अहेतु की कृपा ..

हैरान हूँ!
तेरी सृष्टि से अनजान हूँ
पहेलियों से परेशान हूँ
दर दर भटकता हूँ
छोटे से प्रश्नों पर भी अटकता हूँ
तुम्हें हर जगह ढूँढता हूँ
आँखे भी मूँदता हूँ
पर तुम हो कि तुम्हारा कोई
पद चिन्ह नहीं दिखता
मन से मेरे संशय का
बादल भी नहीं छटता
शास्त्रों को सुना
तत्वदर्शियों से मिला
तुम से मिलने का मार्ग भी जाना
अफ़सोस है कि मैंने अब तक
खुद को न पहचाना
मार्ग मिलन का तुमसे
दुर्गम है, कठिन है
पर हम तो सामर्थ्यविहीन हैं
अहेतु की कृपा का मैं हूँ प्रार्थी
कब कृपा होगी मुझपर भी, हे पार्थ के सारथी !!!

…….अभय ………

शब्द सहयोग:

अहेतु की कृपा : Causeless Mercy
तत्वदर्शियों: Those who know the ultimate reality
सामर्थ्यविहीन : Without having any capacity
पहेलियों : Enigma
संशय: Doubt

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मेरे राम..

समाचार चैनलों पर “राम मंदिर” का मुद्दा काफी गरमाया हुआ है…गरमाना भी चाहिए…चुनाव जो सामने है…
खैर छोड़िये, एक महान राम भक्त से सम्बंधित एक घटना पढ़ रहा था. अनायास ही आज कल के तथाकथित राम भक्तों पर तरस आ गयी … पंक्तियाँ पढ़िए और काव्य रस का आनंद लीजिए

एक बार गोस्वामी तुलसी दास जी से किसी ने पूछा- “जब मैं भगवान के नाम का जप करता हूँ तो मेरा मन उसमे नहीं लगता और ध्यान इधर उधर भटकता रहता है, क्या फिर भी मुझे उनके नाम लेने से मुझपर कुछ प्रभाव पड़ेगा?”

गोस्वामी जी कहते है :-

तुलसी मेरे राम को , रीझ भजो या खीज ।
भौम पड़ा जामे सभी , उल्टा सीधा बीज ॥

अर्थात भूमि में जब बीज बोये जाते है, तो यह नहीं देखा जाता कि बीज उल्टे पड़े है या सीधे, फिर भी कालांतर में फसल बन जाती है । इसी प्रकार, राम नाम सुमिरन कैसे भी किया जाये , उस का फल अवश्य ही मिला करता है !