अपनी राह../ My Way

अपनी राह..

राहों को अपनी, मैं खुद ढूंढ लूंगा

बन पथप्रदर्शक तुम, मुझे न उलझाओ||

मेरे उम्मीदों को अब, पर जो लगें है

अपनी आसक्तियों की, न जाल बिछाओ||

कष्टों का पहाड़ सीधे सिर पर सहा है

राह के रोड़ों से तुम, मुझे न डराओ||

सच है जो कड़वा, मैंने खुद चख लिया है

उसपर झूठ की मीठी तुम, परत न चढ़ाओ||

मंज़िल है मुश्किल औ’ लंबा सफर है

जो बीच में हो जाना, शुरू से साथ न आओ||

ज्ञान की दीपक अब जो जली है

अपने आंसुओं से उसे न बुझाओ||

जाना जहाँ है, राहों में कांटे बिछे हैं||

मेरे लिए अभी फूलों की हार न लाओ||

निराश लोगों की लम्बी पंगत लगी है

सांत्वना भरे गीत तुम, उन्हें ही सुनाओ||

नम्रता में मैंने जीवन है जीया

मेरे खुद पे भरोसे को, मेरा अहम् न बताओ||

………..अभय…………

My Way

I will carve out my own way

Don’t pretend to be my guide and confuse me

My aspirations have found its wings

Don’t entrap it by your frail attachment

I have already faced mountainous hardships

Don’t scare me, with the petty pebbles of the road

I have already tasted the bitter truth

Don’t present it to me by coating sugar on it

All my ignorance is burning in the bonfire of Knowledge

Don’t extinguish it with your incessant tears

Destination is distant and path is treacherous

Don’t accompany me, if you are thinking of leaving in midway

There seems to be a long queue of despondent

Don’t console me, go and cheer them up

I have spent my whole life in humility

Don’t term my self-belief, as an act of arrogance

@Ab

सशर्त प्रेम …

lb

नेह अगर है मुझसे तो बोलो

तुम क्या क्या कर सकते हो

जान ले सकते किसी की

या अपनी जान दे सकते हो ?

 

निष्ठा को साबित करने को

मैंने भी मन में ठान लिया

निज प्राणाहुति हेतु

तलवार गले पर तान लिया

 

तभी कुटिल मुस्कान लिए

उसने मुझसे बोला

अपने अप्रत्यासित अनुरोध का

राज़ था उसने खोला

 

“मुझे तो बस ये देखना था

तुम किस हद तक जा सकते हो

मेरे लिए क्या तुम अपना

सर्वस्व त्याग कर सकते हो”

 

तलवार गले पर था मेरे

तब भी न कोई टीस थी

निष्ठा को सत्यापित करना पड़ा

ये यातना बड़ी गंभीर थी

…….अभय……

P.S. Tried writing something new in different genre, please let me know does it make sense to you! Thank You.

दीप, अंधकार, प्रकाश और मैं..

नमस्ते मित्रों, कैसे हैं आप लोग? पिछले कुछ समय से समय की व्यस्तता के कारण हिंदी कविताओं का सृजन और उनका प्रेषण नहीं कर पा रहा था. पर सिर्फ समय को दोष दूँ तो कोई ठीक बात नहीं, समय के संग संग मन में भी विचार पनपने चाहिए और खास कर तब जबकि आप कोई पेशेवर कवि न हों.
कई दिनों बाद आज कुछ विचार आया आप तक पहुँचाता हूँ, ज़रा संभालना 🙂

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जो तुम दीप बुझा दोगे अपनी
घोर अँधेरी रातों में
और सोचोगे कि मैं अब संग मौजूद नहीं
तो मैं बता दूँ आपको कि
मैं न तो प्रदीप्त प्रकाश हूँ
न ही खामोश अंधकार कोई
मेरा अस्तित्व न तो
चंद दीयों पर निर्भर करता है
दीये के जलने पर भी मैं हूँ
दीये के बुझने पर भी मैं ही
माना नज़र न आ सकूँ
पर नज़र न आना और अस्तित्व न होना
दोनों एक बात तो नहीं
बोलो, है कि नहीं ?

…….अभय…….

