बेख़ौफ़! अँधेरी रातों में, हाथों में लिए दीया , ये कौन चल रहा है?

हैरान हूँ! मैं इस ज़माने से, जाने क्यों वो उससे, इस क़दर जल रहा है?



बस तेरा इंतज़ार है..

Credit: Google Image

धम से गिरे
धरनी पर
शिखर से,
ज़ख्म गहरा हुआ
चोट हरा हुआ
पर गिरने का यह पहला
वाक़या तो न था
कई पहले भी लुढ़के
गिरे गर्त में
वर्षों तक
सिसकते रहे
मरणासन्न रहे
संवेदनहीन रहे
निर्जीव सा गौण रहे
व्योम सा मौन रहे
पर लड़ते रहे
जूझते रहे
झुलसते रहे
आपदाओं में
विपदाओं से
लोगों की विष भरी
बोली से
आलोचकों की अगणित
टोली से
तो तुम जो गिर गए
तो इसमें नया क्या था?
कि अब तुम उठते ही नहीं
कि तन के ज़ख्म भी
जब सूखते हैं
हम उसे कुरेदते नहीं हैं
तो मन के ज़ख्म पर
ये अत्याचार क्यों?
स्मरण रहे कि
जो शिखर पर तुम पहुंचे थे
तब भी पुरुषार्थ लगा था
फिर से पुरुषार्थ लगेगा
कि तुममें जो नैसर्गिक है
वो भला तुमसे कौन लेगा?
कि अब दुर्बलता छोड़ो
कि सब तैयार हैं
हिमालय की
सबसे ऊँची चोटी को
बस तेरा इंतज़ार है

…….अभय …….

कविता का भाव आप लोगों तक पहुंचा हो, तो अपने भाव मुझ तक पहुँचाना न भूलें 🙂

शब्द सहयोग:
गौण: Subordinate, Secondary
व्योम: Sky, Space
नैसर्गिक: Inherent


Embed from Getty Images

धूप शीतल
छाँव तप्त
जिसे वर मिला था
वही अभिशप्त

जो दृढ खड़ा था
संदेह में है
अकर्मण्यता से
नेह में है

जो पथप्रदर्शक था
पथभ्रष्ट है वो
शिथिलता से
आकृष्ट है जो

नित्य स्वरूप का उसे
कोई तो स्मरण कराये
इस हनुमान को
कोई जामवंत तक ले जाये

………अभय ……..

साहस ..

Embed from Getty Images

दो परिस्थितयां हैं …एकदम सीधी सी, सुलझी हुई …पहला, जो साहसी होते हैं वो साहस से भरा कार्य करते हैं और  दूसरा, साहसिक कार्य करने से ही लोग साहसी कहलाते हैं ..तो हम किसी भी परिस्थिति में क्यों न हों, साहसी बनने का बराबर मौका है…

She shines

Who motivates us?

When someone achieves some extraordinary feat, even when they face a lot of hurdles and pains in their way, in my opinion, those persons motivate us. Isn’t it?

But, it is true that this is not the case for all of us, as many claims that they are self motivated. Many argue that no humans can be their motivation as they are only motivated through divine aspect of the nature.

Have you ever been in any situation in your life where you have felt that you are alone amidst the mob? Yes, No.

Anyway, Skip this question and face a new one.

Have you ever been really alone and secluded, where no one is besides you and the closet person are physically situated miles apart from you? I think most us wouldn’t have experienced this kind of situation.

Six girls decided the fate that they are going to place themselves in the same situation and that too willingly. They are Lieutenant Commander Vartika Joshi , Lieutenant Commander Pratibha Jamwal, Lieutenants P Swathi, Vijaya Devi, Payal Gupta and B Aishwarya.

Credit: Internet

Do you know them? Yes, No. Doesn’t matter, even I were oblivious of them till recently.

I think they are worth knowing. That is why I decided to write about them.

All of them, whose name I have mentioned, are officers of Indian Navy and they have decided to circumnavigate the earth without any assistance of their male counterpart. This means that all women crew, for the first time in the History of India, have decided to have a complete a circle around the earth in a ship called INS Tarini. They have already started the journey and has reached the first leg of it.




