हँसना मत भूलिये…. ;-)

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Credit: Google se uthaya

हँसना मत भूलिये…. 😉

ख़त उछाला मैंने तेरे छत पर,

तेरे पिता के हाथ आयी

भरी दोपहरी में मानों

हो मेरी सामत आयी

टशन में था तेरे छत के नीचे

दोस्त मेरा बुलेट पर ड्राइवर था

बन्दुक लेकर निकला तेरा बापू

मानों आर्मी का स्नाइपर था

बन्दुक देख मैंने झट से बोला,

अबे भाग, जल्दी से बुलेट दौड़ा

नहीं तो कोई और बुलेट चल जाएगी

काला चश्मा लेदर का जैकेट

सारी टशन मिट्टी में मिल जाएगी

हद तो तब हो गयी

बुलेट जब दगा दे गयी

उसने किक लगाया , सेल्फ लगायी

फिर भी वह स्टार्ट न हो पायी

दोस्त को बोला

अबे भाग, 100 मीटर वाली दौड़ लगा

गाड़ी छोड़, पहले

अब अपनी अपनी जान बचा

दोस्त मेरा वजनदार था

भागने में बिलकुल लाचार था

मैं दौड़ता गया

हाय! वो पकड़ा गया

मैंने सोचा अभी दौड़ते ही जाना है

कुछ भी हो अभी तेरे बापू के हाथ न आना है

और बात जहाँ तक दोस्ती के फ़र्ज़ की है

उसे अस्पताल में निभाना है😊

सुरक्षित स्थल तक जब मैं पहुंचा

तो तेरा कॉल आया

दोस्त पे क्या बीतती होगी, उसे कुछ पल भूल

मेरा चेहरा मुस्काया

पर तुम भड़क गयी और बोली

आप भी हद्द करते हैं

भारत मंगल पर पहुँच गया

और आप हैं कि मुझे खत लिखते हैं

और पकडे जाते हैं

अब आपकी एक नहीं सुनूँगी

आपके फ़ोन पे मैं खुद ही

व्हाट्सएप्प इनस्टॉल करुँगी

मैंने बोला यह सब तो ठीक है

ये बात बता, तेरे बापू ने

मेरे दोस्त का क्या हाल कर डाला है

कुछ हड्डियां छोड़ भी दी

या पूरा का पूरा तोड़ डाला है☺️

उसने कहा,

ऐसा कुछ नहीं घटा है

जो संग था आपके

वे मेरे दूर का रिश्तेदार में भाई निकला है

चौंक गया मैं

सोचा की क्या गड़बड़ घोटाला है

जो कल तक मेरा दोस्त था

अब होने वाला मेरा साला है 😜….

जीवन में हँसना मत भूलिये ……….

……….अभय…………

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अपनी राह../ My Way

अपनी राह..

राहों को अपनी, मैं खुद ढूंढ लूंगा

बन पथप्रदर्शक तुम, मुझे न उलझाओ||

मेरे उम्मीदों को अब, पर जो लगें है

अपनी आसक्तियों की, न जाल बिछाओ||

कष्टों का पहाड़ सीधे सिर पर सहा है

राह के रोड़ों से तुम, मुझे न डराओ||

सच है जो कड़वा, मैंने खुद चख लिया है

उसपर झूठ की मीठी तुम, परत न चढ़ाओ||

मंज़िल है मुश्किल औ’ लंबा सफर है

जो बीच में हो जाना, शुरू से साथ न आओ||

ज्ञान की दीपक अब जो जली है

अपने आंसुओं से उसे न बुझाओ||

जाना जहाँ है, राहों में कांटे बिछे हैं||

मेरे लिए अभी फूलों की हार न लाओ||

निराश लोगों की लम्बी पंगत लगी है

सांत्वना भरे गीत तुम, उन्हें ही सुनाओ||

नम्रता में मैंने जीवन है जीया

मेरे खुद पे भरोसे को, मेरा अहम् न बताओ||

………..अभय…………

My Way

I will carve out my own way

Don’t pretend to be my guide and confuse me

My aspirations have found its wings

Don’t entrap it by your frail attachment

I have already faced mountainous hardships

Don’t scare me, with the petty pebbles of the road

I have already tasted the bitter truth

Don’t present it to me by coating sugar on it

All my ignorance is burning in the bonfire of Knowledge

Don’t extinguish it with your incessant tears

Destination is distant and path is treacherous

Don’t accompany me, if you are thinking of leaving in midway

There seems to be a long queue of despondent

Don’t console me, go and cheer them up

I have spent my whole life in humility

Don’t term my self-belief, as an act of arrogance

@Ab

ढोंग ..

