अपनी राह ..

 

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Clicked it, Yesterday Morning

अपनी राह..

 

राहों को अपनी, मैं खुद ढूंढ लूंगा
बन पथप्रदर्शक तुम, मुझे न उलझाओ||

मेरे उम्मीदों को अब, पर जो लगें है
अपनी आसक्तियों की, न जाल बिछाओ||

कष्टों का पहाड़ सीधे सिर पर सहा है
राह के रोड़ों से तुम, मुझे न डराओ||

सच है जो कड़वा, मैंने खुद चख लिया है
उसपर झूठ की मीठी तुम, परत न चढ़ाओ||

मंज़िल है मुश्किल औ’ लंबा सफर है
जो बीच में हो जाना, शुरू से साथ न आओ||

ज्ञान की दीपक अब जो जली है
अपने आंसुओं से उसे न बुझाओ||

जाना जहाँ है, राहों में कांटे बिछे हैं||
मेरे लिए अभी फूलों की हार न लाओ||

निराश लोगों की लम्बी पंगत लगी है
सांत्वना भरे गीत तुम, उन्हें ही सुनाओ||

नम्रता में मैंने जीवन है जीया
मेरे खुद पे भरोसे को, मेरा अहम् न बताओ||

………..अभय…………

 

 

शब्द सहयोग: पथप्रदर्शक: Guide; पर: Wings; रोड़ों: Pebbles; आसक्ति: Attachment; पंगत: Queue,  Line ;

नम्रता : Humility ;  अहम् : Ego ; सांत्वना: Sympathy; Condolence, Console.

यह कौन सा मौसम है?

 

 

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Jubilee Park, Jamshedpur. Credit: Google Image.

 

शाम को पार्क में बैठा था. हवा में ठंडक थी, मानो पेड़ एयर कंडीशन में बदल गये हों. उसके हरेक झोके मन को सुकून पहुँचाने वाले थे.

तभी, अचानक एक लड़के ने “चिप्स, आलू का चिप्स ” की आवाज़ लगायी. मेरी ओर बढ़ा और पूछा क्या आप लोगे ? मैंने उसे देखा. 14-15 साल का होगा. चेहरा मासूम सा. मैंने पूछा कितने के दिए? उसने कहा 10 की एक पैकेट. फिर, मैंने उससे नाम पूछा और पूछा कि कहाँ रहते हो. उसने नाम बताया “मुन्ना” और जहाँ रहता था उस बस्ती का नाम बताया. फिर मैंने पूछा कि स्कूल नहीं जाते? उसने बोला “हाँ जाता हूँ न, मैथ्स में कुछ पूछिये”.

उसका आत्मविश्वास देख में हतप्रभ था. शायद ही मैं किसी को इतने विश्वास से कुछ पूछने को कह पाता. मैंने कहा एक पैकेट दे दो. उसने चिप्स के बोरे में से एक पैकेट मेरी तरफ बढ़ा दी और पूछा कि पानी की  बोतल भी लेंगे? मैंने कहा नहीं, इसकी जरुरत नहीं है.

मेरी जिज्ञासा उसमे बढ़ी और पूछा कि पापा क्या करते हैं. उसने कहा “गोलगप्पे बेचते हैं, आप सोच रहे होंगे कि मुझे चिप्स क्यों बेचना पड़ता है”. मैं चुप रहा, वो खुद बोलने लगा “मेरी दसवीं की परीक्षा है और आगे मुझे और पढ़ना हैं. इंजीनियरिंग करना हैं. उसके लिए कोचिंग लगेगी. तो मैं शाम के खाली  समय में कभी कभी आकर बेचता हूँ. ज़्यादा नहीं पर थोड़े सही पैसे तो बच जायेंगे, जो बाद में काम आएगी नहीं तो सारा बोझ पिताजी पर आ जायेगा”.
तभी अचानक सिटी की आवाज़ सुनाई दी, दो सिक्योरिटी गार्ड मेरी तरफ दौड़ा, मुझे समझ नहीं आया कि हुआ क्या? तब  वो लड़का भागा. मैं हैरान. कुछ दूर तक गार्ड ने दौड़ाया, पर उसकी दौड़ काफी तेज थी, गार्ड मोटे थे, थक कर रुक गए. फिर वापस आने लगे.

मेरे मन में शंका हुई कि लड़का कहीँ चोर-वोर तो नहीं. गार्ड सामने से गुजर रहे थे, मैंने पूछा गार्ड साहब, उसको दौड़ाया क्यों? गार्ड साहब बोले “बदमाश हैं साले, बार बार मना करो फिर भी नहीं सुनते, पार्क में चिप्स या और कोई चीज बेचना मना हैं. प्लास्टिक का पूरा कचड़ा फ़ैल जाता हैं”.

