चक्रवात..

चक्रवात ये जो तेरी यादों का समंदर है लगे जैसे कोई बवंडर है मैं ज्यों ही करता इनपे दृष्टिपात मन में उठता कोई भीषण चक्रवात मैं बीच बवंडर के आ जाता हूँ और क्षत विछत हो जाता हूँ इसमें चक्रवात का क्या जाता है वह तो तांडव को ही आता है अपने हिस्से की तबाही …

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जीत-हार

One of my Old Creation! I revisited it today, sharing with you all. Hope you all would like it.

the ETERNAL tryst

जीत-हार

हार के कगार पे

बैठे जो मन हार के

आगे कुछ दिखता नहीं

अश्रु धार थमता नहीं

शत्रु जो सब कुछ लूट गया

स्वजनों का संग भी छूट गया

ह्रदय वेदना से भरी हुई जो

खुद की बोझ भी सहती नहीं वो

याद रहे हरदम

ज़िंदा हो अभी , मरे न तुम

वह कल भी था बीत गया

यह पल भी बीत जाएगा

एक संघर्ष में हार से

युद्ध हारा नहीं कहलायेगा

सत्य धर्म के मार्ग चलो

हार से तुम किंचित न डरो

सत्य धर्म जहाँ होता है

वहीं जनार्दन होते हैं

जहाँ जनार्दन होते है

वहीं विजयश्री पग धोती है

……अभय…..

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साहस ..

दो परिस्थितयां हैं …एकदम सीधी सी, सुलझी हुई …पहला, जो साहसी होते हैं वो साहस से भरा कार्य करते हैं और  दूसरा, साहसिक कार्य करने से ही लोग साहसी कहलाते हैं ..तो हम किसी भी परिस्थिति में क्यों न हों, साहसी बनने का बराबर मौका है...

निहत्था ..

मैं निहत्था हूँ कब से और तेरे हाथों में है दो-धारी तलवार पर इतनी हड़बड़ाहट से, घबराहट से तुम उसे क्यों चला रहे हो ? कि मैं सुरक्षित हूँ और तुम खुद ही को घायल करते जा रहे हो ! कि तुम दो पल साँसे धरो पूरी ताकत इकट्ठी करो और फिर जो हमला करना …

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The Rise and Rise of Babas and Gurus

Came across an impressive piece of writing, so just sharing with you all. I have also given my opinion on this subject in comment section of it, based on my understanding. If time permits, you can also go through it. Thank You!

Pradyot

32973003922_4f3ef49022_nOver the last few months we came across several news items one after another related to what could be called as ‘parallel’ religion. The enormity of the issues was such great and the coverage in media was so exhaustive that not much is left for me to add. In addition to reporting the developments in the cases, there have also been thorough analyses and commentaries on various aspects of the issue.

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हिंदी का जश्न मनाते हैं…

आज हिंदी दिवस है. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी और 1953 से ही हिंदी दिवस को मनाने की परंपरा चली आ रही है. आप सब जो हिंदी पढ़, लिख, बोल और सोच सकते हो, सभी को इस अवसर पर बधाई और जो ये सब नहीं कर सकते उनको विशेष बधाई, आप लोग भी हिंदी को पढ़िए और भारत की सबसे ज़्यदा बोली जाने वाली भाषा का लुत्फ़ उठाइये
आज के दिन मैं अपनी एक कविता को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ जो हिंदी को समर्पित है ….मैंने इसे पहले कभी लिखा था, आज पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ. आशा है आपको पसंद आएगी …

the ETERNAL tryst

हिंदी का जश्न मनाते हैं…

आज़ादी के इतने वर्ष बीत गए,

फिर भी हम खुद को

अंग्रेजी के अधीन क्यों पाते हैं ?

क्यों नहीं हम अब भी

हिंदी का जश्न मनाते हैं?

पश्चिम से है, तो बेहतर है

यह सोच इस कदर घर कर गयी है

हिंदी हमारी प्यारी,

कहीं पिछड़ कर रह गयी है!

सिर्फ अंग्रेजी पर ही नहीं

अंग्रेजियत पर भी हम प्रश्न उठाते हैं

क्यों नहीं हम अब भी

हिंदी का जश्न मनाते हैं?

बदल गया है दौर,

शब्दों के चयन भी बदल जाते हैं

“नमस्ते” कहने से ज़्यादा लोग अब,

“हाय , हैल्लो” कहने में गर्व पाते हैं

बच्चों को “मछली जल की रानी” के बदले

शिक्षक अब, “जॉनी जॉनी” का पाठ पढ़ाते  हैं

क्यों नहीं हम अब भी

हिंदी का जश्न मनाते हैं?

जब चीन, चीनी में है बोलता

जर्मनी जर्मन में मुँह खोलता

रशियन रुसी में आवाज़ लगाते हैं

तो फिर भारतीय ही हिंदी से क्यों…

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