ढोंग

ढोंग करना अच्छा लगता है
तब, जब कि हम
धनवान हों तो, निर्धन का
ज्ञानी हों तो, अज्ञानी का
विनम्र हो, फिर अभिमानी का
होश में हैं, बेहोशी का
मदिरा छुई नहीं, मदहोशी का
राज़ पता हो, फिर ख़ामोशी का
जगे हुए हों, फिर सोने का
हर्षित मन हो, फिर रोने का
हरपल संग हों, पर उन्हें खोने का
भक्त हो ,तो अभक्ति का
कोमल ह्रदय हो, तब सख्ती का
मुखर हो, फिर मौन अभिव्यक्ति का
ढोंग करना अच्छा लगता है
…..अभय……

मेघा फिर से आएगा

तुम किसी तेज नदी सी
मैं मिट्टी का, दोनों किनारा
चिर अन्नंत से हो मानो जैसे
मैंने दो बाहें पसारा
तुम तीव्र , प्रवाहमान
कल-कल ध्वनि से गुंजमान
मैं मूक, गुमनाम!
तुम तेज बहती गयी
मैं तेजी से कटता गया!
कण कण मेरा तुममे
घुलता गया , मिलता गया
ये कहानी तबकी जब की
सब कुछ हरा भरा था
पर अब रूखा-सूखा है
तुम संकरी हो चली
किनारों से दूर कहीं खो चली
सब हैं कहते हैं कि
सागर से ही, तुम्हारा वास्ता है
मेरी उपस्थिति तो किंचित, एक रास्ता है
पर मैं अटल हूँ, आश्वस्त हूँ
कि तुम फिर से आओगी
फिर मुझे छू जाओगी
कि मेघा भी तो फिर से आएगा

…….अभय …….

Oh, I love rivers. Sitting on the banks of it, is my favorite task. I have also talked about my this hobby in some of my previous posts. Many of my poetry has taken its shape on these places. Sharing a latest one.

हिंदी साहित्य की जिस विधा का मैंने अतिसय प्रयोग इस कविता में किया हैं, उसे मानवीय अलंकार कहते है. आशा हैं आप तक सही शालमत पहुँचेगी.

अहेतु की कृपा ..

हैरान हूँ!
तेरी सृष्टि से अनजान हूँ
पहेलियों से परेशान हूँ
दर दर भटकता हूँ
छोटे से प्रश्नों पर भी अटकता हूँ
तुम्हें हर जगह ढूँढता हूँ
आँखे भी मूँदता हूँ
पर तुम हो कि तुम्हारा कोई
पद चिन्ह नहीं दिखता
मन से मेरे संशय का
बादल भी नहीं छटता
शास्त्रों को सुना
तत्वदर्शियों से मिला
तुम से मिलने का मार्ग भी जाना
अफ़सोस है कि मैंने अब तक
खुद को न पहचाना
मार्ग मिलन का तुमसे
दुर्गम है, कठिन है
पर हम तो सामर्थ्यविहीन हैं
अहेतु की कृपा का मैं हूँ प्रार्थी
कब कृपा होगी मुझपर भी, हे पार्थ के सारथी !!!

…….अभय ………

शब्द सहयोग:

अहेतु की कृपा : Causeless Mercy
तत्वदर्शियों: Those who know the ultimate reality
सामर्थ्यविहीन : Without having any capacity
पहेलियों : Enigma
संशय: Doubt

गीत गाऊँ

जीवन में अगणित फूल खिले
सुख के दिन चार ,
दुःख की कई रात मिले
आशाओं की ऊँची अट्टालिकाएं सजाई
नियति को उनमे , कई रास न आयी
कुछ ही उनमे आबाद हुए
कई टूटे , कई बर्बाद हुए
किसे दोष दूँ मैं ,
किसे दुःख सुनाऊँ
जाने मैं कौन सा गीत गाऊँ

स्वयं की खोज में मैंने
कईयों को पढ़ा
सैकड़ों ज़िंदगियाँ जी ली मैंने
मैं सहस्त्रों बार मरा
सोचा था कि तुम संग,
चिर अन्नंत तक चलोगे
मुझे क्या पता था कि तुम
पग – पग पर डरोगे
किसे मैं जीवन के ये अनुभव सुनाऊँ
जाने मैं कौन सा गीत गाऊँ

ये भ्रम में न रहना कि
मैंने ये दुःख में लिखा है
या अपने आसुंओ को मैंने
स्याही चुना है
ये उनके लिए हैं
जो ज़िंदा लाश नहीं हैं
या उनके लिए है
जिन्हे अभी खुद पर विश्वास नहीं है
अन्नंत आघात हैं मुझपर, फिर भी मुस्कुराऊँ
“विपदाओं में टूटकर बिखरो नहीं”, मैं यही गीत गाऊँ

……….अभय ………

अब भी मेरे सपनो में आती हो…

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Photo Credit:onehdwallpaper.com

अब भी मेरे सपनो में आती हो…

हाथ पकड़ती थी वो,

कुछ दूर संग मेरे आती थी

देख न ले दुनिया,

जग से नज़रें चुराती थी

मेरे मन के हर कोने में

आशियाँ बनाती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…


अक़्सर लंबी थी जो राहें लगती,

संग तेरे सिमट जाती थी

जिसकी हर हँसी,

पीहू की याद दिलाती थी

हर सावन की पहली बारिश में,

संग मेरे भीग जाती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…


दिन तो बीते जैसे-तैसे,

पर रात ठहर जाती थी

अनायास ही मन को मेरे,

याद तेरी आती थी

हर पल हर क्षण संग हो मेरे,

एहसास कराती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…

………..अभय………..