चोरी वाली बात सोच मन मे लज्जा आयी. गार्ड भी अपनी ड्यूटी पर थे, पर लड़का अपनी ड्यूटी से ज़्यादा कर रहा था. रिस्क लेकर भी. तभी अचानक याद आया की इस अफरातफरी में मैंने तो उसको पैसे दिए ही नहीं और वह जाने कहाँ चला गया. सोचकर अच्छा नहीं लग रहा था. चिप्स का पैकेट लिए मैं घर की तरफ निकला. पार्किंग में लगी अपनी गाड़ी में जैसे ही चाबी लगायी की वो लड़का वापस आया और बोला “भैया पैसे”? सच कहूँ तो आज तक किसी को पैसे देने में इतना मज़ा नहीं आया था. जेब से 100 का नोट निकाला और बढ़ा दिया उसकी ओर उसने 90 रुपये वापस किये और मुस्कुराते हुए दूर जाने लगा …वह जिधर जा रहा था वहां अंधकार था, शायद  सरकार के  स्ट्रीट लाइट की रौशनी वहां तक नहीं पहुंचती होगी.

रात ढली और घर पहुंचा. खाना खाने के पश्चात, जब सोने की बारी आयी तो गर्मी का अनुभव हुआ, पंखा को 5 पर करके सोना पड़ा. रात ज्यों ज्यों ढली तो ठण्ड भी बढ़ने लगी, २ बजे के आस पास चादर शरीर पर जगह बना चुकी थी. 5 बजे नींद खुली तो देखा, पतली कम्बल ने भी मुझ पर अपना कब्ज़ा जमा लिया था. उठा तो ठण्ड थी. नहाने के लिए पानी को थोड़ा गुनगुना करना पड़ा. घर से निकला तो बाहर पार्क में घास पर ओस की बूंद पड़ी थी, मानो बारिश हुई हो रात में. 9 बजे थे, धुप तो निकल चुकी थी पर हवा के चलने से तपिश का एहसास न था. पर दो पहर के खाने के बाद, जब बाहर खुले में निकला, तो ग्लोबल वार्मिंग का प्रत्यक्ष आभास हुआ. सोचा की फूल शर्ट पहनना ही ठीक था. पीने का पानी तो ठंडी ही जच रही थी. पेड़ के अधिकांश पत्ते पीले पड़कर, उसका साथ छोड़ रहे थे. पर कुछ नए पत्ते शाखों पर दिख रहे थे, मानो पेड़ की उम्मीद अभी बची हो…..
इतनी विविधताएं, यह कौन सा मौसम है …..बसन्त 🙂

 

मुन्ना के जीवन में कभी कोई ऐसा समय आया होगा कि वह सोचे कि अभी कौन सा मौसम है?

जी लें आज को…

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Sun Dial, Credit: Google

 

जी लें आज को…

 

डूबे हो क्यों अतीत में ,

फिर से आता क्या वो कल है!

हँसना तुम आज में सीख लो

जो है बस यही पल है..

 

कल हुए सफल तो उसका

कब तक तुम जश्न मनाओगे

या किसी बिगड़ी बातों से हो आहात

कब तक अश्क़ बहाओगे

जो बीती सो बात गयी

कब आगे को कदम बढ़ाओगे

आज में , हर-रोज उभरते हैं प्रश्न नए

हर दिन मिलता उनका हल है!

हँसना तुम आज में सीख लो

जो है बस यही पल है..

 

कभी अतीत से निकल भविष्य में

खुद को हम ले जाते

मन मुताबिक सुन्दर सा

सपनों का महल सजाते

पर दिवा स्वपन तो व्यर्थ है होता

न ही मिलता उससे कोई फल है

जो है केवल पुरुषार्थ आज का

होता इसमें ही बल है!

हँसना तुम आज में सीख लो

जो है बस यही पल है..

 

वर्तमान में रह कर ही तो

मंज़िल कइयों ने पायी है

जीवन रूपी इस नैय्या ने

जाने कितने सागर पर लगायी है!

बीते हुए कल को छोड़ो

भविष्य में क्या होगा! इससे मुह मोड़ो

अनुभव करो इस वर्तमान को

पीकर देखो, होता इसका मीठा कितना जल है

हँसना तुम आज में सीख लो

जो है बस यही पल है..

