Caption it

When I clicked this image, I was quite enthusiastic to share it on my blog, as I found it very interesting. However, when I tried to give a caption to it,  numerous parallel thoughts  came in my mind, but none of them did  justice to it.

So I thought of sharing it and throw it open to the fellow bloggers to give it a title or caption. Will you try? 🙂

Do let me know if you liked it or not?

Caption it.

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आम खरीद कर ही खाएँ :-P

Mango
Ye Gupta Ji ka aam nahi hai, Image Credit: Google

आम का मौसम अपने चरम पर है. तो आज जैसे ही मन्नू ने बताया कि गुप्ता जी अपनी बेटी को लाने 10 बजे स्टेशन जायेंगे, तो हम चार पांच मित्र काफी खुश हुए. पर मोहन ने संदेह भरी निगाह से मन्नू को देखा और पूछा “अबे मन्नू !!ये बता, गुप्ता जी 10 बजे अपनी बेटी को लेने स्टेशन जायेंगे, ये बात तुम्हे किसने बतायी?”
मन्नू शरमाते हुए मुस्कुरा के बोला “गुप्ता जी की बेटी ने व्हाट्सप्प किया”. मेरे सारे दोस्त एक स्वर में बोले “वोवो..ओओओओओ …..”
अब आप सोच रहे होंगे कि मैंने शुरू में आम की बात की और बात गुप्ता जी पर अटक गयी. गुप्ता जी का आम से क्या ताल्लुक? तो आप को कह दूँ कि दोनों के बीच गहरा ताल्लुक है.

बात ऐसी है कि गुप्ता जी का घर मेरे परम मित्र मन्नू के घर के बाजू में ही है. गुप्ता जी के घर के बगीचे में एक बड़ा सा आम का पेड़ है और इस साल उस आम के पेड़ ने तो सारी हदें ही पार कर दी हैं. उसपर इतने आम लदें हैं कि पत्तों की संख्या कम मालूम होती है. और आम भी कौन सा… लंगड़ा. आशा है आप सब लंगड़ा आम से अवगत होंगे, पूछ इसलिए रहा हूँ कि आज कल के युवा वर्ग से पूछो कि उनकों कौन सा आम पसंद है, यद्यपि वो खाएं हो या नहीं, एक ही उत्तर मिलता है “अल्फांज़ो..”

खैर मैंने भी बस एक बार ही खाया, या ऐसा कहिये कि एक बार ही अपने मामा के घर पर खिलाया गया. पर जो बात लंगड़े आम में है उसका जवाब नहीं. खासकर गुप्ता जी के लंगड़े आम को चोरी करने में. हम चार पांच मित्रगण बहुत दिनों से उस पेड़ पर हमला करने कि फ़िराक में थे, पर बीच में आ जाते थे गुप्ता जी और मन्नू कि इज़्ज़त.

थोड़ा गुप्ता जी का परिचय “गुप्ता जी हैं अव्वल दर्जे के खड़ूस, दूसरों की खुशी गुप्ता जी से देखी नहीं जाती खासकर बच्चों कि ख़ुशी. मुझे याद है बचपन में क्रिकेट खेलते समय न जाने कितनी बॉल गुप्ता जी के घर में गयी होंगी, पर वह मंगलयान कि तरह वापस कभी नहीं आयीं. आपको एक राज कि बात बताऊँ, कई बार तो बच्चे गुप्ता जी को बॉल न देने के पश्चात “कुत्ता जी ” “कुत्ता जी” कहते भाग फिरते थे. ” आशा है गुप्ता जी मेरा लिखा हुआ ब्लॉग नहीं पढ़ रहे होंगे. गुप्ता जी को आम के पेड़ से बड़ा लगाव है. वो जब काम करने के लिए कंपनी में जाते हैं तो उनका भूत मानो आम के पेड़ पर ही लटका रहता है, और उसकी रखवाली करता है “

