Game of Chess: Black & White

Recently a former Indian parliamentarian sparked a racial controversy during one of his interview to Al Jazeera. The interviewer asked about the recent attack on Nigerian national by the Indian citizens in Greater Noida. Interviewer’s question was that aren’t the Indians racist and discriminates the people on the basis of their color?

In response to the question , former lawmaker said that if we are racist  then how is it possible that North Indians live in harmony with the South Indians for  centuries? This remark, that North is white and South is black,  caused furor in the mainstream media and especially in Southern India.  Demonstrations were held, his effigies were burnt, and he was welcomed with the black flag at many places in Southern Peninsula. When things started to become worse, he apologized for his remarks and finally thing seems to be settled.

Black & White. Credit: Google Image

But what did not settle is my curiosity. The curiosity about the question, are Indians racist ? Do we really prefer white over black? Do we believe in superiority of white vis-a-vis black?

I reflected on these questions but rather than getting a solution, I grappled with more questions. I think answers to these questions will lead to conclusion. 

  1. Why are  there  many advertisements in media especially of beauty creams and soaps, claiming  that they will turn one fairer ? Why is there  a hurry to become white?
  2. Why in matrimonial or even in general proceedings we always mention about the complexion of bride or even of grooms? Why the fairer gets preference?
  3. Why all the news anchors in media, especially women, are of fair complexion? Can’t those who are less fair can read news more effectively?
  4. Why the actresses of Bollywood, or for that matter even from the South Indian film industry, are always fair? Those who are not so fair, can’t  they perform the drama with same or even better elegance?

When you ponder on these questions and reach to a conclusion, let me tell you a very funny and interesting incident which took place 10-15 days back. It was a dark night and I was returning from a temple which is a kilometer away  from my home. The time was approximately 9 PM. I was walking alone towards my home. Suddenly I saw Mannu, an old friend of mine. He was riding bike, and when he crossed me I shouted by his name. He was in good speed, yet on hearing his name he pulled the brake, and with the sound of friction between the tyre and road, the bike stopped. I rushed towards him. He saw me and became delighted as I was too, to meet with him after a long time.

After initial Hi! Hello!…. He said that “when you shouted and forced me to stop the bike, a thought came in  my mind that the guy, who stopped me, has to be  my relative or a very close friend”. I asked smilingly “why you felt in that way?”

His response was epic “He said, my friend, during the dark lunar phase when I almost become one with darkness it is very difficult to recognize me and that too when I was riding bike with some speed,  yet you separated me from gloomy surrounding with perfection” I can’t prevent myself laughing loudly. He was also smiling. Isn’t it the best jokes are the one which we crack on our self?

I was happy that he was not apologetic of his complexion, rather he was confident. To fight the world who tries to bring apartheid system back again, those who are at receiving end has to believe in them. Their believe is their strength…..

Game of Chess is only meaningful when both the sides, black and white, gets equal privileges. 


घोसला ..

आज मन थोड़ा उदास है. सामान्य दृष्टि से देखें तो इसका कारण कोई विशेष और व्यापक नहीं है. हुआ यूँ कि घर में निर्णय लिया गया कि घर का विस्तार किया जायेगा, ऊंचाई बढ़ाई जाएगी . इसकी आवश्यकता भी महसूस हो रही थी, सिर्फ इसलिए नहीं कि हमारा परिवार संयुक्त है पर इससे बड़ा कारण कि घर के आस पास भी लोगों का घर ऊँचा हो रहा है. दुनियाँ दिखावटी है, और हम भी इसके अपवाद नहीं हैं.

मैं इसलिए उदास नहीं कि घर का विस्तार हो रहा है, बल्कि मेरे बगीचे में लगे अमरूद के पेड़ को काटे जाने की बात हो रही है. वह पेड़ इंजीनियर द्वारा दिए गए प्लान में फिट नहीं बैठ रहा है, उसका कहना है कि शहर में जगह की बहुत किल्लत है और यह पेड़ अनावश्यक जगह घेरे हुए है. मेरे पापा जी भी इस बात से सहमत हैं और उनका निर्णय ही अंतिम और सर्वमान्य है.


