बसंत

iw
Image Credit: Dinesh Kumawat

बसंत

आज मेरे आँगन में
आम के पेड़ पर मंजर आया है
जाने वो मंज़र कब आएगा
जब तुम मेरे आँगन में आओगे !

उसी पेड़ की किसी शाख पे बैठे,
कोयल ने राग भैरवी गाया है
जाने तुम कब आकर आँगन में
राग बासंती गाओगे!

मंज़र की ख़ुशबू में
शमा पूरी तरह है डूबा
जाने कब तेरी महक
घर आँगन में छाएगा
वह मंज़र कब आएगा !

सूरज ढली, चाँद शिखर पर आयी
विचलित हुई, तुम्हें आवाज़ लगायी
पदचाप सुनी, भागी चली आयी
पर अब भी आंगन सूना है!!!
वह मंज़र कब आएगा
जब तुम आँगन में आओगे!

Advertisements

एक और गणतंत्र दिवस..

कल देश गणतंत्र दिवस मनायेगे, मनाना भी चाहिए. देश कैसे चलेगा, यह निर्णय तो आज ही के दिन 1950 में लिया गया था. कल नेताओं का भाषण होगा, पर सोचता हूँ, क्या देश के हर व्यक्ति के घर में रात का राशन होगा? अरे छोड़िये साहब, क्या हर एक व्यक्ति का अपना घर भी है? राजपथ पर जो परेड होगी, झांकियां निकलेगी, जब लोग उन्हें अपने टेलीविजन पर देखेंगे, तो उसकी चकाचौंध में यह प्रश्न निश्चय ही कहीं खो जायेगा. खैर एक बात तो तय है, लता दीदी की “ऐ मेरे वतन के लोगों….”, जो भावुक हैं और राष्ट्रभक्त भी, उन्हें आज भी वैसे ही रुलायेगी…

मैं अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध लेखक (नाम नहीं लूंगा, भारतीय ही हैं) का लेख पढ़ रहा था. वो राष्ट्रीयता को अपने हिसाब परिभाषित करने में लगे हुए थे. लेख पढ़के गुस्सा भी आया और हताषा भी हुई, कि लेखक देश को यूरोप और अमरीका के चश्मे से क्यों देखता हैं? क्या हम, देश को परिभाषित करने में सक्षम नहीं हैं?

देश की वर्तमान परिस्थिति पर सोचते सोचते कलम उठाया, कुछ पंक्तियाँ लिखीं, कविता कहूँ या नहीं आप तय कीजिये और बताइये कैसी लगी…

nation
Image Credit: Internet

देश भक्तों की टोली चली है

हर तरफ ये नारा है

हिन्द सागर से हिमालय तक

पूरा भारत हमारा है


चुनौतियों से भरा पहर है

देशद्रोही सभी मुखर हैं

“अफ़ज़ल” “अज़मल” को हैं शहीद बताते

और सेना पर पत्थर बरसाते


इनमें से कुछ तो खुद ही को

बुद्धिजीवी हैं बतलाते

और, भारत माता की जय कहने पर

वे अपना मुख हैं बिचकाते


पर, उनपर जब हम प्रश्न उठाते

तो वे “असहिष्णु” “असहिष्णु” चिल्लाते

फिर लाइन लगाकर वे

“अवार्ड वापसी” को लग जाते 


वे “पांच-सितारा” होटल को जाते

और जनता को गरीबी की पाठ पढ़ाते

चुनाव जितने के खातिर

हम जाती धर्म पर बांटे जाते


देशभक्तों को जगना होगा

एक स्वर में कहना होगा

जिसे भारत में रहना होगा

भारत की जय कहना होगा


देर बहुत अब हो चुकी

बांग्ला और पाक जन्म ले चुकी

और नहीं लूटने देंगे

देश और नहीं टूटने देंगे


देश भक्तों की टोली चली है

हर तरफ ये नारा है

हिन्द सागर से हिमालय तक

पूरा भारत हमारा है

………अभय………

 

शब्द सहयोग:

मुखर : Vocal, Vociferous or Outspoken.