खैर छोड़िये, तो वह मुहरत आ ही गया. समय हुआ था सुबह का साढ़े 9 , हम पहले से घात लगा कर बैठे हुए थे, गुप्ता जी जैसे ही अपनी मारुती ऑल्टो को लेकर निकले, हमने पत्थर के ढेलों से उनके पेड़ पर हमला बोल दिया. धपाधप – धपाधप -धपाधप की आवाज़ आ रही थी. उनकी पत्नी एक बार चिल्लाते हुए बाहर आयी, पर हम डटें रहे. हमला और तेज कर दिया. ये मौका दुबारा नहीं आने वाला था. पत्नी को लगा इन लड़कों के सर पर शायद आज खून सवार है, वो जान बचा के घर को भाग ली.

बहुत सारे आम जमीन पर पड़े थे. आशीष का काम था उन आम को चुनना. मैं, मन्नू, मोहन और सुजीत कश्मीरी पत्थरबाजों से प्रेरणा लेकर आम के पेड़ पर गोले बरसा रहे थे. तभी आशीष ने बोला भाई झोला भर गया है चल भाग अब. सब भागने को तैयार. मैं एक आम के ऊपर चार पांच पत्थर बर्बाद कर चूका था पर वह टूट ही नहीं रही थी. हाथ में आखिरी पत्थर. मैंने बोला, ये रहा आखिरी हमला. पर वह फिर भी नहीं टूटी.

आम की डालियों से टकरा कर वापस आयी और उसके साथ आयी चीखने के एक आवाज़. “अबे…. …साले…..सर फोड़ दिया…” हम सभी हतप्रभ. देखा तो मेरा आखिर फेका पत्थर डाली से टकराकर सीधा मन्नू के सिर पर गिरा …और उसमे से बहने लगी लाल लाल खून. .. मैंने जोड़ से बोला “यह पत्थर मैंने नहीं फेंका, शायद कोई पत्थर जो पहले पेड़ पर अटक गया होगा, वही गिरा हो…” बाकी चारो दोस्त मुझे ऐसी देख रहे थे जैसे भारत का पाकिस्तान से फाइनल हारने की वजह मैं ही था.

मैंने कान पकड़ कर मन्नू से माफ़ी मांगी, और तुरंत बाइक से डॉक्टर के पास ले गया. डॉक्टर ने दो स्टिच लगायी और पट्टी बाँध दी. कुछ दवा देकर उसे आराम करने को कहा.

कुछ भी कहिये मन्नू बड़ा दिलदार आदमी निकला. उसने कहा ” सालों! गुप्ता मेरे को छोड़ेगा नहीं, एक तो आम के पेड़ का सत्यानाश हो गया है और दूसरा मैं सर पर पट्टी बंधवा के उसके सामने सबूत के साथ खड़ा रहूँगा, उसकी बेटी क्या समझेगी?  इन सबमे मेरा योगदान सबसे ज्यादा रहा है, तो अब आम सबमे बराबर नहीं बटेगी, बल्कि दो आम मुझे ज़्यादा चाहिए…”
मैंने हँस के उसे गले लगा लिया, उसका दर्द शायद कुछ काम हो गया हो…
हम सोचने लगे कि जब गुप्ता जी अपनी बेटी को लेकर घर पहुंचेंगे तो उनका चेहरा देखने लायक होगा ….

और साथ ही में यह भी ख्याल आया कि आम खरीद कर खाने में भी कोई बुराई नहीं थी….पर ये मज़ा भी नहीं होता

और आप लोग इसको fiction की तरह ही लेंगे, और मुझतक पहुँचाना नहीं भूलेंगे कि कैसी लगी   …….

 

Traitor and Loyalist

 

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Credit: Internet

कुछ विश्वसनीय लोगों के बल पे

हारी बाजी भी जीती जा सकती है

और एक विश्वासघाती के कारण

जीती बाजी भी मिट्टी में मिल जाती है

                                                                 ~अभय 

With a handful of loyalist,

even an inevitable lost war

can be turned in to victory,

but a single traitor

can ruin the entire cause.