The mission is termed as Navika Sagar Parkirama. This mission was flagged by, first full time female Defence Minister of India, Nirmala Sitaraman.

Few facts about the mission:

  • INSV Tarini is 55 foot sailing vessel built indigenously in India by M/s Aquarius Shipyard Pvt Ltd, Goa.
  • The expedition will be covered in five legs, with stop-overs at 4 ports Fremantle (Australia), Lyttleton (New Zealand), Port Stanley (Falklands), and Cape Town (South Africa) for replenishment of ration and repairs as necessary.
  • It will circumnavigate globe in approximately 165 days and is expected to return to Goa in April 2018.
  • The ship will promote Make in India, as it is indigenously built.
  • The crew will check and collect the data for marine pollution.

Many of you would be aware that in ancient time, Indians were not supposed to cross over the oceans, because it was termed as inauspicious. That was the day and this is the day, when only women crew has started a voyage to break the shackles of the idea that women are subordinate to men and they can’t venture alone in life. Imagine the journey, it will not be easy. There will be dark nights, and that too in ocean. There may be no humans in their sight for miles. The sound of the ripples of the ocean may be horrific.  Some waves will be huge. They may encounter some pirates in their journey. The ship is not too big and waves and thunderstorm may test their mettle in mid way. But they are prepared for it. They have already faced the waves of prejudice and subjugation by male dominated society, probably their voyage will be easier than the voyage that women has had over the centuries in India. They have decided to lost in joy of the journey, and when they will return back to Indian Coast, probably many Indians will discover a new perspective.

These all  girls inspired me, and I hope they will also inspire you!!!



जीवन मतलब चुनाव

राखी की छुट्टी तो मिली नहीं, पर वीकेंड था और फिर एक दिन के लिए आप अस्वस्थ तो हो ही सकते हैं 😁. तो फिर मैं बिना समय व्यर्थ किये अपने बहन के घर राखी के एक दिन पहले पहुँच गया. बहन ने पूछा कि कल खाने में क्या बनाऊं..मैंने झट से बोला.. और क्या नाश्ते में बटर मसाला डोसा और लंच में पनीर की कोई सी भी सब्जी..बहन हँस के बोली कभी और भी कुछ फरमाईश कर लिया करो….
जब बहन चली गयी तो, तो मेरा ध्यान उस प्रश्न पर गया. “खाने में क्या बनाऊं ?” थोड़ी सोच की गहराई में गया तो ध्यान आया कि वास्तव में यह प्रश्न एक चुनाव की तरह है, जिसमे आपके सामने कई विकल्प होते हैं और उन विकल्पों में से आपको एक विकल्प का चयन करना होता है.. फिर मैं शाम को पार्क में टहल रहा था और
जो विचार आया तो उसे आपके समक्ष छोड़ रहा हूँ. सम्भालिये इसको..

कुछ मुस्लिम और तथाकथित साम्यवादी राष्ट्रों (Socialist Nations) को छोड़ दें तो दुनिया ने मुख्यतः लोकतंत्रीय प्रणाली शासन व्यवस्था (Democratically Elected Forms of Government)को अपनाया है. लोकतंत्र का विचार सुनने भी अच्छा लगता है. इसलिए जो राष्ट्र लोकतंत्रीय नहीं है वह भी अपने को लोकतंत्रीय साबित करने में लगे रहतें हैं. वे भी चुनाव करवाते हैं, भले ही चुनाव में एक ही पार्टी क्यों न रहे (चीन को ही ले लीजिये ना), या चुनाव पक्षपात से पूर्ण हो (मैं रूस का नाम नहीं लेना चाहता क्योंकि उन्होंने हमारे बहुत कठिन समय में कंधे से कन्धा मिलाकर सफर तय किया हैं, पर सत्य को कोई झुठला भी तो नहीं सकता).