तमाचा

आज-कल गर्मी अपने चरम पर है और होनी भी चाहिए. समय पर सब कुछ हो तो उचित है. जलवायु परिवर्तन एक सच्चाई है और इसके कारण हम मौसम की अवधि और इसकी तीव्रता में बदलाव को सहज ही अनुभव सकते हैं. आपके उधर का मौसम कैसा है?

गर्मी का मौसम, शाम को दो चार दोस्तों का जमावड़ा और गन्ने के रस की दुकान, क्या जबरदस्त मिश्रण है. आपको नहीं लगता? कल रविवार था और लगभग कुछ ऐसा ही संयोग बना. जहाँ हम रुके उस गन्ने की दुकान को एक महिला चला रहीं थी. पास ही में उसके दो बच्चे खेल रहे थे. एक आठ-दस साल का होगा. उसका काम ग्लास में भरे गन्ने के रस को उचित ग्राहक तक पहुँचाना था और ख़ाली गिलास को वापस ले जाना था. दूसरा शायद उससे छोटा हो, पर पक्का पक्का नहीं कह सकता.

गन्ने का रस, उसमें पुदीने के पत्ते का मिश्रण और बर्फ की छोटी-छोटी सिल्ली. मैं फिर गिलास नहीं गिनता हूँ और खास कर तब जब कि पैसे देने की बारी अपनी न हो. कल ऐसा ही सुअवसर था.

दोस्तों के बीच बातें शुरू हुई. IPL की. राजनीति की. देश की अर्थव्यवस्था की. पेट्रोल के बढ़ते दामों की. एक मित्र ने Bollywood को बीच में घुसेड़ना चाहा. बाकि बचे हुए लोगों ने उसको जबरन चुप करवा दिया. मेरी भी मौन स्वीकृति थी.

बीच-बीच में गन्ने के रस आते रहे और निर्बाधित रूप से पेट में जाते रहे. इसी बीच वो दोनों छोटे बच्चे आपस में लड़ लिए. वजह पता नहीं और उस उम्र में वजह होती भी है क्या? मेरी दृष्टि एक बार उन दोनों की तरफ गयी पर मेरे एक मित्र ने मेरे पसंदीदा राजनितिक दल पर लांछन लगाना शुरू किया. मैं राजनितिक दृष्टि से काफी संवेदनशील (politically sensitive) हूँ. अपने ध्यान को उन बच्चों से खींचकर अपने पसंदीदा राजनितिक दल के बचाव में तर्क प्रस्तुत करने में लगा दिया. राजनितिक बहस की मर्यादा को कायम रखते हुए हमारी आवाज़ अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध समाचार चैनल के वक्ता के सामान तीखी हो चली. दुकान को चलाने वाली महिला के हाव भाव को देखकर यह लग रहा था कि शायद उसे हमारा उसके दुकान पर बहस करना पसंद नहीं आ रहा था. पीछे से दोनों बच्चों ने हमसे प्रेरणा लेकर और भी सक्रिय हो गए और जम के लड़ने लगे.

तभी आयी झन्नाटेदार आवाज़. जूस की दुकान वाली ने अपने बड़े बेटे के गाल पर रसीद कर दी एक जोरदार थप्पड़. उनकी लड़ाई ख़त्म. हम लोग आपस में एक दूसरे को देखने लगे. हमारी बहस जो ध्वनि की चोटी (highest pitch) पर पहुँच गयी थी, वो भी ख़त्म.

हम यह सोचने लगे कि ये तमाचा कहीं हमारे लिए ही प्रतीकात्मक (symbolic) रूप में तो नहीं था. हमारी चुप्पी तो यही बयां कर रही थी कि महिला अपने उद्देश्य में सफल रही. मैंने अपने एक मित्र (जिसकी आज पैसे देने की बारी थी) के तरफ इशारा करके पैसे बढ़ाने और वहां से खिसकने का संकेत किया. मेरे मित्र ने भी संकेत को भली भांति समझा.
कुछ सेकंड की चुप्पी के बाद वह बच्चा अचानक से रोना शुरू कर दिया. उसके स्वर की ऊंचाई काफी ज्यादा थी. अपनी माँ की तरफ देखकर वह फूट-फूट कर रोने लगा. आँखों से आँसू गिर रहे थे और वह अपने अलाप में “माँ-माँ” शब्द को दुहरा रहा था. (अब उसके रोने को मैं शब्दों में कैसे बयां करुँ, आशा है आप कल्पना कर पा रहे होंगे )

