कृषक और श्रमिक

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कृषक और श्रमिक

श्रमिक शब्द बना श्रम से है,
और कहते हैं कि परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता है,
फिर न जाने क्यों उनका सारा जीवन
कष्टों से जूझते बीत जाता हैं! ||1||

कहने को तो किसान
अन्नादाता कहलाते हैं,
पर न जाने कितनी राते
भूखे पेट वो सो जाते हैं!  ||2||

कृषक लोगों को अन्न देतें हैं
और हम उन्हें ऋण देतें हैं!
अन्न से हम सबका जीवन चलता हैं
ऋण से उनका जीवन ढलता हैं  |||3||

सारी दुनिया का बोझ उठाते है
और खुद के बोझ तले वे दबते ही चले जाते है
क्या करें मज़बूर हैं
क्योंकि वो मजदूर हैं  ||4||

श्रमिकों का जीवन द्वन्द से भरा हुआ होता हैं
आलीशान वे आशियाना बनाते हैं
पर खुद या तो नभ के नीचे
या झोपड़पट्टी में सारा जीवन बितते हैं!  ||5||

दुनिया कि शायद यही रीत हैं
उनके लिए सिर्फ हार हैं
ना कभी कोई जीत है
और शायद इसीलिए
जो जीव सबसे मेहनती होते है
वे गधा कहलाते है ||6||

… …. अभय……… 

Farmers and Labourers

I tried to portray the plight of the working class, farmers and labourers vis-à-vis the oligarchy in any developing country, with special reference to India.

The word, labourer (Old French) has been derived from labour. It is said that, your toil  never goes in vain. But don’t know why, whole life of labour passes by struggling with the miseries and pains. ||1||

Indeed, the farmers are known as food provider to the world, yet many night passes by when they don’t have a meal to eat. ||2||

Tiller provides us grains, and we provide them debts and loans. Grain gives us life and loan takes their life.  |||3||

They bear the burden of the whole world, yet they are unable to bear their own burden. But what they can do as they are compelled, since they are the labouer. ||4||

Life of the labourer is full of duality, they make luxurious houses for others, but they themselves forced to live either in the slums ghettos or under open sky. ||5||

But this seems to be the norm of the world, for labour, only defeat is inevitable they can never win. And may be this the reason that most labourish species are termed as donkey. ||6||

Thank you for reading the post!!!

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खुद में नायक/नायिका ढूंढे

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आसमान में युद्ध के बादल फिर से

उमड़ घुमड़ कर छा रहे

हाय! कमजोड़ ह्रदय वाले नर-नारी

भेड़सम घबरा रहे

एक शेर है इन भेड़ो में

पर वह किंकर्तव्यविमूढ है

पिछली मिली हार के कारण  

आज वह सन्देहमय है

पिछला जब रण हुआ था ,

भीषण वो संगम हुआ था

रक्त की नदियां बही थी

नेत्र अश्रुमग्न हुआ था

असत्य सत्य पर भारी था

मानवता बर्बरता से हारा था

छल प्रपंच से भरे रण में

नायक भी सर्वस्व हारा था

हारा बैठा था नदी किनारे

गिन रहा था गगन के तारे

तभी एक सयोंग घटा

नदी के तट पर उसे साधु दिखा

देख उन्हें उसने नमन किया

साधु ने भी आशीर्वचन दिया

साधु अंतर्यामी था

दशा से उसके ज्ञानी था

नायक के मन को वे टटोल गए

उत्साह बढे जिससे नायक का

कुछ ऐसे वचन वो बोल गए

“चुप हो क्यों , शोर मचाते नहीं

युद्ध के इस भीषण घड़ी में

अपने सस्त्र क्यों उठाते नहीं

तुम्हारी ये अकर्मण्यता देख

शत्रु अब थर्राते नहीं

वीरता को हर पल ,

प्रमाणित करना पड़ेगा

एक ऋतु के काटे फसल से

कहो पूरा जीवन कैसे चलेगा ?

याद करो इतिहास में

तुमने जब जब गुर्राया था

देख जिसे दुर्जनो का

अंतर्मन तक थर्राया था .

चलो उठो साहस जुटाओ

नभ तक हो ऊँची सत्य की

ऐसी पताका फहराओ”!!!

……..अभय………

शब्द सहयोग:
किंकर्तव्यविमूढ: क्या करें क्या न करें की स्थिति, indecisiveness.

मैं और तुम

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मैं और तुम

 

मैं सूरज बन आता हूँ

तुम चंदा बन जाती हो,

तिमिर चीर कर मैं

पास तुम्हारे आता हूँ,

और तुम अपनी छटा

कहीं और बिखराती हो !!!

 

लाख यत्न कर,

मिलन की आस लिए

बन बादल मैं,

आसमान पर छाता हूँ

तुम बारिश की बन बूंदें

धरती पर उतर आती हो!!!

