Maiden Century


Maiden Century

Well, in cricket, first century is always very special for any Batsman. When I was notified by one of the reader and later by the WordPress as well, that I had garnered 100 followers here, this event is more special for me than any of the cricketer would feel after hitting his first century. The reason is very simple. A cricketer can again hit a century, but this phenomenon is not going to happen again, as I hope, followers will tend to get add on from this tally.

My journey on WordPress, is associated with an incident. I generally preferred, in past,  to keep my poems and other write ups  close to  heart (which I still do, but not all) and occasionally revealed to the people, whom I deemed that they will understand it and value it. I kept my writings in a Diary, which contained nearly all my creations. I lost that Diary in  a journey. I was baffled and frustrated by this happening. Some of the poems I still remember, but many of them have gone forever. Due to that loss, I stopped writing for a while as I was not getting the feeling.  Then came a suggestion from a friend to write a blog, which initially I hesitated. But the fact that it will not meet the same fate of my diary due to its digital nature, I agreed upon.

When I joined WP, I find it a different world altogether. Exciting things happening around. New authors in making. Outbursts of emotions. Improvised writing and many more.

Yet, I find a terminology called “Follower” in WP very vague and unjustified. In my opine, followers in real sense are the appreciator, booster, motivator, critique and even guiding lamp for the author, who through their constant feedbacks encourages writer to improve their writings. By their motivating words, author gets a sense satisfaction, which is the oxygen for them.

On this occasion, when I reach this small yet significant landmark, I thank all of you who appreciated me even when my writing was not so good,  read the whole write ups when it was not very exciting, gave your valuable time when it the is most scarce thing in the world.

Thank you once again!!!

मेरे हिंदी के दोस्तों, इस अवसर पर आपको धन्यवाद कहे बिना तो मैं रह ही नहीं सकता. मेरी अधिकांश रचनाएँ हिंदी में ही है, अंग्रेजी समझ कम आती है और उसमें भावना आना तो मेरे लिए नामुमकिन ही है, और बिना भावना के कवितायेँ नहीं लिखी जा सकती. पर क्या करें फॉलोवर बेस अंग्रेजी से भी है और देश में अंग्रेजी प्रायः सभी समझते हैं खासकर जो इन्टरनेट का उपयोग करते हैं. इसलिए शुरुआत अंग्रेजी से की पर खत्म हिंदी से कर रहा हूँ. हिंदी के प्रति विशेष लगाव है और रहेगा.

आगे भी अपना आशीष बनायें रखें…



गांव मेरा और शहर तेरा

Credit: Of course, non other than Google.

गांव मेरा और शहर तेरा

तेरे शहर में सभी
मेहमान से क्यों हैं ?
भीड़ तो है सड़कों पर मगर
एक दूजे से अनजान क्यों हैं?

याद आता है मुझे मेरा गांव
मिट्टी की ख़ुशबू, वो पीपल की छांव
गाय चराते वहां के गोपाल
हँसी-ठहाको से भरा चौपाल

तेरा शहर बड़ा व्यपारी है
यहाँ पानी तक बिकता है
मेरे गांव में सुबह शाम
बुजुर्गों से दुआएं मुफ्त में मिलता है

सड़के तेरे शहर की चौड़ी चौड़ी
यहाँ मन क्यों संकरी हो जाती है?
गांव में तो बिजली नहीं है फिर भी
मन से सबके सरलता की प्रकाश आती है

तेरे शहर में तुझे लोग
बड़ी गाड़ी और बड़े घर से जानते हैं
गांव में मुझे आज भी
मेरे पिता के नाम से पहचानते हैं

तेरे शहर में परिवार व्यवस्था है टूट रहा
संग अपनों का है छूट रहा
अब यहाँ पश्चिम की तस्वीर दिखती है
मेरे गांव ही है जहाँ भारत की आत्मा रहती है

चलो गांव में कि अब भी वहां पर
पीने को शुद्ध पानी और हवा मिल जाएगी
ज़्यादा नहीं तो दो चार साल और ज़्यादा ही
ज़िन्दगी में हँसी के पल जुड़ जाएगी



It’s just seconds…

In the era of information, social media and news reporting, who will not be aware of the name “Usain Bolt”?  He is one of the greatest, if not The Greatest, athlete of all time. He is the fastest man on earth. He holds the world record as a fastest 100m and fastest 200m runner. He is 9 time Gold Medalist in Olympics (one of the gold medal recently taken away from him as one of his team mate in race found to be guilty for doping).

