरसाइकिल का अनुरोध किया तो वे  सहज ही तैयार हो गए और चाभी बढ़ा दी। निकलने वाला ही था कि परिवार के एक सदस्य ने कान में फुसफुसा के गाड़ी में पेट्रोल डलवा देने का इशारा किया। मैंने भी झट से कहा “हाँ-हाँ  ये भी कोई कहने की बात है”.
पड़ोस के एक बच्चे को पकड़ा, उससे नाम पूछा, उसने बोला “सिपाही”. मैंने कहा “तुम क्या बना चाहते हो यह नहीं पूछ रहा, बस नाम पूछ रहा हूँ “. उसने कहा “गांव में सब सिपहिया ही कहते हैं, वैसे स्कूल में मास्टर जी हाजिरी के समय राहुल कहते हैं”. मैं मुस्कुराया और बोला चलो गांव घुमा के लाता हूँ, वो बोला कि “आप घुमायेगें या मैं”? मैंने कहा “ठीक है तुम ही घूम लेना “और हम निकल पड़े .

गाड़ी में किक लगाया, थोड़ी ही दूर जाने पर अनायास ही निगाहें पेट्रोल के कांटे पर गयी। पाया कि, बाढ़ की कोसी नदी के समान यह भी उफान पर थी. उसका  कांटा खत्म होने के निसान के विपरीत दिशा को छू रहा था. मन में मंद मंद मुस्कुराया। नोटबंदी के दौर में 100 रूपये कीमत आप लोगों से भी छुपी नहीं होगी.

5-10 गांव छान मारा। सड़क बहुत ही अच्छी थी. ठंडी हवा शरीर को छू रही थी। चलाने का मजा ही कुछ और था। कुछ तस्वीरें भी ली।

तभी अचानक मोटर साइकिल ने जर्क लिया और बंद हो गई. 5-10 किक के बाद भी स्टार्ट नहीं हुई तो निगाहें फिर से पेट्रोल के कांटे की तरफ गई। अरे ये क्या 20-25 किलोमीटर चलने के बाद भी इसके स्तर में कोई गिरावट नहीं हुई थी।  उसकी विश्वसनीयता पर संदेह हुआ और गाड़ी को  हिला डुला के देखा. और संदेह विश्वास में बदल गया.

पेट्रोल खत्म!!!!!

पीछे बैठे राहुल (सिपाही कहना अजीब लग रहा था ) से पूछा पेट्रोल पंप कितनी दूर है। उसने जवाब दिया ” 7 किलोमीटर और मरे हाथ में दर्द भी है “.मैंने बोला “हाँ-हाँ समझ गया। तुम धक्का नहीं देना चाहते”. पर 7 किलोमीटर……

तभी वह  उछला और बोला पीछे देखिये, और मैं मुड़ा और ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने देखा कि एक दुकान पे खुले में ही पेट्रोल बिक रही है

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पेट्रोल की दुकान, जो मेरी रक्षा को आयी

भगवन का वरदान ही तो था, नहीं तो 7 किलोमीटर तक धक्का लगाना पड़ता.
दुकान पे पहुंचा तो देखा कि एक महिला बैठी हुई थी, मैंने बोला एक बोतल मुझे दे दीजिये. उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और भड़क कर थोड़ी मैथिलि थोड़ी हिंदी में बोली, “ये बोतल वोतल यहाँ नहीं चलता है हाँ, ये सब बाहरी आके ही बिहार को बदनाम करते हैं, हमारी सरकार ने बंद करके रखा है यहाँ पे. चाहिए तो जहाँ से आये हो वहीँ जाओ.

मैंने तुरत हिंदी से मैथिलि में स्विच किया और बताया कि मैं ये जो बाहर में रखी बोतल है उसकी बात कर रहा हूँ. वो मुस्कुराई और बोली “अरे! ऐसा बोलो न कि पेट्रोल चाहिए और बोल रहे थे बोतल चाहिए”. मैंने सोचा गलती स्वीकारने में ही भलाई है. और पूछा कि हाफ लीटर का कितना हुआ, वो बोली 40 रुपैया में आधा लीटर और 80 में एक लीटर. मैंने सोचा कि थोड़ा हास्यबोध (sense of humor) का उपयोग किया जाये, और बोला कि आपका तो नुकसान हो गया. वो बोली “वो कैसे”? मैंने बताया कि मेरे गाड़ी का  पेट्रोल खत्म हो गया था और आपका दुकान नहीं रहता तो 7 किलोमीटर धक्के देकर जाना पड़ता, सो आप 200 भी मांगती तो मज़बूरी में देना ही पड़ता.

वो लपक कर बोली ऐसे थोड़ी न होगा, पेट्रोल का दाम 100 रुपये में आधा लीटर ही है, मैं थोड़ा हंसने लगा और सोचा कि वो मजाक कर रही है . वो बोली हिहिया क्या रहे हैं, सच कह रहे हैं हम, आधा लीटर का 100 ही लगेगा, लेना है तो लीजिये वरना जाइये. मैंने कहा पर आपने कहा था कि 80 रुपये लीटर है. वो बोली तब कहा था सो कहा था अब 100 ही लगेंगे. मैंने 100 का नोट बढ़ाया और बोला आधे लीटर दे ही दीजिये, उसने माज़ा (Mazza) के हाफ लीटर बोतल में भरा पेट्रोल और एक कीप मेरी तरफ बढ़ाया. इससे पहले कि पेट्रोल का दाम और बढे, मैंने झट से पेट्रोल को टंकी में डाला. सेंस ऑफ़ ह्यूमर भरी पड़ गया था और सिपाही हंस रहा था.

 पेट्रोल डालते समय कुछ अंश हाथ में लग गया था,  अनायाश ही उसका सुगंध नाक में आयी, पर मैं हैरान हो गया कि उसमें से पेट्रोल की खुशबु कम और केरोसिन या मिट्टी तेल की खुशबु ज़्यादा आ रही थी. भारी मात्रा में मिलावट कि गयी होगी, ऐसा प्रतीत हुआ. अब मुझे संदेह हुआ कि मिट्टी तेल से गाड़ी चलेगी भी कि नहीं. किक मारने वाला ही था कि वो महिला आयी और 60 रुपये  वापस किया और मुस्कुराके बोली हम लोग भी मजाक कर सकते हैं और चली गयी. मुझे ये तरीका अच्छा लगा और हंसी भी आयी.

तभी दुकान के पास एक 20-22 साल का लड़का जो ये सब देख रहा था, मेरे पास आया और बोला इसका पति पियक्कड़ है, दिन भर दारू पी के  धुत्त रहता है, घर भी यही चलाती है.

किक मारा. गाड़ी एक किक में शुरू हो गयी, अब समझ कि वो बोतल सुनके इतना चिल्लाने क्यों लगी थी. गाडी चली  भी और पेट्रोल पंप तक पहुँच भी गया. हवा ठंडी ठंडी ही चल रही थी.किसान खेत में धान काट रहे थे, पूरी धरती सोने सी लग रही थी. सिपाही से पूछा “मेरे देश कि धरती सोना उगले…. ये गाना सुना है?” उसने कहा “हम पुराना गाना नहीं सुनते हैं”. मैंने पूछा कि “कौन सा गाना सुनते हो”? उसने कहा “कमरिया करे लपालप…..”. और वह जोर जोर से गाने लगा. मैंने भी गाड़ी के एक्सीलरेटर पे जोर लगाया. मोटर साइकिल पेट्रोल से चल रही थी कि केरोसिन से पता नहीं….