अगणित तारे सदियों से

देख रहे इस खेल को,

मैं भी हूँ मूक बना

और तरसता मेल को

पर मन में दृढ विश्वास लिए

सोचता हूँ, एक दिन ऐसा भी आएगा

सूरज चंदा साथ में एक दिन

विश्व भ्रमण को जायेगा!!!

 

बुँदे कहेगी बादल से

कुछ दिन नभ में ही रुक जाते हैं

फिर दोनों मिलकर इकट्ठे

धरती की प्यास बुझाते हैं!!!

…………अभय…………

शब्द सहयोग:

तिमिर: अंधकार या अँधेरा

मैं, मेरी परछाई

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शनिवार. वीकेंड का पहला दिन, दिन भर की फुरसत और फुरसत में दिमाग कुछ ज्यादा चलता ही है. आज चला और कुछ विचार निकले. फिर उसने एक कविता का रूप लिया.आपके सामने है. आज ही लिखी , और सोचा आज ही पोस्ट कर दूँ, ज़्यादा रिव्यु नहीं कर पाया…

अग्रिम चेतावनी: प्रेमी प्रेमिका मेरे कविता की “परछाई” में अपने प्रेमी प्रेमिका को ढूंढने का प्रयास न करें, वरना कविता के अंत में अफ़सोस होगा  😜😛

मैं, मेरी परछाई

मैं, मेरी परछाई
आज शाम संग बैठे थे
भीड़ से दूर…
एक दूजे के करीब…

परछाई कहने लगी ,
प्रश्न है बहुत दिनों की ,
इज़ाज़त हो तो बयां करूँ
मैं हँसा और हँस के बोला
पूछना, जो पूछना हो ?

उसने बोला

“सबसे करीब तुम्हारे
बोलो कौन है ?
शोर मचाती है जो मन में
पर जुबान पर मौन है ?”

जो मैं कुछ बोलता ,
मन की गठरियों को
सामने उसके खोलता
उसके पहले वो बोल पड़ी
“अरे वो मैं हूँ पगले , मैं हूँ “!!

मैं थोड़ा चकराया ,
मासूमियत भरे उत्तर पर
मंद मंद मुस्काया
और पूछा
“वो कैसे ! फरमाइए “
अपने विचार पर ज़रा
LED वाला प्रकाश तो लाइए

भावना में वो बह गयी ,
और फिर जाने मुझसे क्या क्या कह गयी ,
आपको मैं सुनाता हूँ
बदले में आपका पूरा अटेंशन चाहता हूँ

वो बोली
“संग तुम्हारे हूँ तब से ,
है वज़ुद तुम्हारा जब से ,
तुम चलते हो
मैं चलती हूँ
रुकने से थम जाती हूँ

बिना अपेक्षा के आशा के
साथ तुम्हारे रहती हूँ
दुःख हो या सुख हो
हर भाव मैं सहती हूँ
कितने सावन बीत गए ,
और जितने भी सावन आयेंगे
जो कोई रहेगा साथ तुम्हारे तो
वो मैं हूँ बस मैं हूँ “
मैं बोल पड़ा
“बस कर पगली
अब क्या रुलायेगी ?
इतने दिनों की कहानी
सब ही आज कह जाएगी “

भावुक होता देख उसे
मैं बोला चलो चलते हैं
गाल फूला के आँख झुका के
संग मेरे हो चली

निकल पड़ा घर की ओर
सूरज भी ढलने लगा था
परछाई लंबी होने लगी थी
मैं छोटा लगने लगा था

तभी अचानक
अँधेरा छाया ,
ओर मैं खुद को अकेला पाया

कहाँ गयी मेरी परछाई ?
जो वफाई की दे रही थी दुहाई ?
अँधेरा आते ही सरक गयी
पतली गली से खिसक गयी

तभी मन में विचार आया ,
कभी परछाई आपकी ,
आपसे भी लंबी हो जाती है ,
पर बिन प्रकाश के वो भी ,
साथ छोड़ जाती है .
कोई साथ रहता जो अंधकार में आपके
वो आपकी  परछाई भी नहीं है
“केवल आप हो, और कोई नहीं है”
अब प्रश्न है कि आप कौन हो ?

…………अभय…………

मुखौटे/Masks

कॉलेज से कॉर्पोरेट में आने के कुछ ही दिनों बाद, यहाँ के वातावरण को देख चंद पंक्तियाँ मन में आयीं थी. ख़ैर अब तो कुछ समय यहाँ गुज़र गया हैं. अब मैं भी इसका हिस्सा हूँ, पर पंक्तियाँ अब भी प्रासंगिक हैं……सोचा कि आप सब तक भी ब्लॉग के माध्यम से इसको पहुंचा दूँ. आशा है आपको पसंद आयेगी .

