मेरे राम..

समाचार चैनलों पर “राम मंदिर” का मुद्दा काफी गरमाया हुआ है…गरमाना भी चाहिए…चुनाव जो सामने है…
खैर छोड़िये, एक महान राम भक्त से सम्बंधित एक घटना पढ़ रहा था. अनायास ही आज कल के तथाकथित राम भक्तों पर तरस आ गयी … पंक्तियाँ पढ़िए और काव्य रस का आनंद लीजिए

एक बार गोस्वामी तुलसी दास जी से किसी ने पूछा- “जब मैं भगवान के नाम का जप करता हूँ तो मेरा मन उसमे नहीं लगता और ध्यान इधर उधर भटकता रहता है, क्या फिर भी मुझे उनके नाम लेने से मुझपर कुछ प्रभाव पड़ेगा?”

गोस्वामी जी कहते है :-

तुलसी मेरे राम को , रीझ भजो या खीज ।
भौम पड़ा जामे सभी , उल्टा सीधा बीज ॥

अर्थात भूमि में जब बीज बोये जाते है, तो यह नहीं देखा जाता कि बीज उल्टे पड़े है या सीधे, फिर भी कालांतर में फसल बन जाती है । इसी प्रकार, राम नाम सुमिरन कैसे भी किया जाये , उस का फल अवश्य ही मिला करता है !

स्मरण

स्मरण

आशंकाओं से घिरे पहर में ,

   दुविधाओं के बीच भंवर में,

     दर्द भरी आहों में,

      या सूनी राहों में

         मरुभूमि के टीलों में

           नेत्र बनी जो झीलों में

             या बंजर मैदानों में

             सूखे खेत खलिहानो में

                स्वजनित विपदाओं में

                 या प्राकृतिक आपदाओं में

जब जब हम खुद को

   हारा हुआ पाते हैं

     नेत्र स्वतः बंद हो जाते हैं

       वंदन को हाथ जुड़ जाता है

         कभी अहम् से था जो मस्तक ऊँचा

          वह  भी झुक जाता है

            दुःख की घड़ी में तो अनायास ही

              ध्यान प्रभु का आता है

                पर सुख के पहर में स्मरण ईश्वर को

                     शायद ही कोई कर पाता है

                                                                                 ~अभय