असहिष्णु : Intolerant 

बुद्धिजीवी : Intellectuals 

 

अकेले चलने में बुराई क्या है ?

 

istand

अकेले चलने में बुराई क्या है ?

कि जब हुआ अकेले आना

और जाना भी है अकेले

तो फिर क्या सोचना

कि ये तन्हाई क्या है

अकेले चलने में बुराई क्या है ?


कि जब सिंधु में ही है गोता लगाना

और छिपे सागर के मोती

को खुद ही सतह तक लाना

तो फिर क्या सोचना

कि सागर कि गहराई क्या है

अकेले चलने में बुराई क्या है?


कि जब इंतज़ार है हर किसी को

कि कोई राह दिखायेगा

बुझे हुए दीपक की लौ

कोई फिर सुलगायेगा

तो फिर हर दो कदम पर रुक कर

ये अंगड़ाई क्या है

अकेले चलने में बुराई क्या है?


कि जब पल भर में यहाँ

रिश्ते बदल जाते हैं

जिन्हें थे अपना समझते

वे कहीं और नज़र आते हैं

तो फिर क्या सोचना

कि इन रिश्तों कि कमाई क्या है

अकेले चलने में बुराई क्या है?


कि जब सुनसान राहों पर

कोई साथ नहीं दिखता

पकड़ ले कस के जो हाथों को

वो हाथ नहीं दिखता

तो राही चल अकेले और नाप ले

नभ की भी ऊंचाई क्या है

अकेले चलने में बुराई क्या है?

………..अभय………..

मंज़िल मेरी ….

img_20170119_080256
Clicked it in Bay of Bengal 

मंज़िल मेरी ….

हूँ किस दिशा से आया,
जाना मुझे किधर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा,
मंज़िल मेरी उधर है

आसमान से उतरी
और जब धरा पे ठहरी
अमावस की वो काली रात मानो
पूर्णमासी में हो बदली
कैसा अनुपम और मधुर
होता वो पहर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा
मंज़िल मेरी उधर है

दूबों पर पड़ी ओस जैसी
हो तुम निर्मल
फूलों की पंखुड़ियों जैसी
हो तुम कोमल
मेरे मन से टकराती हर पल
तेरी यादों की लहर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा
मंज़िल मेरी उधर है

नज़रों से होकर ओझल
जाने कहाँ भटकती
बिन देखे तुम्हें एक पल भी
साँसे मेरी अटकती
लौट चलो हैं जहाँ शहर मेरा
कि वहीं कहीं, तेरा भी तो घर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा
मंज़िल मेरी उधर है

………अभय …………

 

Hello Friends, Once again I have given a try to translate my poem in English. Hope those who don’t read or understand Hindi, it may help them a bit to get an idea behind it.

My Destiny…

Don’t know from where I have come,

Nor even know, where I have to go

Where our tryst will be

I consider it as my destiny

 

When you appeared from the sky

And stayed on earth

Even the darkest of nights

Turns in to full moon light

How incredible and sweet is that time!

Where our tryst will be

I consider it as my destiny.

 

You are pristine,

Same as the dew on the new blade of grass

You are delicate,

Same as flower petals.

My mind is always shoved

By waves of your memory.

Where our tryst will be

I consider it as my destiny

 

Where do you wander

By staying away from my sight

Without seeing you even for a second

I couldn’t breath right

Come and return to my city

Coz somewhere around there, your home too lies

Where our tryst will be

I consider it as my destiny.

 

अब भी मेरे सपनो में आती हो…

boy
Photo Credit:onehdwallpaper.com

अब भी मेरे सपनो में आती हो…

हाथ पकड़ती थी वो,
कुछ दूर संग मेरे आती थी
देख न ले दुनिया,
जग से नज़रें चुराती थी
मेरे मन के हर कोने में
आशियाँ बनाती जो
तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…

अक़्सर लंबी थी जो राहें लगती,
संग तेरे सिमट जाती थी
जिसकी हर हँसी,
पीहू की याद दिलाती थी
हर सावन की पहली बारिश में,
संग मेरे भीग जाती जो
तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…

दिन तो बीते जैसे-तैसे,
पर रात ठहर जाती थी
अनायास ही मन को मेरे,
याद तेरी आती थी
हर पल हर क्षण संग हो मेरे,
एहसास कराती जो
तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…

………..अभय………..