Belonging from multilingual country, ubiquitous presence and acceptance of English and knowing that some of the reader base is from English background,  I tried to translate it. But I hardly believe that translation will do justice with the pristine typescript, which is in Hindi, as I lack poetic sense in English. Any way I have given a try. Hope you will like it.

 

चेहरे कम मुखौटे ज़्यादा

दिखतें हैं इस बाज़ार में

हम बेहतर हैं तुमसे!

सभी जुटे हैं इसी प्रयास में ||1||

जिसका चेहरा जितना बनावटी

वह उतना ही सफल है

छल प्रपंच से भरे खेल में

उसकी दांव प्रबल है ||2||

अपनापन का भाव कहाँ यहाँ पर

केवल स्वार्थ निहित है

भावना से भरे व्यक्ति की

हार यहाँ निश्चित है ||3||

…………अभय…………

Masks are conspicuous as the faces are heavily covered by it in this place. Most of them are engaged in proving themselves better than others. ||1||

Those who can mold their faces easily suiting to the person and circumstances they face, are assumed to be successful. In the world of  treachery and deceit , chances are there that they will emerge victorious. ||2||

Relationships are based on the vested interests of each other and those who are filled with emotions, for them situations are very bleak here ||3||

मनुष्य और रहस्य

छठ की शुभकामनायें !!! अंग्रेजी में एक लेख पढ़ रहा था, उसमे एक पंक्ति कुछ यूँ लिखी हुई थी कि “Man’s life is reflection of his thought, if he can change his thought then surely he can change his life” (मनुष्य का जीवन उसके सोच का परावर्तन है, अगर वह सोच बदल सकता है तो निश्चय ही जीवन भी). पढ़ कर उस वाक्य के विषय में सोचने लगा और पाया कि कितना सही लिखा था लेखक ने. कुछ और मन में विचार आता, इससे पहले मेरी चचेरी बहन जो कि मात्रा साढ़े ४ साल कि होगी, उसने तुतलाते हुए बोला, “क्या आप नदी नहीं जायेंगे छठ में”? मेरा मन नहीं कर रहा था, तो मैंने मना कर दिया और कहा कि सुबह को जाऊंगा. फिर उसने कहा “ठीक है आप ना मेरा ना एक सेल्फी (वह हरेक किस्म के फोटो लेने को सेल्फी ही कहती है ऐसा मैं समझा) तो ले लीजिये, देख नहीं रहे नया कपड़ा है”. मैं मासूमियत पे मुस्कुराया, पर उसकी मासूमियत का भ्रम थोड़े ही देर में दूर हो गया जब उसने फोटो लेने के बाद कहा, “आप ना इसको ना व्हाट्सअप (व्हाट्सएप्प नहीं ) और फेसलुक ( फेसबुक के बजाये) पर डाल दीजिये” मैं थोड़ा चकरा गया और सोचा कि इसको क्या हो गया है? इतनी छोटी है और व्हाट्सएप्प और फेसबुक की बात करती है. समझा कि अब मोगली, विन्नी द पूह, शक्तिमान और दादी कि कहानियों का दौर नहीं है.

थोड़ी देर बाद घर से सब चले गए और मैं अकेले में फिर से उस वाक्य को सोचने लगा, तभी अचानक कुछ पंक्तियाँ लय में मन में आने लगी और मैं मोबाइल फ़ोन पे लिखता गया, बाद में थोड़ी एडिटिंग के बाद उसने जो रूप लिया, आपके सामने है. एकदम ताजी, अभी-अभी तोड़ के लाया हूँ 🙂

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मनुष्य और रहस्य 

सुना है, हर कोई अपने दिल में
एक राज़ छिपाकर रखता है
लाख पूछ ले दुनियां
पर फिर भी वह चुप ही रहता है

सोचता हूँ, ऐसी भी क्या मज़बूरी होती
ऐसी भी क्या परेशानी है
सीने में जो दफ़्न होती
उसकी कोई अज़ीज कहानी है

कोई उन बातों को यादकर
इतिहास में डुबकी लगाता है
तो दूसरा उन्हें भूलकर
भविष्य की ओर कदम बढ़ाता है

पर फिर एक ऐसा मंज़र भी आता है
जब उन बातों से जुड़ा व्यक्ति पास आता है
लाख यतन करने पर भी
उन बातों को वो दबा नहीं पाता है

दिल में जमी जो बर्फ थी सदियों की
पल भर में पिघल जाती है
फिर वो बातें या तो जुबां से या आँखों से
झरझर कर बह आती है

मन हल्का सा लगने लगता है
चेहरा भी मुस्काता है
किसी तरह वह फिर हिम्मत करके
उन बातों पर फिर से परत चढ़ाता है

…………अभय…………