तुम भीड़ में होगी..

तुम भीड़ में होगी,
मैं अक्सर खो जाऊंगा
तुम तन्हाई में होगी
तो बहुत याद आऊंगा
ठीक वैसे कि जैसे
सितारे दिन में
खो से जाते हैं
काली अंधेरी रात में फिर से
उभर के आते हैं
~अभय

Oh gosh!!! Finally gotta chance to post something. Last two years were extremely hectic for me(was pursuing my masters). I was unable to post something significant during those days. I regret it. I know there will be a disconnect with my fellow readers, but I am sure you all must haven’t forgotten me 🙂

Would love to see your posts too and also looking forward to hear from new connections 🙂

Cheers

Force of Love ..

Not the gravitational pull nor even the strong nuclear force, but for human, having deep emotions, LOVE is the strongest force in the Universe, yet if it is misdirected, it can make them feel one of the feeblest and most miserable creature of the creation.

Ab…

P.S. The ardent follower of fundamental science, please forgive me for my dare that I challenged all established scientific evidences and came up with new set of theory 😀

Felt Humbled..

I started posting on the blog nearly 4 years back. Since last two years or so I was very sporadic and felt disconnected from this platform due to paucity of time. Yet whenever I turned here, you people always encouraged and motivated me.

Toady I got one notification that made me feel happy and humbled. Thank you for supporting and connecting with me. I truly appreciate this gesture. Stay connected, stay home, stay safe! Love❤️

जमी बर्फ़ ..

हर रोज़  कई  बातें

तुमसे  मैं  कर  जाता  हूँ

कुछ  ही  उनमें  शब्द  बनकर

जुबां तक आ पाती हैं

कई उनमें  से  मानो

थम  सी  जाती  हैं

ह्रदय  में  कोई  बर्फ़  जैसी

 ज़म सी  जाती  है!

रिश्तों  की  गर्माहट  पा दबे  शब्द  भी

कभी तो  निकलेंगे

सभी  पुरानी  जो  बर्फ़  जमीं  है

कभी  तो  वो  पिघलेंगे

पिघली हुई  बातें  जब

कल-कल  कर  बह  जाएँगी

तब  भी  क्या  तुम  किसी  शैल  सा

खुद  को  अडिग  रख  पाओगी

या  नदी  किनारे  की  मिट्टी  सी

खुद ही  जल  में मिल  जाओगी

तुम भी पिघल जाओगी

…….अभय…….

Transient World

An American tourist visited a sadhu.He was astonished to see the Muni’s room which was plain and simple. The only furniture was a mat and wooden pots.

Tourist :”With due respect, may I ask where’s your furniture and other household things?”

Muni: “Where is yours?”

Tourist : “Mine? But I’m only a visitor here.”

Muni: “So am I !’

हँसना मत भूलिये…. ;-)

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Credit: Google se uthaya

हँसना मत भूलिये…. 😉

ख़त उछाला मैंने तेरे छत पर,

तेरे पिता के हाथ आयी

भरी दोपहरी में मानों

हो मेरी सामत आयी

टशन में था तेरे छत के नीचे

दोस्त मेरा बुलेट पर ड्राइवर था

बन्दुक लेकर निकला तेरा बापू

मानों आर्मी का स्नाइपर था

बन्दुक देख मैंने झट से बोला,

अबे भाग, जल्दी से बुलेट दौड़ा

नहीं तो कोई और बुलेट चल जाएगी

काला चश्मा लेदर का जैकेट

सारी टशन मिट्टी में मिल जाएगी

हद तो तब हो गयी

बुलेट जब दगा दे गयी

उसने किक लगाया , सेल्फ लगायी

फिर भी वह स्टार्ट न हो पायी

दोस्त को बोला

अबे भाग, 100 मीटर वाली दौड़ लगा

गाड़ी छोड़, पहले

अब अपनी अपनी जान बचा

दोस्त मेरा वजनदार था

भागने में बिलकुल लाचार था

मैं दौड़ता गया

हाय! वो पकड़ा गया

मैंने सोचा अभी दौड़ते ही जाना है

कुछ भी हो अभी तेरे बापू के हाथ न आना है

और बात जहाँ तक दोस्ती के फ़र्ज़ की है

उसे अस्पताल में निभाना है😊

सुरक्षित स्थल तक जब मैं पहुंचा

तो तेरा कॉल आया

दोस्त पे क्या बीतती होगी, उसे कुछ पल भूल

मेरा चेहरा मुस्काया

पर तुम भड़क गयी और बोली

आप भी हद्द करते हैं

भारत मंगल पर पहुँच गया

और आप हैं कि मुझे खत लिखते हैं

और पकडे जाते हैं

अब आपकी एक नहीं सुनूँगी

आपके फ़ोन पे मैं खुद ही

व्हाट्सएप्प इनस्टॉल करुँगी

मैंने बोला यह सब तो ठीक है

ये बात बता, तेरे बापू ने

मेरे दोस्त का क्या हाल कर डाला है

कुछ हड्डियां छोड़ भी दी

या पूरा का पूरा तोड़ डाला है☺️

उसने कहा,

ऐसा कुछ नहीं घटा है

जो संग था आपके

वे मेरे दूर का रिश्तेदार में भाई निकला है

चौंक गया मैं

सोचा की क्या गड़बड़ घोटाला है

जो कल तक मेरा दोस्त था

अब होने वाला मेरा साला है 😜….

जीवन में हँसना मत भूलिये ……….

……….अभय…………

मेघा फिर से आएगा

तुम किसी तेज नदी सी
मैं मिट्टी का, दोनों किनारा
चिर अन्नंत से हो मानो जैसे
मैंने दो बाहें पसारा
तुम तीव्र , प्रवाहमान
कल-कल ध्वनि से गुंजमान
मैं मूक, गुमनाम!
तुम तेज बहती गयी
मैं तेजी से कटता गया!
कण कण मेरा तुममे
घुलता गया , मिलता गया
ये कहानी तबकी जब की
सब कुछ हरा भरा था
पर अब रूखा-सूखा है
तुम संकरी हो चली
किनारों से दूर कहीं खो चली
सब हैं कहते हैं कि
सागर से ही, तुम्हारा वास्ता है
मेरी उपस्थिति तो किंचित, एक रास्ता है
पर मैं अटल हूँ, आश्वस्त हूँ
कि तुम फिर से आओगी
फिर मुझे छू जाओगी
कि मेघा भी तो फिर से आएगा

…….अभय …….

Oh, I love rivers. Sitting on the banks of it, is my favorite task. I have also talked about my this hobby in some of my previous posts. Many of my poetry has taken its shape on these places. Sharing a latest one.

हिंदी साहित्य की जिस विधा का मैंने अतिसय प्रयोग इस कविता में किया हैं, उसे मानवीय अलंकार कहते है. आशा हैं आप तक सही शालमत पहुँचेगी.