मेरे दोस्त ने पैसे बढ़ाये. मेरा ध्यान रोते हुए बच्चे पर टिका रहा. सच कहूँ, आप किसी से कहना मत, बचपन में मेरी भी खूब धुनाई हुई है पर हाँ, मुझे इस बात को कोई घमंड नहीं है. 😝 पापा से भी और माँ से भी. बराबर की कुटाई. पर अब जब हम तीनों कभी इस विषय पर बात करते हैं तो तीनों के बीच इस विषय को लेकर काफी विवाद रहता है. मैं कहता हूँ आप दोनों ने मुझे बराबर कूटा है. पापा कहते हैं कि मैंने नहीं, मम्मी ने ज़्यादा मारा, माँ कहती है कि पापा ने. इस विवाद का, कश्मीर मुद्दे के सामान, आज तक कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है. अब मैंने भी इस मुद्दे पर बात करना छोड़ दिया है. अंग्रेजी में कहे तो अब embarrassing लगता है.😀

ख़ैर वापस उस बच्चे पर. वो लगातार अपने विलाप में अपनी “माँ” को ही स्मरण कर रहा था. दोस्त ने पैसे दिए और हम आगे निकल गए पर मैं वही सोचता रहा कि बच्चे को उसकी माँ ने ही पीटा पर वह उन्हीं का नाम लेकर क्यों रो रहा है?

मैंने कई बार बच्चों में यही प्रवृति देखी है. ऐसा नहीं है कि बच्चे सिर्फ माँ से पिटाई खाते हैं. वो स्कूल में शिक्षकों से पीटते हैं, पर रोते समय वो अपने शिक्षक का नाम नहीं लेते, या दोस्तों से पीटने के बाद “दोस्त-दोस्त” कर नहीं रोते.

मैं निष्कर्ष पर निकला कि माँ का सम्बन्ध इन्हीं कारणों से भिन्न हैं. वो धुलाई भी करेंगी, खुद भी रोयेंगी, रुलायेंगी भी और हमें मन को शांत करने के लिए अपने नाम को बुलाने पर मजबूर भी करेंगी. ये माँ लोगों की भी अजीब प्रजाति होती है. आपको नहीं लगता ?

P.S. इस लेख को मैंने पहले अंग्रेज़ी भाषा में लिखा, पर मज़ा नहीं आ रहा था कारण की परिवेश देसी था। आशा है आपको पसंद आया हो, तो अपने विचारों को कमेंट के माध्यम से साझा करना न भूलें।

माँ ..

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कोई विश्व विजय को जाता है
पर सब कुछ हार वो आता है
संचित सारा धन खो जाता है
वर्षों का ज्ञान व्यर्थ नज़र आता है
सम्मान धरा पर सोता है
पुरुषार्थ प्रश्न में होता है
अपने मुख से भी वो डरता है
न वो जीता है न मरता है
बस एक आश्रय अब बच जाता है
वो माँ की शरण में आता है
जहाँ धन, सम्मान औ’ ज्ञान की बातें
सभी फीकी हो जाती है
क्या जीत है, हार है क्या
माँ को दोनों, एक नज़र आती हैं
गोद में माँ के सर रखकर
चैन की नींद वो सोता है
जिस विश्व विजय को निकला था वो
सारा सुख उसी गोद में होता है
अनायास ही आर्शीवचन से
उसमे शक्ति संचरण होता है
जीवन के व्यापक अर्थ का
ज्ञान प्रकाशित होता है
अनाशक्त अविचल भाव से
वो फिर खड़ा हो जाता है
अगले समर की रणचंडी को
फिर से वो जगाता है
फिर विश्व विजय को जाता है

……..अभय ……..

P.S. Generally mother’s are recognized as personification of Love, Kindness, Compassion, Affection and Attachment, I tried to portray them in different shade in this poetry. Incidentally, tomorrow being the Mother’s Day, when this platform will be flooded with the gratitude towards Mom, I hope you will find this post relevant. Do let me know about your valuable views on my writing.