मेरा मन..

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  मेरा मन जहाज़ सा,
उड़ने वाला नहीं
तैरने वाला,
पानी का जहाज
और तुम सागर सी,
हिन्द महासागर नहीं
प्रशांत महासागर
अथाह, असीमित, अन्नंत
मन चंचल था मेरा,
तैरता तुममें
कभी शांत
कभी हिचकोले करता हुआ
पर वह अब डूब रहा है
गर्त में, तह तक
जैसे किसी सागर में कोई
जहाज डूबता है,
अस्तित्व को भुला
जैसा कि पहले
कोई, कुछ था ही नहीं
केवल सागर का सन्नाटा
और लहरों के हिचकोले
सिर्फ तुम ही तुम,
मैं स्तब्ध, शुन्य, मौन!

……..अभय…….

 

ज़लज़ला

ज़लज़ला

रह-रह कर तेरी यादों का
कोई सैलाब सा आता है
लाख बचाता हूँ खुद को
पर मुझे वो बहा ले जाता है

डुबो कर सिर से पांव मेरा
तुम बेपरवाह , वापस चली जाती हो
मैं जर्जर किसी मलबे सा खुद को 
जमीं पर बिखरा हुआ पाता हूँ

फिर अपनी टूटी हिम्मत जुटा के
मैं फिर वापस उठना चाहता हूँ
और तभी तुम्हारी यादों का फिर एक ज़लज़ला सा आता है
और मैं फिर मिट्टी की ढेर में बिखर जाता हूँ

तुम कहोगी “तुम खुद ही हो दोषी
ये तो मेरी खता नहीं है”
जानता हूँ, ये सच भी है, पर मैं क्या करूँ
कि खुद पर अब वश मेरा नहीं है

……अभय…..

 

 

कुछ और..

कुछ और..

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कुछ और नहीं मन में मेरे

बस मिलने को आ जाता हूँ

मत पूछो तेरी यादों में

मैं क्यों घर बसाता हूँ


मिलते ही तेरी आँखों से

आँसू झर-झर बहते हैं

लोग कहे उन्हें पानी,  मुझे वो 

मोती ही लगते हैं


अगणित रातों में जब-जब

नींद तुम्हे न आती हो

मेरी क्या गलती है उसमें, जो तुम

दोषी मुझे बताती हो


माना अपना दूर शहर है

मंज़िल भी नहीं मिलती है

मेरी आँखों में झाँक के देखो

तुमसे वो क्या-क्या कहती है


तिमिर चीरने के खातिर

मैं एक  दीया जलाता हूँ

मत पूछो तेरी यादों मैं

मैं क्यों घर बसाता हूँ

……अभय……

दूसरी तरफ से …(कविता )

दूसरी तरफ से…….

दिल में बोझ लिए मैं
भटका इधर उधर
सोचा, कोई तो मिलेगा,
पुछेगा,
क्या हाल है मेरा
हूँ क्यों जर्जर पतझर सा
किस अवसाद ने घेरा
बंटेगा दर्द दिल का तो
मन, सुकून पायेगा
इस अनजान सी नगरी में
कौन जाने,
कोई अपना मिल जायेगा

बीते बरसों
कोई मिला न मुझको
पर मिली एक सच्चाई थी
हर किसी के दिल के अंदर
दर्द भरी इक खायी थी
फिर वो क्या किसी कि मदद करते
जो थे अकेले में आहें भरते

तो मैंने सोचा कि
चलो एक काम करते हैं
उनके ही दर्द बांटकर
कुछ अपने नाम करते हैं
यूँ ही चलता रहा फ़साना
कटते रहे दिन
भूल गया मैं कि
अपना कष्ट क्या था
उनके दर्द बाँटने का
अपना ही मज़ा था

……..अभय……

विश्वास और परिश्रम

अंग्रेजी कैलेंडर में नया वर्ष आ चुका है, वर्ष 2017. सोचा कि वर्डप्रेस पर अंग्रेजी नववर्ष की शुरुआत, नए वर्ष में लिखे अपने एक मुक्तक से करूँ. वैसे तो आप सब जानते होंगें कि मुक्तक काव्य शैली की ही एक विधा हैं. मुक्तक वह काव्य है जिसमें विचार का प्रवाह किसी एक निश्चित दिशा में नहीं होता बल्कि टेढ़ा-मेढ़ा (नॉन-लिनियर) चलता है, पर यह आवश्यक शर्त (necessary condition) नहीं है और यह कविताओं कि तरह लंबी भी नहीं होती. पढ़िए और मुझ तक पहुँचाइये कि आपको कैसी लगी.

विश्वास और परिश्रम

बाधायें बन पर्वत आती है तो आये

दुविधाएं, जो लोगों के मन को विचलित कर जाये

पर होता जिसे खुद पर दृढ़ विश्वास है,

मंज़िल तब दूर नहीं , बिलकुल उसके पास है

 

सुबह की धुन्ध को “आलसवस” , जो रात समझ कर थे सो गए

अपने चुने ही रास्तों में , जाने कहाँ वो खो गए

पर रुके नहीं जो रातों में , शर्दी में या बरसातों में

मिलते उन्हें ही हैं रास्ते  , जो जीते हैं सदा लक्ष्य के वास्ते

……………….अभय………………..