                                                                ~Abhay

 

Be the cause of victory, not the defeat.

मंजिल

Today I am sharing one of my poem, which has already been published in my blog. Many of you might have already read it. However, many new bloggers have connected with me in recent times. So read / re-read it and let me know was it worth the time which you have spent in reading…

the ETERNAL tryst

मंजिल  

अकेले ही तुम निकल पड़े ,
कितनी दूर , कहाँ तक जाओगे ?
बैठोगे ज्यों किसी बरगद की छावों  में
मुझे याद कर जाओगे

मैं तेज नहीं चल सकती
मेरी कुछ मजबूरियां हैं
और यह भी सच है, जो मैं सह न सकुंगी
तेरे मेरे दरमियाँ, ये जो दूरिया हैं

कुछ पल ठहरते
तो मेरा भी साथ होता
सुनसान राहों में किसी अपने का
हाथों में हाथ होता

कोई शक नहीं तुम चल अकेले
अपनी मंज़िल को पाओगे
पर देख मुझे जो मुस्कान लबों पे तेरे आती थी
क्या उसे दुहरा पाओगे ?

…….अभय ……..

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प्रेम के भूखे

lord

भगवान कृष्ण जब पांडवों का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर गए, तो दुर्योधन ने उनके स्वागत के लिए बहुत सी  तैयारियां की थी. दुर्योधन जानता था कि पांडवों की सबसे बड़ी संपत्ति भगवान श्री कृष्ण ही हैं और एक बार यदि उन्हें अपने पक्ष में कर लिया जाये तो युद्ध में उसकी विजय निश्चित है.
तो उसने भगवन को प्रसन्न करने के लिए विश्राम की व्यवस्था एक आलीशान महल में की, उनके खाने के लिए बहुत ही उन्नत क़िस्म के पकवान बनवाये और फिर भगवान से विनम्रता पूर्वक अनुरोध किया कि वे उसके आमंत्रण को स्वीकार करें. पर भगवान तो सर्वज्ञ होते हैं, वे दुर्योधन की चापलूसी का उद्देश्य जानते थे. उन्हें पता था की यह सब दुर्योधन स्वार्थवश कर रहा है न कि प्रेमवश. सो भगवान ने यह कहकर उसके प्रस्ताव कि ठुकरा दिया कि उन्हें भूख नहीं है और वे वहाँ से निकल गए.
पर, वहाँ से निकलने के पश्चात भगवान अपने अनन्य भक्त विदुर के घर गए. यद्यपि विदुर हस्तिनापुर के राजदरबार में एक कुशल और सम्माननीय राजनयिक (diplomat) थे, फिर भी वे वहाँ की भोग विलासिता से परे एक सरल सा जीवन व्यतीत करते थे.

जब वह उनके घर पहुंचे थे, भगवान ने “विदुर विदुर” के नाम से पुकारा, पर विदुर उस क्षण अपने घर पर नहीं थे, उनकी पत्नी सुलभा ने जब यह दृश्य देखा कि स्वयं भगवान उनके द्वार पर खड़े हैं तो वह भाव विभोर हो गयी. वह सब कुछ भूल गयी और इतनी भी सुध न रही कि वो भगवान को अंदर आने को कहे. तो कुछ समय बीता तो भगवान ने स्वयं उनसे अनुरोध किया कि क्या वो उन्हें अंदर आने को नहीं कहेंगी ? अब उसे होश आया और हड़बड़ाहट में वो पागलों सा व्यवहार करने लगी. उसने भगवान को अंदर बुलाया. घर बहुत ही सामान्य था, घर में बस मूलभूत आवश्यकतों की चीजें ही मौजूद थी. वह इतनी भाव विभोर थी कि उसने भगवान को उल्टा पीढ़ा (wooden plank) पर ही बिठा दिया. और भगवान को निहारती रही. उसे अपने भाग्य पर भरोसा ही नहीं हो पा रहा था.

