हँसना मत भूलिये…. ;-)

the ETERNAL tryst

il Credit: Google se uthaya

हँसना मत भूलिये…. 😉

ख़त उछाला मैंने तेरे छत पर,
तेरे पिता के हाथ आयी
भरी दोपहरी में मानों
हो मेरी सामत आयी

टशन में था तेरे छत के नीचे
दोस्त मेरा बुलेट पर ड्राइवर था
बन्दुक लेकर निकला तेरा बापू
मानों आर्मी का स्नाइपर था

बन्दुक देख मैंने झट से बोला,
अबे भाग, जल्दी से बुलेट दौड़ा
नहीं तो कोई और बुलेट चल जाएगी
काला चश्मा लेदर का जैकेट
सारी टशन मिट्टी में मिल जाएगी

हद तो तब हो गयी
बुलेट जब दगा दे गयी
उसने किक लगाया , सेल्फ लगायी
फिर भी वह स्टार्ट न हो पायी

दोस्त को बोला
अबे भाग, 100 मीटर वाली दौड़ लगा
गाड़ी छोड़, पहले
अब अपनी अपनी जान बचा

दोस्त मेरा वजनदार था
भागने में बिलकुल लाचार था
मैं दौड़ता गया
हाय! वो पकड़ा गया

मैंने सोचा अभी दौड़ते ही जाना है
कुछ भी हो अभी तेरे बापू…

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मंज़िल मेरी ….

the ETERNAL tryst

img_20170119_080256 Clicked itin Bay of Bengal

मंज़िल मेरी ….

हूँ किस दिशा से आया,
जाना मुझे किधर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा,
मंज़िल मेरी उधर है

आसमान से उतरी
और जब धरा पे ठहरी
अमावस की वो काली रात मानो
पूर्णमासी में हो बदली
कैसा अनुपम और मधुर
होता वो पहर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा
मंज़िल मेरी उधर है

दूबों पर पड़ी ओस जैसी
हो तुम निर्मल
फूलों की पंखुड़ियों जैसी
हो तुम कोमल
मेरे मन से टकराती हर पल
तेरी यादों की लहर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा
मंज़िल मेरी उधर है

नज़रों से होकर ओझल
जाने कहाँ भटकती
बिन देखे तुम्हें एक पल भी
साँसे मेरी अटकती
लौट चलो हैं जहाँ शहर मेरा
कि वहीं कहीं, तेरा भी तो घर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा
मंज़िल मेरी उधर है

………अभय …………

Hello Friends, Once again I have given a try to translate my poem…

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मंजिल

मंजिल  

अकेले ही तुम निकल पड़े ,
कितनी दूर , कहाँ तक जाओगे ?
बैठोगे ज्यों किसी बरगद की छावों  में
मुझे याद कर जाओगे

मैं तेज नहीं चल सकती
मेरी कुछ मजबूरियां हैं
और यह भी सच है, जो मैं सह न सकुंगी
तेरे मेरे दरमियाँ, ये जो दूरिया हैं

कुछ पल ठहरते
तो मेरा भी साथ होता
सुनसान राहों में किसी अपने का
हाथों में हाथ होता

कोई शक नहीं तुम चल अकेले
अपनी मंज़िल को पाओगे
पर देख मुझे जो मुस्कान लबों पे तेरे आती थी
क्या उसे दुहरा पाओगे ?

…….अभय ……..

सुनहरा धागा …

आज विश्व काव्य दिवस है, मतलब #World Poetry Day. आप सभी को बधाई. आज मेरी लिखी कुछ पंक्तियाँ आपके समक्ष …..धागे को विश्वास या भरोसे से बदल कर देखिये और इस कविता में इसकी सटीकता को ढूंढिए  …

 

arj

 

Background Image Credit: Google Image.

क्यों माँ ?? ..:-)

छोटी बहन की व्यथा से आहत होकर, उसके लिए दिल से निकला सहानुभूति से भरा कुछ अल्फ़ाज़. उम्मीद ही नहीं अपितु दृढ विश्वास भी है कि बच्चों के बीच इस पोस्टर को लेकर जाऊंगा तो उनका नेता बनने से कोई रोक नहीं सकता और माताओं के बीच इसी पोस्टर को लेकर गया तो बेलन से सिर पर सींघ अपने आप उग आएंगे.

विषय पर आपकी तो सहमति है न ? 🙂

 

children

ललकार ….

नमस्ते दोस्तों, आज आप लोगों के लिए वीर रस की एक कविता. एकदम ताज़ी. मुझ तक पहुँचाना मत भूलिये  कि कैसी लगी

ललकार

सुनसान हर गलियां यहाँ की
स्वाभिमान सबका सो रहा
शेर पहन गीदड़ की खालें
झुण्ड में क्यों रो रहा
झुण्ड में क्यों रो रहा

चुनौतियों से लड़ने का साहस
क्यों क्षिन्न होता जा रहा
पराक्रम जाने आज क्यों
पल्लुओं के पीछे घर बना रहा
पल्लुओं के पीछे घर बना रहा

हथियार सब धरी पड़ी हैं
सजोसज्जा के काम आ रहा
युद्ध की ललकार सुनकर भी
वो शांति का पाठ पढ़ा रहा
शांति का पाठ पढ़ा रहा

पुरुषार्थी हो, तो साबित करो
लोग प्रमाण मांगते हैं
मस्तक ऊँचा करके जीने की
कीमत वही जानते है
जो खुद को पुरुषार्थी मानते हैं
खुद को पुरुषार्थी मानते हैं

…….अभय ……

 

 

गांव का एक और दिन

कभी कभी पीछे मुड़कर देखना अच्छा लगता है ……

the ETERNAL tryst

एक और यात्रा एक और कहानी. जीवन भी तो ऐसा ही है न? हर एक की अलग अलग कहानी। कुछ भविष्य तक टिक पाती है, कुछ इतिहास में समा जाती है. पर होती सबकी है. चलिए तर्क में न जाकर, यात्रा वृतांत सुनाता हूँ. तर्क नीरस होती है, घटनाएं रोचक.

वर्षों बाद अपने पैतृक गांव जाने का प्रयोजन बना. कुछ काम से ही, वहां से निकलने के बाद वर्ना गांव लौटता कौन है?
खैर मैं बहुत उत्साहित था. घर पहुंचा, तो हैरान हुआ. वातावरण पूरी तरह बदला हुआ सा था. सड़क पक्की, बिजली 20 घंटे, घरों के छत पर कभी खप्पड़  राज किया करती थी, अब अल्पसंख्यक हो गई है, सड़कों से बैलगाड़ी तो डायनासोर की तरह   विलुप्त हो गई है, साप्ताहिक हाट की जगह घर के पास ही सभी आवश्यक चीजों की दुकान जम गई थी. मोटर साइकिल जो इक्के दुक्के दिखते थे, अब बहुतायत उपलब्ध है.

सोचा गांव के आसपास का एक चक्कर…

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