 Representative Image, Credit: Google

पर चुकी मैं पर्यावरण संरक्षण और पेड़ लगाने  की बात हरेक प्लेटफार्म से करता हूँ तो मुझे थोड़ा अफ़सोस हो रहा है. पर पर्यावरण संरक्षण से ज़्यादा मुझे दुःख इसलिए है कि इस पेड़ से मेरा भावनात्मक लगाव सा हो गया है. और इस लगाव का अनुभव मुझे तब हुआ जब इसको काटने की बात सुनी. कई बार जीवन में ऐसा ही तो होता है न कि किसी चीज की  महत्ता उसके जाने के समय या जाने कि बाद ही समझ आती है.

यह पेड़ बहुत पुराना है. बचपन में मैं इस पेड़ पर चढ़कर अमरुद तोड़ा करता था और अब भी अमरुद वाले मौसम में सिर्फ मेरे परिवार के लोग ही नहीं अड़ोसी पड़ोसी भी तोड़ते हैं . मुझे यह भी याद है कि इसकी एक शाख पर एक झूला भी हुआ करता था. शाम को स्कूल के बाद तो आस पास के बच्चों का मेला सा लग जाता था. और सिर्फ बच्चों का ही नहीं, बड़े लोग भी इसकी छांव में राजनीती और  क्रिकेट के गप्पे लगाया करते थे. इस पेड़ ने नेचुरल अलार्म का भी काम किया, आप सोच रहेंगे कैसे? तो होता यूँ है कि इसपर सुबह सुबह कुछेक पक्षी आकर चहचहाना शुरू कर देते हैं और गर्मी के दिनों में वह आपकी नींद तोड़ने के लिए काफी है. पर मुझे इसका अफ़सोस कभी नहीं रहा क्योंकि मुझे सवेरे उठना पसंद है. इसपर कई बार मैं लाल चोंच वाले तोते भी देखे, मैना भी देखा. पर कौओं ने अपनी संख्या सबसे ज़्यादा होती थी.

इस पेड़ पर एक घोसला भी है, पर अब यह यहाँ नहीं रहेगा. मनुष्य का घोसला ज्यादा जरूरी है, उस घोसले का बड़ा होना भी आवश्यक है. चिड़ियों का क्या है, वो तो उड़ सकती हैं कहीं भी घोसला बना सकती हैं, उनको ईंट, गिट्टी, बालू और सीमेंट भी नहीं खरीदनी होती, तो वो तो मैनेज कर ही लेंगे.  पर्यावरण का क्या है, सिर्फ एक पेड़ काटने से ग्लोबल वार्मिंग पर क्या असर होगा? अमरूद के फल का क्या है, बाजार में मिल ही जायेगा, अलार्म की चिंता भी कहाँ है हमारे पास मोबाइल है घडी है और जहाँ तक झूले की बात है वो तो टेरेस पर लगा ही सकती हैं और उससे कहीं अच्छी  😦

मैंने घर में अपनी बात किसी से नहीं कहीं, और कहता भी तो कुछ होने वाला नहीं था. पेड़ का जीवन है ही ऐसा, पत्थर मारो वो फल ही देंगे, कुल्हाड़ी से काटो जलावन, फर्नीचर को लकड़ी देंगे, CO2 लेंगे और प्राणवायु देंगे, और पूरी तरह निपटा दो तो वह जगह देंगे……

भोर की खोज..

आज कल के भागा दौड़ी वाले समय में मुझे संदेह है कि बहुत कम व्यक्ति होंगे जो रोज सूर्योदय देखते हैं. खासकर युवा वर्ग की नींद तो सूर्योदय के बाद ही खुलती है, ऐसा मैं  मानता हूँ. पर मैं यह नहीं कह रहा कि सभी युवा सूर्योदय के बाद ही उठते हैं .

आज सुबह सुबह का अनुभव आप सब से साझा कर रहा हूँ. वैसे तो बसंत का मौषम ही बड़ा सुहावना होता है. सुबह में तो कुछ और ही ज़्यादा. जब ठंडी ठंडी पवन शरीर को छूती है, आम के मंज़र की खुशबु से मन प्रशन्न हो जाता है, कोयल की कुहू, और जब आप उसके स्वर की नक़ल करो तो उसका लगातार दुहराना, मन को मोहित कर जाता है.

