ढोंग ..

ढोंग

ढोंग करना अच्छा लगता है
तब, जब कि हम
धनवान हों तो, निर्धन का
ज्ञानी हों तो, अज्ञानी का
विनम्र हो, फिर अभिमानी का
होश में हैं, बेहोशी का
मदिरा छुई नहीं, मदहोशी का
राज़ पता हो, फिर ख़ामोशी का
जगे हुए हों, फिर सोने का
हर्षित मन हो, फिर रोने का
हरपल संग हों, पर उन्हें खोने का
भक्त हो ,तो अभक्ति का
कोमल ह्रदय हो, तब सख्ती का
मुखर हो, फिर मौन अभिव्यक्ति का
ढोंग करना अच्छा लगता है
…..अभय……

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सुना है चुनाव है….

सुना है चुनाव है,
बहुत निकट है
परस्थितियां भी अबकी
घोर विकट है

भवसागर की छोड़ो,
किसे पड़ी है?
यहाँ चुनावी नैया
मझदार खड़ी है

“विकास” रूपी पतवार
गर्त में गया है
प्रतिमा के सिवा नहीं,
कुछ भी नया है

रफाएल पर विपक्ष का
पुरजोर है हमला
“भ्रष्टाचार मिटेगा”
क्या ये भी था जुमला?

जीवन में सहर्ष जो कभी
राम नहीं गाते हैं
मरणासन्न हो उन्हें क्या
राम याद आते हैं?

…….अभय ……

Note: A true poet doesn’t side with any establishment. Neither Left nor Right. Read it in this perspective.

समिधा

Samidha

समिधा

चहोदिशी यज्ञ की वेदी के
चौपाल लगाए लोग बैठे
सुधा कलश की आश लगाए ,
टकटकी लगाए, लोग बैठे
कह दो उन्हें कि इस यज्ञ की
समिधा पहले ही स्वाहा हो चुकी है
ज्वाला जो धधकती थी इसमें ,
शनैः शनैः कर अब बुझ चुकी है
समिधा बन अब खुद ही
यज्ञ कुंड में जलना होगा
सरिता हेतु अब हिमगिरि सा
मौन रह, खुद ही गलना होगा

…..अभय…..

समिधा-यज्ञ में आहुति हेतु प्रयोग की जाने वाली लकड़ी

When to speak…Whom to speak

बसंत तो अब बीत चुका है

कुहू तो बस अब मौन रहेगा

क्षितिज पर कालिख बदरी छायी है

सब दादुर अब टर-टर करेगा

                                       ~अभय

 

Spring has gone

Cuckoo will not sing any more

Dark clouds are hovering in the sky

Oh! It’s time for the frogs

                                                                                                 ~Abhay

 

कुहू- कोयल
दादुर- मेढ़क

आप पंक्तियों को खुद से जोड़ पाए तो मैं अपनी सफलता मानूंगा..

मैं, मेरी बहना और ये राखी …

संग आज नहीं हो तुम मेरे
ये कैसी होनी है?
मिठास नहीं है मुख में मेरे
कलाई भी सूनी है!

उदास मन से मैंने उसे
वीडियो कॉल  लगाया
राखी पर घर में न होने की
अंतर्व्यथा बताया

सोचा था मन की व्यथा
उधर भी वैसी ही होगी
मेरी अनुपस्थिति तो शायद
उसे भी खूब खली होगी

पर शैतानी हँसी देख
मैं भौचक्का रह गया
राखी के अवसर पर डिमांड  सुनकर
मैं हक्का-बक्का हो गया

कहा उसने
“तुम हो कहीं भी, अमेज़न पर मेरे लिए
आज ही iPhone X आर्डर कर  देना
और हो सके तो मेरी तरफ से
कलाई पर, एक राखी बांध लेना”

मैंने मन में सोचा
“क्या घोर कलयुग
इतनी जल्दी ही आ गया
भाई बहन के दिव्य रिश्ते को
भौतिक iPhone X खा गया !!!

😂😂😂

………अभय…….

क्यों भाईयों, क्या आपके संग भी ऐसा ही हुआ..और बहनों अपने कुछ ऐसा ही किया …….

दीप, अंधकार, प्रकाश और मैं..

नमस्ते मित्रों, कैसे हैं आप लोग? पिछले कुछ समय से समय की व्यस्तता के कारण हिंदी कविताओं का सृजन और उनका प्रेषण नहीं कर पा रहा था. पर सिर्फ समय को दोष दूँ तो कोई ठीक बात नहीं, समय के संग संग मन में भी विचार पनपने चाहिए और खास कर तब जबकि आप कोई पेशेवर कवि न हों.
कई दिनों बाद आज कुछ विचार आया आप तक पहुँचाता हूँ, ज़रा संभालना 🙂

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जो तुम दीप बुझा दोगे अपनी
घोर अँधेरी रातों में
और सोचोगे कि मैं अब संग मौजूद नहीं
तो मैं बता दूँ आपको कि
मैं न तो प्रदीप्त प्रकाश हूँ
न ही खामोश अंधकार कोई
मेरा अस्तित्व न तो
चंद दीयों पर निर्भर करता है
दीये के जलने पर भी मैं हूँ
दीये के बुझने पर भी मैं ही
माना नज़र न आ सकूँ
पर नज़र न आना और अस्तित्व न होना
दोनों एक बात तो नहीं
बोलो, है कि नहीं ?

…….अभय…….