मेघा फिर से आएगा

तुम किसी तेज नदी सी
मैं मिट्टी का, दोनों किनारा
चिर अन्नंत से हो मानो जैसे
मैंने दो बाहें पसारा
तुम तीव्र , प्रवाहमान
कल-कल ध्वनि से गुंजमान
मैं मूक, गुमनाम!
तुम तेज बहती गयी
मैं तेजी से कटता गया!
कण कण मेरा तुममे
घुलता गया , मिलता गया
ये कहानी तबकी जब की
सब कुछ हरा भरा था
पर अब रूखा-सूखा है
तुम संकरी हो चली
किनारों से दूर कहीं खो चली
सब हैं कहते हैं कि
सागर से ही, तुम्हारा वास्ता है
मेरी उपस्थिति तो किंचित, एक रास्ता है
पर मैं अटल हूँ, आश्वस्त हूँ
कि तुम फिर से आओगी
फिर मुझे छू जाओगी
कि मेघा भी तो फिर से आएगा

…….अभय …….

Oh, I love rivers. Sitting on the banks of it, is my favorite task. I have also talked about my this hobby in some of my previous posts. Many of my poetry has taken its shape on these places. Sharing a latest one.

हिंदी साहित्य की जिस विधा का मैंने अतिसय प्रयोग इस कविता में किया हैं, उसे मानवीय अलंकार कहते है. आशा हैं आप तक सही शालमत पहुँचेगी.

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गीत गाऊँ

जीवन में अगणित फूल खिले
सुख के दिन चार ,
दुःख की कई रात मिले
आशाओं की ऊँची अट्टालिकाएं सजाई
नियति को उनमे , कई रास न आयी
कुछ ही उनमे आबाद हुए
कई टूटे , कई बर्बाद हुए
किसे दोष दूँ मैं ,
किसे दुःख सुनाऊँ
जाने मैं कौन सा गीत गाऊँ

स्वयं की खोज में मैंने
कईयों को पढ़ा
सैकड़ों ज़िंदगियाँ जी ली मैंने
मैं सहस्त्रों बार मरा
सोचा था कि तुम संग,
चिर अन्नंत तक चलोगे
मुझे क्या पता था कि तुम
पग – पग पर डरोगे
किसे मैं जीवन के ये अनुभव सुनाऊँ
जाने मैं कौन सा गीत गाऊँ

ये भ्रम में न रहना कि
मैंने ये दुःख में लिखा है
या अपने आसुंओ को मैंने
स्याही चुना है
ये उनके लिए हैं
जो ज़िंदा लाश नहीं हैं
या उनके लिए है
जिन्हे अभी खुद पर विश्वास नहीं है
अन्नंत आघात हैं मुझपर, फिर भी मुस्कुराऊँ
“विपदाओं में टूटकर बिखरो नहीं”, मैं यही गीत गाऊँ

……….अभय ………

अब भी मेरे सपनो में आती हो…

boy
Photo Credit:onehdwallpaper.com

अब भी मेरे सपनो में आती हो…

हाथ पकड़ती थी वो,

कुछ दूर संग मेरे आती थी

देख न ले दुनिया,

जग से नज़रें चुराती थी

मेरे मन के हर कोने में

आशियाँ बनाती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…


अक़्सर लंबी थी जो राहें लगती,

संग तेरे सिमट जाती थी

जिसकी हर हँसी,

पीहू की याद दिलाती थी

हर सावन की पहली बारिश में,

संग मेरे भीग जाती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…


दिन तो बीते जैसे-तैसे,

पर रात ठहर जाती थी

अनायास ही मन को मेरे,

याद तेरी आती थी

हर पल हर क्षण संग हो मेरे,

एहसास कराती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…

………..अभय………..

ढोंग ..

ढोंग

ढोंग करना अच्छा लगता है
तब, जब कि हम
धनवान हों तो, निर्धन का
ज्ञानी हों तो, अज्ञानी का
विनम्र हो, फिर अभिमानी का
होश में हैं, बेहोशी का
मदिरा छुई नहीं, मदहोशी का
राज़ पता हो, फिर ख़ामोशी का
जगे हुए हों, फिर सोने का
हर्षित मन हो, फिर रोने का
हरपल संग हों, पर उन्हें खोने का
भक्त हो ,तो अभक्ति का
कोमल ह्रदय हो, तब सख्ती का
मुखर हो, फिर मौन अभिव्यक्ति का
ढोंग करना अच्छा लगता है
…..अभय……

सुना है चुनाव है….

सुना है चुनाव है,
बहुत निकट है
परस्थितियां भी अबकी
घोर विकट है

भवसागर की छोड़ो,
किसे पड़ी है?
यहाँ चुनावी नैया
मझदार खड़ी है

“विकास” रूपी पतवार
गर्त में गया है
प्रतिमा के सिवा नहीं,
कुछ भी नया है

रफाएल पर विपक्ष का
पुरजोर है हमला
“भ्रष्टाचार मिटेगा”
क्या ये भी था जुमला?

जीवन में सहर्ष जो कभी
राम नहीं गाते हैं
मरणासन्न हो उन्हें क्या
राम याद आते हैं?

…….अभय ……

Note: A true poet doesn’t side with any establishment. Neither Left nor Right. Read it in this perspective.

समिधा

Samidha

समिधा

चहोदिशी यज्ञ की वेदी के
चौपाल लगाए लोग बैठे
सुधा कलश की आश लगाए ,
टकटकी लगाए, लोग बैठे
कह दो उन्हें कि इस यज्ञ की
समिधा पहले ही स्वाहा हो चुकी है
ज्वाला जो धधकती थी इसमें ,
शनैः शनैः कर अब बुझ चुकी है
समिधा बन अब खुद ही
यज्ञ कुंड में जलना होगा
सरिता हेतु अब हिमगिरि सा
मौन रह, खुद ही गलना होगा

…..अभय…..

समिधा-यज्ञ में आहुति हेतु प्रयोग की जाने वाली लकड़ी

When to speak…Whom to speak

बसंत तो अब बीत चुका है

कुहू तो बस अब मौन रहेगा

क्षितिज पर कालिख बदरी छायी है

सब दादुर अब टर-टर करेगा

                                       ~अभय

 

Spring has gone

Cuckoo will not sing any more

Dark clouds are hovering in the sky

Oh! It’s time for the frogs

                                                                                                 ~Abhay

 

कुहू- कोयल
दादुर- मेढ़क

आप पंक्तियों को खुद से जोड़ पाए तो मैं अपनी सफलता मानूंगा..