Magnificent Morning

So when social media got flooded with the Video in which Rahul Baba seen as saying “This morning I got up at night…”, I thought what have forced him to say this unusual (you may even call it illogical J) sentence. I did not reach to any conclusion, though I have some inkling that he might be referring to the time period what we call as “Brahma Muhrat”, or the time period of early dawn.

Today morning when I woke up (not at night 😉 ) and went for morning walk I tried to capture the nature through my phone.

Behold the beauty…And also let me know which one you liked most…

 

IMG_20181002_064914

 

IMG_20181002_064619

 

IMG_20181002_064607

 

IMG_20181002_064114

IMG_20181002_070205

IMG_20181002_072236

Advertisements

Hit-Wicket on V -Day :-P

img_20160813_111039_hdr
River Swarnrekha, during Monsoon.

So, I am continuing from where I have left it yesterday, as some event prompted me to write it again.  If you haven’t read, and willing to do so, you can check it out @ भोर की खोज..

Today also I woke up early. It was dark outside. But a hope was there that sun will emerge soon out of this darkness. I prepared myself for the morning walk. At 05:00 hrs I left home. Outside, season was tantalizing as usual in Feb. Cold breeze was blowing. Aroma of mango flowers (we call it  Manjari in Hindi), conspicuous in this month, were enchanting.

I plugged  in my ear phones and played the same Song (Bhajan) which I have mentioned in my last blog भोर की खोज... The volume was at maximum. Contemplating on each words of the song and appreciating the classical music of India and the way Pt. Bhim Sen Joshi has sung, I was marching towards the river.

It was still dark yet the street lights were glowing. Some other people were also strolling on the street. I was completely observed in the song then suddenly someone hold my hand. I experienced how fast our mind could be. Before I could turn back, numerous bizarre thought came. Who it could be?

A ghost!!!!  Oh it’s Valentine Day, how can I forget the atmosphere which has been created since past week for 14th February, especially on WP. Someone hold my hand in the very morning. Thought, Saint Valentine must be very kind on me.

But when I turned around, all my imaginations were shattered in seconds :P. I saw an old man in his 50s. His face was frightened. I asked “चचा !! क्या हुआ ??” (Uncle! What happened?) He was telling something, but since the music was playing at maximum volume, I couldn’t hear him. I plugged out my ear phone. Then heard asynchronous and horrific sound of woof.. woof.. woof.. Nearly 5-6 stray dogs were behind him. He said, “साले ! कुत्ते  पीछे   हैं ” (Dogs are behind me). I said “वो  तो  देख  रहा  हूँ , आप घबराओ मत, मेरे पीछे आ जाओ ” (That I am seeing, don’t panic just stay behind me). Then I stayed calm and scarred the dog by pretending to throw pebbles at them, when there was no stones around. Somehow dogs got scarred and ran away.

I smiled at uncle and ask jokingly, “क्या  चचा!!!  वैलेंटाइन  डे  के  दिन  आज  मैं  ही  मिला  था  सुबह  सुबह  हाथ  पकड़ने  को 🙂“(Uncle! on this valentine day you only found me to hold hand ) . As it turned out, uncle was more humorous, he replied  “बेटा , खैर  मनाओ  बजरंग  दल  से  हूँ मैं , जान  नहीं  बचायी  होती  तो  वैलेंटाइन  डे  के दिन, दिन भर तुम्हारे पीछे अपने आदमियों को छोड़ता ” (Son! you are lucky, I am from Bajrang Dal, if you haven’t saved my life today, then for taking the name of Valentine, I would have sent my men to have a watch on you for the entire day). I said jokingly, “ये पराक्रम कुत्तो  पर  क्यों  नहीं  दिखाया” (Why don’t you displayed your valor to the dogs). He replied more wittingly, “कुत्ते  थोड़े  ही न  वैलेंटाइन  डे  मानते  हैं ” (Dogs never celebrate Valentine Day).

I burst in to laughter, he followed me too. I said “Namste”  to him and marched forward towards the river. He replied “Thank You“. On reaching there, I removed  my shoes off and dipped my feet in to the water. Water was colder than the wind. Someone has just rang the temple bell. Birds were taking flights towards their destination. I was smiling……

 

भोर की खोज..