ख़ैर छोड़िये, हममें से कई हैं जो लोकतंत्र को भी पसंद नहीं करते होंगे. उनको लगता होगा कि काश हमारे देश में भी चीन की तरह एक सख्त सरकार होती तो निर्णय लेने और उसको जमीं पर हकीकत में लाने में सहूलियत होती. और यदि चीन के पिछले तीन दसक के विकास रफ़्तार और दुनिया में उसकी बढ़ती साख को देखेंगे थो हमें यह विचार और भी अच्छा लगने लगेगा.

ख़ैर मैं इसपर ज़्यादा तर्क नहीं करूँगा और एक बात जो मैंने किसी साहित्य में पढ़ी थी, उसको वापस दोहराऊंगा. Don’t compare practical Democracy with ideal Autocracy. मतलब कि “व्यावहारिक लोकतंत्र की तुलना किसी निरंकुश शासन से ना करें”.

चलिए ये तो हो गयी भूमिका. अब आते है आज के तत्व पर. लोकतंत्र की सबसे आवश्यक गतिविधि क्या है? तो निश्चय ही “चुनाव” पहले स्थान पर आएगा. चुनाव के माध्यम से ही हम प्रतिनिधि चुनते है और अपेक्षा रखते है कि वह हमारी आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा करेगा.

भाई, ये चुनाव हैं बड़ा लाजवाब चीज. और आपके बता दूँ कि मैं खुद को राजनितिक चुनाव तक सिमित नहीं कर रहा हूँ. मैं जिस चुनाव कि बात कर रहा हूँ वह हमारे पुरे जीवन में व्याप्त हैं. या यह कहना कि जीवन “चुनाव” ही है exaggeration (हिंदी में उपयुक्त शब्द नहीं सूझ रहा था, शायद अतिशयोक्ति हो) नहीं होगा.


अब देखिये ना चुनाव भी कैसे कैसे हो सकते है: कौन सा लड़का या लड़की जीवन के लिए सही होगा या होगी, यहाँ पर चुनाव; प्रेम के पश्चात विवाह या विवाह के पश्चात प्रेम, इसको तय करना;अब बच्चे हुए (अब क्या करें, ये तो होते ही है ) तो उनको कौन से विद्यालय में भेजना वहां पर चुनाव, बच्चों को पढ़ने के लिए कौन सा विषय चुनना, वहां पर चुनाव, पढ़ाई करना या खेल में भाग्य आजमाना, यहाँ भी चुनाव, IPL में कौन सी टीम का पक्ष लेना वहाँ पर चुनाव, सम्माननीय राहुल गाँधी जी को चुनना या 56 इंच के सीने वाले मोदी जी को चुनना यहाँ पर चुनाव, मैगी खाना या पतंजलि आटा नूडल पकाना, यहाँ पर चुनाव, शाकाहारी बनाना या मुर्गे कि टांग दबोचना, यहाँ भी चुनाव, यदि आपकी माशूका को कोई बहुत घूर रहा है तो तत्काल में ही उसकी आगे की दो दांतों को तोडना या योजनाबद्ध तरीके से उसपर हमला, ये सभी चुनाव के ही उदाहरण हैं.. आप और भी उदाहरण सोच सकते हैं, क्योंकि सोचने में किसी के पिताजी की रोक टोक तो है नहीं 🙂

इन चुनावों के अलावा एक और चुनाव हम सबके जीवन में आता है, और वह चुनाव है बड़ा महत्वपूर्ण . वह है जीवन रूपी युद्ध. इस जीवन रूपी युद्ध के चुनाव में केवल दो विकल्प होते हैं

1. संघर्ष
2. समर्पण

समर्पण भी कोई ख़राब विकल्प नहीं है, इसमें आपको प्रतिस्पर्धा का डर नहीं होता, न ही अथक परिश्रम की जरुरत, न तो किसी स्वानुशासन का कष्ट और न ही लोगों की अपेक्षाओं का बोझ.
पर इसकी एक अजीब सी शर्त है, जो खुद्दार लोगों को कभी मान्य नहीं हो सकती और वो है समर्पण के लिए आपका स्वाभिमान मरा हुआ होना चाहिए. और यदि आपका स्वाभिमान मर चूका है तो समर्पण कर सकते हैं