All the above information must be known to you all. My purpose for this article was not to reiterate it; rather I thought to share you a piece of observation out of his success.

Recently when he appeared in news, I thought of searching about the details of Usain Bolt. I landed to the most authenticated source of information(Which I think) i.e. Wikipedia Page about UB. Apart from many other things, there was a table, which represented the best time taken by him to complete a race for a specific year, caught my imagination.

I thought what defines Usain Bolt? And without doubt I reached to conclusion, it’s the speed which defines him. I recalled the formula of Speed, which I may have studied in class 6 or 7.

                                                              Speed= Distance/ Time.

Then I observed, speed consists of two sub-parts i.e. Distance and Time. Distance for all other athlete is same either it may be 100m, 200m or even for that matter 400m. So what intrinsically it’s the “Time”, which defines Usain bolt.

I prepared a column with the help of data from Wikipedia and noted down the best time taken by him in year to complete the race since 2008, when he became known. After that, I summed all the time taken by him to finish the race. See Table


Season’s bests since 2008


Time taken to complete 100 metres race in seconds


                               2009                                    9.58
                                2010                                     9.82
                                2011                                     9.76
                                2012                                     9.63
                                2013                                     9.77
                                2014                                     9.98
                                2015                                     9.79
                                2016                                      9.8
Total Time


Credit: Wikipedia, with some modifications.

Conclusion drawn: 87.82 seconds is the time, which made Usain Bolt, a personality which left an indelible imprints on the minds of Billions.

Why still we are complaining that we don’t have time? Can’t we have 87.82 seconds to be happy. No doubt, 87.82 seconds is the time which he achieved through tremendous hard work, dedication, discipline, determination, perseverance, pains and sufferings for years, yet that investment is worth. isn’t it?

Doesn’t matter how small amount of time that we have, if the Joy and Bliss is there in it it’s far better than spending years of inactive and dull life…..Just remember time when you felt that it was the best time in your life…Did you get any 🙂

धीरज …

Image Credit: Webneel


धीरज …

मुस्कुराते क्यों नहीं
क्या कोई जख़्म बड़ा गहरा है
या आज लबों पर तेरे
किसी गैर का पहरा है?

खोयी तेरी निगाहें
क्यों उतरा तेरा चेहरा है
तेरी आँखों में पानी
किसी झील सा ठहरा है!

साँसे क्यों बेचैन सी
क्यों नींद तेरी उजड़ी है
लेकर किसी का नाम शायद
कई रातें तेरी गुज़री है!

धीरज रखो कि,
जो सावन है बीत गया
वापस फिर से आएगा
ख्वाब थे जो बिखरे से
फिर से उन्हें सजायेगा
जब वापस वो आएगा…..




Image Credit: Dinesh Kumawat


आज मेरे आँगन में
आम के पेड़ पर मंजर आया है
जाने वो मंज़र कब आएगा
जब तुम मेरे आँगन में आओगे !

उसी पेड़ की किसी शाख पे बैठे,
कोयल ने राग भैरवी गाया है
जाने तुम कब आकर आँगन में
राग बासंती गाओगे!

मंज़र की ख़ुशबू में
शमा पूरी तरह है डूबा
जाने कब तेरी महक
घर आँगन में छाएगा
वह मंज़र कब आएगा !

सूरज ढली, चाँद शिखर पर आयी
विचलित हुई, तुम्हें आवाज़ लगायी
पदचाप सुनी, भागी चली आयी
पर अब भी आंगन सूना है!!!
वह मंज़र कब आएगा
जब तुम आँगन में आओगे!

एक और गणतंत्र दिवस..

