सुना है चुनाव है….

सुना है चुनाव है,
बहुत निकट है
परस्थितियां भी अबकी
घोर विकट है

भवसागर की छोड़ो,
किसे पड़ी है?
यहाँ चुनावी नैया
मझदार खड़ी है

“विकास” रूपी पतवार
गर्त में गया है
प्रतिमा के सिवा नहीं,
कुछ भी नया है

रफाएल पर विपक्ष का
पुरजोर है हमला
“भ्रष्टाचार मिटेगा”
क्या ये भी था जुमला?

जीवन में सहर्ष जो कभी
राम नहीं गाते हैं
मरणासन्न हो उन्हें क्या
राम याद आते हैं?

…….अभय ……

Note: A true poet doesn’t side with any establishment. Neither Left nor Right. Read it in this perspective.

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मैं, मेरी बहना और ये राखी …

संग आज नहीं हो तुम मेरे
ये कैसी होनी है?
मिठास नहीं है मुख में मेरे
कलाई भी सूनी है!

उदास मन से मैंने उसे
वीडियो कॉल  लगाया
राखी पर घर में न होने की
अंतर्व्यथा बताया

सोचा था मन की व्यथा
उधर भी वैसी ही होगी
मेरी अनुपस्थिति तो शायद
उसे भी खूब खली होगी

पर शैतानी हँसी देख
मैं भौचक्का रह गया
राखी के अवसर पर डिमांड  सुनकर
मैं हक्का-बक्का हो गया

कहा उसने
“तुम हो कहीं भी, अमेज़न पर मेरे लिए
आज ही iPhone X आर्डर कर  देना
और हो सके तो मेरी तरफ से
कलाई पर, एक राखी बांध लेना”

मैंने मन में सोचा
“क्या घोर कलयुग
इतनी जल्दी ही आ गया
भाई बहन के दिव्य रिश्ते को
भौतिक iPhone X खा गया !!!

😂😂😂

………अभय…….

क्यों भाईयों, क्या आपके संग भी ऐसा ही हुआ..और बहनों अपने कुछ ऐसा ही किया …….

कागज़ी पतंग

कागज़ी पतंग

मैं धरती पर पड़ा था
रद्दी कागज का जैसे कोई टुकड़ा
बना पतंग आसमान में मुझको
आपने भेजा,
ढील दी
दूसरे दानवी पतंगों से मुझे बचाया
मैं ऊपर चढ़ता रहा
बढ़ता गया
बादलों से भी ऊपर
अनंत गगन में
उन्मुक्त, स्वतंत्र
कि अब मुझमें ऊंचाई का
नशा छा गया है
कि अब मुझे धरती भी नहीं दिखती
दिखता है तो केवल
स्वर्णिम आकाश
और ये भी नहीं दिखता कि
मेरा डोर किसी ने थामा था
थामा है
छूटी डोर तो मेरा क्या होगा!
होगा क्या?
मैं फिर वही
रद्दी कागज़ का टुकड़ा

……अभय…..

बस तेरा इंतज़ार है..

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धम से गिरे
धरनी पर
शिखर से,
ज़ख्म गहरा हुआ
चोट हरा हुआ
पर गिरने का यह पहला
वाक़या तो न था
कई पहले भी लुढ़के
गिरे गर्त में
वर्षों तक
सिसकते रहे
मरणासन्न रहे
संवेदनहीन रहे
निर्जीव सा गौण रहे
व्योम सा मौन रहे
पर लड़ते रहे
जूझते रहे
झुलसते रहे
आपदाओं में
विपदाओं से
लोगों की विष भरी
बोली से
आलोचकों की अगणित
टोली से
तो तुम जो गिर गए
तो इसमें नया क्या था?
कि अब तुम उठते ही नहीं
कि तन के ज़ख्म भी
जब सूखते हैं
हम उसे कुरेदते नहीं हैं
तो मन के ज़ख्म पर
ये अत्याचार क्यों?
स्मरण रहे कि
जो शिखर पर तुम पहुंचे थे
तब भी पुरुषार्थ लगा था
फिर से पुरुषार्थ लगेगा
कि तुममें जो नैसर्गिक है
वो भला तुमसे कौन लेगा?
कि अब दुर्बलता छोड़ो
कि सब तैयार हैं
हिमालय की
सबसे ऊँची चोटी को
बस तेरा इंतज़ार है

…….अभय …….

कविता का भाव आप लोगों तक पहुंचा हो, तो अपने भाव मुझ तक पहुँचाना न भूलें 🙂

शब्द सहयोग:
गौण: Subordinate, Secondary
व्योम: Sky, Space
नैसर्गिक: Inherent

द्वंद्व

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धूप शीतल
छाँव तप्त
जिसे वर मिला था
वही अभिशप्त

जो दृढ खड़ा था
संदेह में है
अकर्मण्यता से
नेह में है

जो पथप्रदर्शक था
पथभ्रष्ट है वो
शिथिलता से
आकृष्ट है जो

नित्य स्वरूप का उसे
कोई तो स्मरण कराये
इस हनुमान को
कोई जामवंत तक ले जाये

………अभय ……..

मुट्ठी भर रेत

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मुट्ठी भर रेत

शीशे के पात्र में संचित
रेत तुम्हारा जो रखा था
वह धीरे धीरे बह रहा
कुछ-कुछ तुमसे शायद वो कह रहा
क्या तुम भी उसे सुन रहे ?

इस शीशे के पात्र का
आकार अलग हो सकता है
इसमें संचित रेत की मात्रा
भी असमान हो सकती है
क्या तुम्हें अपने बचे रेत का अनुमान है?

इस शीशे के पात्र को तुम
मनमर्जी से पलट नहीं सकते
यह ऐसा खेल है जिसके नियमों को
सुविधा से तुम बदल नहीं सकते
क्या तुम इसके नियमों में ढल पाए ?

इस शीशे के पात्र में रखा रेत जो
एक बार पूरी तरह बह जाए
मन में दबी आशा अपेक्षा
सदियों तक मलबे में ही रह जाए
क्या तुम हिस्से की रेत के संग न्याय कर पाए ?

……….अभय……….