हिंदी का जश्न मनाते हैं…

हिंदी का जश्न मनाते हैं…

आज़ादी के इतने वर्ष बीत गए,

फिर भी हम खुद को

अंग्रेजी के अधीन क्यों पाते हैं ?

क्यों नहीं हम अब भी

हिंदी का जश्न मनाते हैं?

 

पश्चिम से है, तो बेहतर है

यह सोच इस कदर घर कर गयी है

हिंदी हमारी प्यारी,

कहीं पिछड़ कर रह गयी है!

सिर्फ अंग्रेजी पर ही नहीं

अंग्रेजियत पर भी हम प्रश्न उठाते हैं

क्यों नहीं हम अब भी

हिंदी का जश्न मनाते हैं?

 

बदल गया है दौर,

शब्दों के चयन भी बदल जाते हैं

“नमस्ते” कहने से ज़्यादा लोग अब,

“हाय , हैल्लो” कहने में गर्व पाते हैं

बच्चों को “मछली जल की रानी” के बदले

शिक्षक अब, “जॉनी जॉनी” का पाठ पढ़ाते  हैं

क्यों नहीं हम अब भी

हिंदी का जश्न मनाते हैं?

 

जब चीन, चीनी में है बोलता

जर्मनी जर्मन में मुँह खोलता

रशियन रुसी में आवाज़ लगाते हैं

तो फिर भारतीय ही हिंदी से क्यों शर्माते हैं

क्यों नहीं हम अब भी

हिंदी का जश्न मनाते हैं?

 

शान हमारी हिंदी है

अभिमान हमारी हिंदी है

पहचान हमारी हिंदी है

हिंदी का गुणगान हम करते जायें

हिंदी का जश्न मनायें

………..अभय ……….

 

 

नोट: जिन भारतीय को “हिंदी” से समस्या है उनसे अनुरोध है कि वे मेरी कविता में “हिंदी” के स्थान पर अपनी क्षेत्रीय भाषा जैसे तमिल, तेलगु, मलयालम, बंगाली या  मैथिलि का उपयोग कर सकते हैं  :-), मुझे कोई परेशानी नहीं है.

 

विश्वास और परिश्रम

अंग्रेजी कैलेंडर में नया वर्ष आ चुका है, वर्ष 2017. सोचा कि वर्डप्रेस पर अंग्रेजी नववर्ष की शुरुआत, नए वर्ष में लिखे अपने एक मुक्तक से करूँ. वैसे तो आप सब जानते होंगें कि मुक्तक काव्य शैली की ही एक विधा हैं. मुक्तक वह काव्य है जिसमें विचार का प्रवाह किसी एक निश्चित दिशा में नहीं होता बल्कि टेढ़ा-मेढ़ा (नॉन-लिनियर) चलता है, पर यह आवश्यक शर्त (necessary condition) नहीं है और यह कविताओं कि तरह लंबी भी नहीं होती. पढ़िए और मुझ तक पहुँचाइये कि आपको कैसी लगी.

विश्वास और परिश्रम

बाधायें बन पर्वत आती है तो आये

दुविधाएं, जो लोगों के मन को विचलित कर जाये

पर होता जिसे खुद पर दृढ़ विश्वास है,

मंज़िल तब दूर नहीं , बिलकुल उसके पास है

 

सुबह की धुन्ध को “आलसवस” , जो रात समझ कर थे सो गए

अपने चुने ही रास्तों में , जाने कहाँ वो खो गए

पर रुके नहीं जो रातों में , शर्दी में या बरसातों में

मिलते उन्हें ही हैं रास्ते  , जो जीते हैं सदा लक्ष्य के वास्ते

……………….अभय………………..