कल देश गणतंत्र दिवस मनायेगे, मनाना भी चाहिए. देश कैसे चलेगा, यह निर्णय तो आज ही के दिन 1950 में लिया गया था. कल नेताओं का भाषण होगा, पर सोचता हूँ, क्या देश के हर व्यक्ति के घर में रात का राशन होगा? अरे छोड़िये साहब, क्या हर एक व्यक्ति का अपना घर भी है? राजपथ पर जो परेड होगी, झांकियां निकलेगी, जब लोग उन्हें अपने टेलीविजन पर देखेंगे, तो उसकी चकाचौंध में यह प्रश्न निश्चय ही कहीं खो जायेगा. खैर एक बात तो तय है, लता दीदी की “ऐ मेरे वतन के लोगों….”, जो भावुक हैं और राष्ट्रभक्त भी, उन्हें आज भी वैसे ही रुलायेगी…

मैं अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध लेखक (नाम नहीं लूंगा, भारतीय ही हैं) का लेख पढ़ रहा था. वो राष्ट्रीयता को अपने हिसाब परिभाषित करने में लगे हुए थे. लेख पढ़के गुस्सा भी आया और हताषा भी हुई, कि लेखक देश को यूरोप और अमरीका के चश्मे से क्यों देखता हैं? क्या हम, देश को परिभाषित करने में सक्षम नहीं हैं?

देश की वर्तमान परिस्थिति पर सोचते सोचते कलम उठाया, कुछ पंक्तियाँ लिखीं, कविता कहूँ या नहीं आप तय कीजिये और बताइये कैसी लगी…

Image Credit: Internet

देश भक्तों की टोली चली है

हर तरफ ये नारा है

हिन्द सागर से हिमालय तक

पूरा भारत हमारा है

चुनौतियों से भरा पहर है

देशद्रोही सभी मुखर हैं

“अफ़ज़ल” “अज़मल” को हैं शहीद बताते

और सेना पर पत्थर बरसाते

इनमें से कुछ तो खुद ही को

बुद्धिजीवी हैं बतलाते

और, भारत माता की जय कहने पर

वे अपना मुख हैं बिचकाते

पर, उनपर जब हम प्रश्न उठाते

तो वे “असहिष्णु” “असहिष्णु” चिल्लाते

फिर लाइन लगाकर वे

“अवार्ड वापसी” को लग जाते 

वे “पांच-सितारा” होटल को जाते

और जनता को गरीबी की पाठ पढ़ाते

चुनाव जितने के खातिर

हम जाती धर्म पर बांटे जाते

देशभक्तों को जगना होगा

एक स्वर में कहना होगा

जिसे भारत में रहना होगा

भारत की जय कहना होगा

देर बहुत अब हो चुकी

बांग्ला और पाक जन्म ले चुकी

और नहीं लूटने देंगे

देश और नहीं टूटने देंगे

देश भक्तों की टोली चली है

हर तरफ ये नारा है

हिन्द सागर से हिमालय तक

पूरा भारत हमारा है



शब्द सहयोग:

मुखर : Vocal, Vociferous or Outspoken.

असहिष्णु : Intolerant 

बुद्धिजीवी : Intellectuals 


अकेले चलने में बुराई क्या है ?



अकेले चलने में बुराई क्या है ?

कि जब हुआ अकेले आना

और जाना भी है अकेले

तो फिर क्या सोचना

कि ये तन्हाई क्या है

अकेले चलने में बुराई क्या है ?

कि जब सिंधु में ही है गोता लगाना

और छिपे सागर के मोती

को खुद ही सतह तक लाना

तो फिर क्या सोचना

कि सागर कि गहराई क्या है

अकेले चलने में बुराई क्या है?

कि जब इंतज़ार है हर किसी को

कि कोई राह दिखायेगा

बुझे हुए दीपक की लौ

कोई फिर सुलगायेगा

तो फिर हर दो कदम पर रुक कर

ये अंगड़ाई क्या है

अकेले चलने में बुराई क्या है?

कि जब पल भर में यहाँ

रिश्ते बदल जाते हैं

जिन्हें थे अपना समझते

वे कहीं और नज़र आते हैं

तो फिर क्या सोचना

कि इन रिश्तों कि कमाई क्या है

अकेले चलने में बुराई क्या है?

कि जब सुनसान राहों पर

कोई साथ नहीं दिखता

पकड़ ले कस के जो हाथों को

वो हाथ नहीं दिखता

तो राही चल अकेले और नाप ले

नभ की भी ऊंचाई क्या है

अकेले चलने में बुराई क्या है?