तो आज जब मैं उठा तो सोचा कि कुछ टहल लिया जाये. अभी सूरज निकला  नहीं थी तो वातावरण में अँधेरा व्यप्त था. मुझे नदी, तालाब या झील का तट बहुत अच्छा लगता है. और एक नदी घर के कुछ ही दूरी पर है तो उधर हो चला. साथ में फ़ोन और ईयरफ़ोन भी ले लिया. मेरे म्यूजिक प्लेयर में कुछ गीत थे, पर रिलायंस जिओ ने एक काम अच्छा किया है की डेटा की अब चिंता नहीं करनी पड़ती है और आप गाना ऑनलाइन सुन सकते हो. जितनी मर्जी उतनी.

तो मैंने पर क्लासिकल भजन टाइप किया और कान में ईयरफ़ोन लगा कर घर से निकला. फिर जो भजन मैंने सुना उससे मंत्रमुग्ध हो गया. वह भजन पंडित भीम सेन जोशी ने गायी थी. उनके स्वर में जादू था. मैं आपको बताऊँ तो मैंने वह भजन सुबह से अब तक १५-२० बार से ज़्यादा सुनी पर फिर भी मेरा मन नहीं भरा. इस भजन की सबसे अच्छी बात मुझे इसकी बोल लगी, हरेक शब्द में भाव, हरेक शब्द का अर्थ. आज कल के गीत की तरह नहीं, बिना मतलब का, फूहर…

तो सोचा की आप सब तक भी पहुंचा दूं. हो सकता है आप में से कइयों ने सुनी होगी, और यदि नहीं सुनी तो आप जरूर सुनियेगा. हो सके तो सुबह सुबह सूर्योदय से पहले, खुले में, ईयरफ़ोन लगा के, तेज स्वर में.
मैंने थोड़ी खोज-बीन की तो YouTube पर मुझे मिला, लिंक शेयर कर रहा हूँ. एल्बम का नाम है “कृष्ण कहिये  राम  जपिये” . इस एल्बम की हरेक गीत बहुत मधुर र और सुन्दर हैं पर “कृष्ण कृष्णा कहिये उठी भोर”  का जवाब नहीं , पर यहाँ यह दो भाग में है .एक साथ सुनियेगा तो और भी मज़ा आएगा
मैं इस भजन का transcript भी ब्लॉग पर शेयर कर रहा हूँ जिससे बोल समझने में आसानी होगी.


कृष्ण कृष्ण कहिये उठी भोर…

कृष्ण कृष्ण कहिये उठी भोर
भोर किरण के साथ कृष्णा कह
वन में नाचे मोर

पक्षी के कलरव में वंदन
वंदन लहरें करती
वंदन करती बहे समीरें
गायें हैं पग भरतीं
कृष्ण कृष्ण कह पुत्र जग के माता होये विभोर

गुन गुन कर के कृष्ण कृष्ण कहे
भँवरे डोल रहे हैं
कृष्ण कृष्ण कह कमल पुष्प सब
पंखुड़ी खोल रहे हैं
वंदन की आभा फैली हैं
देखो चारो ओर

फूल टूट के धरा पे बिखरे
इसी भांति है वंदन
दूब के मुख पर ओस पड़ी है
महक उठा है चन्दन
कोयल कूक के वंदन करती
हंस करे किलोर .



बताना मत भूलियेगा की कैसी लगी 🙂

मैं, मेरी परछाई


शनिवार. वीकेंड का पहला दिन, दिन भर की फुरसत और फुरसत में दिमाग कुछ ज्यादा चलता ही है. आज चला और कुछ विचार निकले. फिर उसने एक कविता का रूप लिया.आपके सामने है. आज ही लिखी , और सोचा आज ही पोस्ट कर दूँ, ज़्यादा रिव्यु नहीं कर पाया…

अग्रिम चेतावनी: प्रेमी प्रेमिका मेरे कविता की “परछाई” में अपने प्रेमी प्रेमिका को ढूंढने का प्रयास न करें, वरना कविता के अंत में अफ़सोस होगा  😜😛

मैं, मेरी परछाई

मैं, मेरी परछाई
आज शाम संग बैठे थे
भीड़ से दूर…
एक दूजे के करीब…

परछाई कहने लगी ,
प्रश्न है बहुत दिनों की ,
इज़ाज़त हो तो बयां करूँ
मैं हँसा और हँस के बोला
पूछना, जो पूछना हो ?