 

………अभय………

जुगनू

जुगनू

आजकल रात जुगनू मेरे छत पे
झुण्ड में मंडरा रही है
अनजाने में ही सही लेकिन मुझे
तेरी याद दिला रही है

इक पल जलती , फिर बुझ जाती
जैसे सुख दुःख का एहसास कराती
कम ही सही,
पर प्रकाश तो फैला रही है

एक जुगनू बैठ हाथ पे
शायद कुछ गा रही है
अफ़सोस! उसकी एक बात भी
मेरे समझ नहीं आ रही है

स्तब्ध हूँ मैं बैठा
देख उसकी कोमलता
है छोटी सी, पर पल भर को ही सही
अंधकार को हरा रही है

उड़ चली हाथों से
झुण्ड में वो समा गयी
मानो स्पर्श से मेरे
हो वो शर्मा गयी है
तेरी याद दिला गयी है …

………..अभय………..

 

गांव मेरा और शहर तेरा

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Credit: Of course, non other than Google.

गांव मेरा और शहर तेरा

तेरे शहर में सभी
मेहमान से क्यों हैं ?
भीड़ तो है सड़कों पर मगर
एक दूजे से अनजान क्यों हैं?

याद आता है मुझे मेरा गांव
मिट्टी की ख़ुशबू, वो पीपल की छांव
गाय चराते वहां के गोपाल
हँसी-ठहाको से भरा चौपाल

तेरा शहर बड़ा व्यपारी है
यहाँ पानी तक बिकता है
मेरे गांव में सुबह शाम
बुजुर्गों से दुआएं मुफ्त में मिलता है

सड़के तेरे शहर की चौड़ी चौड़ी
यहाँ मन क्यों संकरी हो जाती है?
गांव में तो बिजली नहीं है फिर भी
मन से सबके सरलता की प्रकाश आती है

तेरे शहर में तुझे लोग
बड़ी गाड़ी और बड़े घर से जानते हैं
गांव में मुझे आज भी
मेरे पिता के नाम से पहचानते हैं

तेरे शहर में परिवार व्यवस्था है टूट रहा
संग अपनों का है छूट रहा
अब यहाँ पश्चिम की तस्वीर दिखती है
मेरे गांव ही है जहाँ भारत की आत्मा रहती है

चलो गांव में कि अब भी वहां पर
पीने को शुद्ध पानी और हवा मिल जाएगी
ज़्यादा नहीं तो दो चार साल और ज़्यादा ही
ज़िन्दगी में हँसी के पल जुड़ जाएगी

…………..अभय………………

 

मंज़िल मेरी ….

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Clicked it in Bay of Bengal 

मंज़िल मेरी ….

हूँ किस दिशा से आया,
जाना मुझे किधर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा,
मंज़िल मेरी उधर है

आसमान से उतरी
और जब धरा पे ठहरी
अमावस की वो काली रात मानो
पूर्णमासी में हो बदली
कैसा अनुपम और मधुर
होता वो पहर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा
मंज़िल मेरी उधर है

दूबों पर पड़ी ओस जैसी
हो तुम निर्मल
फूलों की पंखुड़ियों जैसी
हो तुम कोमल
मेरे मन से टकराती हर पल
तेरी यादों की लहर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा
मंज़िल मेरी उधर है

नज़रों से होकर ओझल
जाने कहाँ भटकती
बिन देखे तुम्हें एक पल भी
साँसे मेरी अटकती
लौट चलो हैं जहाँ शहर मेरा
कि वहीं कहीं, तेरा भी तो घर है
हो मिलन जहाँ तेरा मेरा
मंज़िल मेरी उधर है

………अभय …………

 

Hello Friends, Once again I have given a try to translate my poem in English. Hope those who don’t read or understand Hindi, it may help them a bit to get an idea behind it.

My Destiny…

Don’t know from where I have come,

Nor even know, where I have to go

Where our tryst will be

I consider it as my destiny

 

When you appeared from the sky

And stayed on earth

Even the darkest of nights

Turns in to full moon light

How incredible and sweet is that time!

Where our tryst will be

I consider it as my destiny.

 

You are pristine,

Same as the dew on the new blade of grass

You are delicate,

Same as flower petals.

My mind is always shoved

By waves of your memory.

Where our tryst will be

I consider it as my destiny

 

Where do you wander

By staying away from my sight

Without seeing you even for a second

I couldn’t breath right

Come and return to my city

Coz somewhere around there, your home too lies

Where our tryst will be

I consider it as my destiny.