बस तेरा इंतज़ार है..

धम से गिरे धरनी पर शिखर से, ज़ख्म गहरा हुआ चोट हरा हुआ पर गिरने का यह पहला वाक़या तो न था कई पहले भी लुढ़के गिरे गर्त में वर्षों तक सिसकते रहे मरणासन्न रहे संवेदनहीन रहे निर्जीव सा गौण रहे व्योम सा मौन रहे पर लड़ते रहे जूझते रहे झुलसते रहे आपदाओं में विपदाओं …

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द्वंद्व

धूप शीतल छाँव तप्त जिसे वर मिला था वही अभिशप्त जो दृढ खड़ा था संदेह में है अकर्मण्यता से नेह में है जो पथप्रदर्शक था पथभ्रष्ट है वो शिथिलता से आकृष्ट है जो नित्य स्वरूप का उसे कोई तो स्मरण कराये इस हनुमान को कोई जामवंत तक ले जाये .........अभय ........

मुट्ठी भर रेत

मुट्ठी भर रेत शीशे के पात्र में संचित रेत तुम्हारा जो रखा था वह धीरे धीरे बह रहा कुछ-कुछ तुमसे शायद वो कह रहा क्या तुम भी उसे सुन रहे ? इस शीशे के पात्र का आकार अलग हो सकता है इसमें संचित रेत की मात्रा भी असमान हो सकती है क्या तुम्हें अपने बचे …

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2012 to 2018: Same Story

2012 की शोरगुल, हल्ला गुल्ला, प्रतिरोध, प्रदर्शन, रोष, एकजुटता सबकुछ मेरे मानस पटल पर आज भी अंकित है. मैं भूला नहीं. कारण यह कि शायद 2012 आते-आते मेरी संवेदनशीलता अपना स्वरुप ग्रहण करने लगी थी. उस घृणित कृत की पुरजोर भर्त्स्ना कुछ इस कदर हुई थी कि मुझे लगा कि यह भारतीय इतिहास में एक ऐतिहासिक …

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