तुम भीड़ में होगी..

तुम भीड़ में होगी,
मैं अक्सर खो जाऊंगा
तुम तन्हाई में होगी
तो बहुत याद आऊंगा
ठीक वैसे कि जैसे
सितारे दिन में
खो से जाते हैं
काली अंधेरी रात में फिर से
उभर के आते हैं
~अभय

Oh gosh!!! Finally gotta chance to post something. Last two years were extremely hectic for me(was pursuing my masters). I was unable to post something significant during those days. I regret it. I know there will be a disconnect with my fellow readers, but I am sure you all must haven’t forgotten me 🙂

Would love to see your posts too and also looking forward to hear from new connections 🙂

Cheers

फर्क किसी को पड़ता है

नयनों पर कोई बाँध नहीं
जलमग्न सदा ही रहता है
सुबह शाम में,शाम रात में
चुपके से जा मिलता हैं
सभी व्यस्त हैं,
जीवन में मस्त हैं
गैरों की उलझनों से
कहाँ कोई फर्क किसी को पड़ता है!

…..अभय…..

अकेला छोड़ गया..

Credit: artranked.com

नदी में रेत ही हैं रेत
क्या ये पानी खुद ही पी गया!
मानवता की उम्र लेकर के नफ़रत
क्यों सदियों तक जी गया!

आसमान में तारे दिखते नहीं
क्या खुद ही ये निगल गए!
हिमशिखर जो था कल तक
क्या खुद में ही वे पिघल गए!

वृक्षों में अब फल नही
क्या खुद ही ये तोड़ गए!
उन्मुक्त था जो जीवन में
अवसाद नया ये जोड़ गए!

तेरा चेहरा उदास है क्यों
क्या कोई तुझसे भी मुँह मोड़ गया?
भीड़ में क्या वह तुझे
फिर से अकेला छोड़ गया?

…..अभय…..

दह जाता है..

स्वार्थ, दम्भ औ’ गर्व का पिंजरा
लटकता टँगा रह जाता है

प्रेम का पंक्षी दह जाता है
इतिहास सदा ये कह जाता है
….अभय….

The cage (Selfishness and Pride) burns the bird (Love). This is happening since generations.

जो नज़रों से गिर जाएँ..

पतझर में पेड़ों से पत्ते,
नीचे गिर आते हैं
वसंत आते ही पेड़ों पर पत्ते,
वापस से आ जाते हैं
जो नज़रों से गिर जाएँ
उनके उठने का
कोई मौसम नहीं होता

……अभय……

पैदल ही चल दूंगा…

बिन विवशता के पक्षी

अपना नीड़ छोड़ता  है क्या ?

अपनों खेत खलिहानो से

मुँह  मोड़ता  है  क्या ?

मैंने  भी  घर  छोड़ा  था

स्वजनों के जीवन बचाने को

दो वक़्त की रोटी कमाने को

अविरल अश्रुधार पोछ जाने को

देश नहीं मैंने छोड़ा,

पर गांव ने परदेशी बोला

शहरो ने न कभी मुझको अपनाया

दूर कहीं झुग्गियों में मुझे फेंका आया

बिन  शिकायत  के  मैं

उनके फरमानों को सुनता, सहता रहा

नारकीय  दृश्य  देख  कर  भी

आँखों  को  मूँदता  रहा

अब आज  महामारी  आयी  है

जब  पूरी  दुनिया  में  छायी  है

शाषन तंत्र  का  नग्न  चेहरा

सबके  सम्मुख  आयी  है

विदेशों   से  प्रवासी

विमानों  से  लाये  जायेंगे

अपने देश में ही अपनों के हाथों

हम  ही  सताए  जायेंगे

हमें  सड़कों पर चलता देख

कुछ की  नींद  खुली  है

नींद  इसलिए  नहीं  खुली  कि

वो  संवेदनशील  हो  चले  हैं

इसलिए  खुली  कि  लॉक डाउन  में

सो-सो  कर  थक  चुके  हैं

उन्हें  एंटरटेनमेंट  चाहिए

मीम   का  कंटेंट  चाहिए

गावों  में  अपने  ही  लोग

संदेह  कि  दृष्टि  से  देखंगे

पुलिस  राहों  में

लाठियां  बरसायेंगे

लम्बा  सफर  है ,

तय  कर  ही  लूंगा

कि मेरे पाँवों  में

संघर्ष  का  बल  है

पर  तुम  चुनाव  में

नज़रें  तो  मिलाओगे  फिर  से

कि तेरी  आँखों  में

कहाँ  शर्म  का  जल  है ?

…….अभय…….

जमी बर्फ़ ..

हर रोज़  कई  बातें

तुमसे  मैं  कर  जाता  हूँ

कुछ  ही  उनमें  शब्द  बनकर

जुबां तक आ पाती हैं

कई उनमें  से  मानो

थम  सी  जाती  हैं

ह्रदय  में  कोई  बर्फ़  जैसी

 ज़म सी  जाती  है!

रिश्तों  की  गर्माहट  पा दबे  शब्द  भी

कभी तो  निकलेंगे

सभी  पुरानी  जो  बर्फ़  जमीं  है

कभी  तो  वो  पिघलेंगे

पिघली हुई  बातें  जब

कल-कल  कर  बह  जाएँगी

तब  भी  क्या  तुम  किसी  शैल  सा

खुद  को  अडिग  रख  पाओगी

या  नदी  किनारे  की  मिट्टी  सी

खुद ही  जल  में मिल  जाओगी

तुम भी पिघल जाओगी

…….अभय…….

ढूँढता हूँ..

अमावस की ये रात घनेरी, मैं चाँद ढूंढता हूँ
डर के छुपा जहाँ है शेर बैठा, मैं वो मांद ढूंढता हूँ

सदियों से फैले सन्नाटों में, मैं कोई पैगाम ढूंढता हूँ
सारे नियमों को तोड़ कर, मैं अंजाम ढूँढता हूँ

उलझे सपनों की लम्बी सफर में, मैं राह ढूँढता हूँ
हर झूठी हंसी में तेरी , मैं छुपी कराह ढूँढता हूँ

….. अभय…..

Hello to my fellow bloggers. I came here after a long hiatus, as I was engaged in some hectic work. Hope you all would be fine. I missed your writings, and hoping you also would have missed my poems 😀 Would try to be in touch more frequently. Do let me know your views.

संघर्ष करो…

जीत की कथायें जगजाहिर हैं
कहने में उन्हें सब माहिर हैं
उन कथाओं को तुम रहने दो
मुझे संघर्ष की गाथायें कहने दो

कहने दो मुझे शिवाजी को
राणा की हल्दीघाटी को
बलिदानियों के रक्त से सने
भारत की पग-पग माटी को

कहने दो झाँसी की रानी को
अश्फ़ाक की बलिदानी को
मौत के फंदों को भी हँसकर चूमते
भगत के टोली की मनमानी को

कहने दो तिलक के स्वराज्य को
बापू के राम राज्य को
बाबासाहब की दूरदृष्टि को
भेद रहित नवभारत की सृष्टि को

जीत क्षणिक तो, संघर्ष है शाश्वत
यही है गीता ज्ञान, यही है भागवत
लहू में अपने शौर्य की लाली दिखने दो
मुझे जीवन की नई परिभाषा लिखने दो

………अभय……..