तभी भगवान ने कहा कि क्या वो बस उन्हें देखती रहेंगी या कुछ खाने को देंगी, उन्हें बहुत भूख लगी है.
तभी सुलभा को बहुत ग्लानि का एहसास हुआ और वह भाग कर रसोई की तरफ गयी. रसोई में कुछ खास था नहीं, बस कुछ केले थे, उसे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई पर चुकी भगवान को भूख जोरों की लगी है, यह एहसास कर वह केले उनके समक्ष ले आयी.

पर आगे जो घटा वो प्रेम की सीमा लांघ गया. वो भगवान के आने और उनके दर्शन से इतनी रोमांचित थीं कि उनका खुद पर कोई वश नहीं था, उन्होंने केले के छिलके को हटाया और उसमे सो जो फल बाहर आया, उसको भगवान को देने के बजाये उसे  फेककर, छिलके को भगवान को खाने को दे दिया. यद्यपि भगवान का खुद पर वश था, परन्तु वो अपने भक्त के प्रेम में इस कदर बह गए थे कि उन्होंने केले के छिलके को खाना शुरू कर दिया. सुलभा भगवान को देखती रही, केले के फल को फेंकती गयी, छिलका भगवान के तरफ बढाती गयी, और  भगवान उन छिलकों को खाते गए. कुछ देर ऐसा ही चला, तभी अचानक विदुर आ गए, यह दृश्य देख कि भगवान केले के छिलके खा रहे हैं और उनकी पत्नी प्रेम से उन्हें खिला रही है, वे अपनी पत्नी को क्रोधवश रोकने लगे. पर भगवान ने ऐसा करने से माना किया, पर विदुर के टोकने से पत्नी को उसके किये गए कृत पर बड़ा पछतावा हुआ और उनकी आँखे भर आयी.
तभी विदुर ने केले को छीलकर स्वयं भगवान को उसका फल खिलने लगे. कुछ फल खाने के पश्चात भगवान ने कहा, “विदुर, जो मिठास और आनंद केले के छिलके में थी वो तुम्हारे दिए गए केले के फल में नहीं”
सभी अश्रुमग्न थे भगवान भी, सुलभा भी और विदुर भी.
और जब मैंने यह दृष्टान्त पढ़ा तो मैं भी.

भगवान प्रेम के भूखे होते हैं न कि किसी के धन के, वे तो स्वयं इस जगत के अधिपति हैं सब कुछ उन्ही का तो है. उन्हें भावग्राही, अर्थात भावना को ग्रहण करने वाला, कहा जाता है.
भगवत गीता (9.26) में एक श्लोक आता है, जो कि बहुत प्रासंगिक है

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेमसे पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त द्वारा प्रेम पूर्वक अर्पण किया हुआ वह सब मैं स्वीकार करता हूँ ।

Propagate the Good

I recently observed a phenomenon that people like to propagate the ideology which they are professing, practicing and have allegiance to it.

From Capitalism to Socialism, from Autocracy to Democracy, from Secularism to Communalism, from Barbarism/Terrorism to Humanism, from Atheist to Theist and from Lover to Hater, one desire is common in all these groups that they want to increase their number.

Purpose behind mounting the number, in my view, is that they feel safe, secure and superior with like-minded people. We have heard from one of our ancient scripture/ Upanishad that “Satyamev Jayate” means “Truth alone Triumph”, but now this believe is only used for the decorative purposes and have taken a back seat as “Truth” is being adjudicated by the majority’s view.

Anyway, purpose of my writing is that, I believe that whatever good we are doing we should continue but proliferate, disseminate and transmit it to the other people. If we don’t broadcast it, surely negative vibes and action will occupy the vacuum.

If  peace will not be propagated, agitation will fill the void.

#ShubhRatri