आज कल के भागा दौड़ी वाले समय में मुझे संदेह है कि बहुत कम व्यक्ति होंगे जो रोज सूर्योदय देखते हैं. खासकर युवा वर्ग की नींद तो सूर्योदय के बाद ही खुलती है, ऐसा मैं  मानता हूँ. पर मैं यह नहीं कह रहा कि सभी युवा सूर्योदय के बाद ही उठते हैं .

आज सुबह सुबह का अनुभव आप सब से साझा कर रहा हूँ. वैसे तो बसंत का मौषम ही बड़ा सुहावना होता है. सुबह में तो कुछ और ही ज़्यादा. जब ठंडी ठंडी पवन शरीर को छूती है, आम के मंज़र की खुशबु से मन प्रशन्न हो जाता है, कोयल की कुहू, और जब आप उसके स्वर की नक़ल करो तो उसका लगातार दुहराना, मन को मोहित कर जाता है.

तो आज जब मैं उठा तो सोचा कि कुछ टहल लिया जाये. अभी सूरज निकला  नहीं थी तो वातावरण में अँधेरा व्यप्त था. मुझे नदी, तालाब या झील का तट बहुत अच्छा लगता है. और एक नदी घर के कुछ ही दूरी पर है तो उधर हो चला. साथ में फ़ोन और ईयरफ़ोन भी ले लिया. मेरे म्यूजिक प्लेयर में कुछ गीत थे, पर रिलायंस जिओ ने एक काम अच्छा किया है की डेटा की अब चिंता नहीं करनी पड़ती है और आप गाना ऑनलाइन सुन सकते हो. जितनी मर्जी उतनी.

तो मैंने ganna.com पर क्लासिकल भजन टाइप किया और कान में ईयरफ़ोन लगा कर घर से निकला. फिर जो भजन मैंने सुना उससे मंत्रमुग्ध हो गया. वह भजन पंडित भीम सेन जोशी ने गायी थी. उनके स्वर में जादू था. मैं आपको बताऊँ तो मैंने वह भजन सुबह से अब तक १५-२० बार से ज़्यादा सुनी पर फिर भी मेरा मन नहीं भरा. इस भजन की सबसे अच्छी बात मुझे इसकी बोल लगी, हरेक शब्द में भाव, हरेक शब्द का अर्थ. आज कल के गीत की तरह नहीं, बिना मतलब का, फूहर…

तो सोचा की आप सब तक भी पहुंचा दूं. हो सकता है आप में से कइयों ने सुनी होगी, और यदि नहीं सुनी तो आप जरूर सुनियेगा. हो सके तो सुबह सुबह सूर्योदय से पहले, खुले में, ईयरफ़ोन लगा के, तेज स्वर में.
मैंने थोड़ी खोज-बीन की तो YouTube पर मुझे मिला, लिंक शेयर कर रहा हूँ. एल्बम का नाम है “कृष्ण कहिये  राम  जपिये” . इस एल्बम की हरेक गीत बहुत मधुर र और सुन्दर हैं पर “कृष्ण कृष्णा कहिये उठी भोर”  का जवाब नहीं , पर यहाँ यह दो भाग में है .एक साथ सुनियेगा तो और भी मज़ा आएगा
मैं इस भजन का transcript भी ब्लॉग पर शेयर कर रहा हूँ जिससे बोल समझने में आसानी होगी.

 

कृष्ण कृष्ण कहिये उठी भोर…

कृष्ण कृष्ण कहिये उठी भोर
भोर किरण के साथ कृष्णा कह
वन में नाचे मोर

पक्षी के कलरव में वंदन
वंदन लहरें करती
वंदन करती बहे समीरें
गायें हैं पग भरतीं
कृष्ण कृष्ण कह पुत्र जग के माता होये विभोर

गुन गुन कर के कृष्ण कृष्ण कहे
भँवरे डोल रहे हैं
कृष्ण कृष्ण कह कमल पुष्प सब
पंखुड़ी खोल रहे हैं
वंदन की आभा फैली हैं
देखो चारो ओर

फूल टूट के धरा पे बिखरे
इसी भांति है वंदन
दूब के मुख पर ओस पड़ी है
महक उठा है चन्दन
कोयल कूक के वंदन करती
हंस करे किलोर .

 

 

बताना मत भूलियेगा की कैसी लगी 🙂