समर्पण के विपरीत होता है संघर्ष. भले ही सकल जगत आपके खिलाफ हो पर यदि संघर्ष की भावना बची हुई है और मन में यह विश्वास बचा है कि आपका उद्देश्य जायज़ है तो इसको अपनाया जा सकता है. संघर्ष में दो संभावनाएं हैं विजय या वीरगति. योद्धा के लिए दोनों स्थिति ही मान्य होनी चाहिए. इसकी सत्यापन स्वयं श्री कृष्णा करते हैं. मैं गीता पढ़ रहा था तो एक श्लोक पर दृष्टिपात हुआ इस श्लोक में भगवान अर्जुन को संघर्ष का मतलब समझाते हैं

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌ ।

तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥2.37॥

हे कुन्तीपुत्र! तुम यदि युद्ध में मारे जाओगे तो स्वर्ग प्राप्त करोगे या यदि तुम जीत जाओगे तो पृथ्वी के साम्राज्य का भोग करोगे | अतः दृढ़ संकल्प करके खड़े होओ और युद्ध करो |

भैया-बहनों को राखी की पूर्व शुभकामनायें और मित्रों को Belated Happy Friendship Day. वे यह लेख उपहार स्वरुप रख सकते हैं …. 🙂

Nature as Teacher

Shubh Prabhatam!!!

I am sharing a photograph with you, that I have taken few days back, and you all have to do is to guess what exactly it is? Is it a field? Which crop is grown by the farmers in this field? If not, what is it? Take your time, don’t go bottom part, unless you have a guess.

Guess What?


Have you guessed? Yes, No.

Anyways, since I have not introduced any prize money for guessing the correct answer, so even if you didn’t guess, no reason to be saddened.  🙂

Behold the second sets of Pics, which I have taken few months ago, precisely in Spring, and you will be amazed to see the contrast between the two as both the pictures are of same location, may be I have taken it from different position.

Pristine Flow
The game, which we all loved to play near the river


These photographs are of Swarnrekha, a major River of Peninsular India, in the mineral rich state of Jharkhand.

Since past two years, I am observing a phenomenon. During summer some part of the river is completely inundated by a weed called Nasturtium/(Jalkumbhi, जलकुम्भी ). Its growth is very fast. Weeds are those undesired plants which gives competition to the intended crop by taking nutrition from the field, which were actually meant for the growth of desired crop. Due to excessive Nasturtium, rivers loses its identity and seems like a pond. Dissolved oxygen in the water gets reduced which is unhealthy for marine ecosystem.

Current status, from a different angle

Reasons for its growth: As we all know, unlike the Himalyan Rivers, Peninsular Rivers are ephemeral and mostly depends on rain. So few months after Monsoon and especially in summer the water in the river becomes low and its speed reduces drastically. A huge chunk of industrial and municipal waste is directly discharged in to the river generating an ideal condition for the growth of Nasturtium.

But, then comes the Monsoon, with all its might. Rivers banks are raised. Peninsular Rivers can be very violent and tumultuous in rainy seasons. Flow along with water level increases dramatically. Nasturtium grows only in steady water. Tremendous increase in flow results in washing out all the unintended weeds. Soon the whole river becomes pure and pristine and river gets it real identity.

Parallels in life:

It is said that nature is the greatest teacher. It teaches us the different lessons through its various acts, provided we monitor it carefully.

Some time in our life, our mind is preoccupied with many negative thoughts. They can be compared as the Nasturtium weeds in the river. They drain our energy and prevent us from displaying our real worth or character. Negative thoughts are just like weeds in the field which takes our limited energy meant for our enlightenment and progress.

But, like river receives Monsoonal water to which washes away the unintended weed, we also get many opportunities and instances in our life. River relinquishes the weeds in that force of water and attains its real nature. Are we ready to leave negativities to live in our true potential?

I think we are in better position than the river. Monsoon comes only once in a year, but if we desire, there can be many opportunities in our life to shed all the negativities and drags.