उसने बोला

“सबसे करीब तुम्हारे
बोलो कौन है ?
शोर मचाती है जो मन में
पर जुबान पर मौन है ?”

जो मैं कुछ बोलता ,
मन की गठरियों को
सामने उसके खोलता
उसके पहले वो बोल पड़ी
“अरे वो मैं हूँ पगले , मैं हूँ “!!

मैं थोड़ा चकराया ,
मासूमियत भरे उत्तर पर
मंद मंद मुस्काया
और पूछा
“वो कैसे ! फरमाइए “
अपने विचार पर ज़रा
LED वाला प्रकाश तो लाइए

भावना में वो बह गयी ,
और फिर जाने मुझसे क्या क्या कह गयी ,
आपको मैं सुनाता हूँ
बदले में आपका पूरा अटेंशन चाहता हूँ

वो बोली
“संग तुम्हारे हूँ तब से ,
है वज़ुद तुम्हारा जब से ,
तुम चलते हो
मैं चलती हूँ
रुकने से थम जाती हूँ

बिना अपेक्षा के आशा के
साथ तुम्हारे रहती हूँ
दुःख हो या सुख हो
हर भाव मैं सहती हूँ
कितने सावन बीत गए ,
और जितने भी सावन आयेंगे
जो कोई रहेगा साथ तुम्हारे तो
वो मैं हूँ बस मैं हूँ “
मैं बोल पड़ा
“बस कर पगली
अब क्या रुलायेगी ?
इतने दिनों की कहानी
सब ही आज कह जाएगी “

भावुक होता देख उसे
मैं बोला चलो चलते हैं
गाल फूला के आँख झुका के
संग मेरे हो चली

निकल पड़ा घर की ओर
सूरज भी ढलने लगा था
परछाई लंबी होने लगी थी
मैं छोटा लगने लगा था

तभी अचानक
अँधेरा छाया ,
ओर मैं खुद को अकेला पाया

कहाँ गयी मेरी परछाई ?
जो वफाई की दे रही थी दुहाई ?
अँधेरा आते ही सरक गयी
पतली गली से खिसक गयी

तभी मन में विचार आया ,
कभी परछाई आपकी ,
आपसे भी लंबी हो जाती है ,
पर बिन प्रकाश के वो भी ,
साथ छोड़ जाती है .
कोई साथ रहता जो अंधकार में आपके
वो आपकी  परछाई भी नहीं है
“केवल आप हो, और कोई नहीं है”
अब प्रश्न है कि आप कौन हो ?



कॉलेज से कॉर्पोरेट में आने के कुछ ही दिनों बाद, यहाँ के वातावरण को देख चंद पंक्तियाँ मन में आयीं थी. ख़ैर अब तो कुछ समय यहाँ गुज़र गया हैं. अब मैं भी इसका हिस्सा हूँ, पर पंक्तियाँ अब भी प्रासंगिक हैं……सोचा कि आप सब तक भी ब्लॉग के माध्यम से इसको पहुंचा दूँ. आशा है आपको पसंद आयेगी .

Belonging from multilingual country, ubiquitous presence and acceptance of English and knowing that some of the reader base is from English background,  I tried to translate it. But I hardly believe that translation will do justice with the pristine typescript, which is in Hindi, as I lack poetic sense in English. Any way I have given a try. Hope you will like it.


चेहरे कम मुखौटे ज़्यादा

दिखतें हैं इस बाज़ार में

हम बेहतर हैं तुमसे!

सभी जुटे हैं इसी प्रयास में ||1||

जिसका चेहरा जितना बनावटी

वह उतना ही सफल है

छल प्रपंच से भरे खेल में

उसकी दांव प्रबल है ||2||

अपनापन का भाव कहाँ यहाँ पर

केवल स्वार्थ निहित है

भावना से भरे व्यक्ति की

हार यहाँ निश्चित है ||3||


Masks are conspicuous as the faces are heavily covered by it in this place. Most of them are engaged in proving themselves better than others. ||1||

Those who can mold their faces easily suiting to the person and circumstances they face, are assumed to be successful. In the world of  treachery and deceit , chances are there that they will emerge victorious. ||2||

Relationships are based on the vested interests of each other and those who are filled with emotions, for them situations are very bleak here ||3||