कोई बयार..

Did you ever feel, sometime, somethings similar has happened in past ? Didn’t you? 🙂

कभी कभी कोई बयार मुझे इस क़दर छू जाती है
ऐसा लगता है कि मानो कहीं तुम कोई बहरूपिये तो नहीं
लबों पर मुस्कान मेरे आती हैं, शायद किसी की दुआ है
ऐसा लगता है कि मानो पहले भी कभी ,ऐसा ही कुछ हुआ है

Ab

बेख़ौफ़!

बेख़ौफ़! अँधेरी रातों में, हाथों में लिए दीया , ये कौन चल रहा है?

हैरान हूँ! मैं इस ज़माने से, जाने क्यों वो उससे, इस क़दर जल रहा है?

                                                                                                                                             ~अभय

चक्रवात..

Chakrawat
Credit: Google Image

चक्रवात

ये जो तेरी यादों का समंदर है
लगे जैसे कोई बवंडर है
मैं ज्यों ही करता इनपे दृष्टिपात
मन में उठता कोई भीषण चक्रवात
मैं बीच बवंडर के आ जाता हूँ
और क्षत विछत हो जाता हूँ
इसमें चक्रवात का क्या जाता है
वह तो तांडव को ही आता है
अपने हिस्से की तबाही मचा कर
वह जाने कहाँ खो जाता है
मैं तिनका-तिनका जुटाता हूँ
और फिर से खड़ा हो जाता हूँ
पर, तेरी यादों की है इतनी आदत
ए चक्रवात ! तुम्हारा फिर से स्वागत

……अभय…..

 

ख़त

ख़त

बिन तेरे, अब ये घर मुझे
है काटने को दौड़ता
पर फिर भी मैं
अपना पता नहीं बदलता हूँ
कि कहीं किसी दिन
तेरा ख़त, मुझे ढूंढते इसी पते पर न आ जाये
और किसी अजनबी या लटके ताले को देख
हो मायूस, वापस न लौट जाए

~अभय

अब आप कहोगे कि भाई, आजकल ये खत कौन लिखता है. तो आप जानते ही हैं कि मैं क्या कहूँगा, नहीं जानते? अरे मैं कहूँगा कि आप खत को छोड़ मोबाइल नंबर को ही ले लीजिये शायद वही रेलिवेंट लगे 😉

 

खुला पिंजरा

 

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तूने वर्षों तक
पिंजरें में मुझे जो कैद किया
और फिर कहके कि बड़प्पन है “मेरा” 
जाओ तुम्हें आज़ादी दी
और पिंजरे को फिर से खोल दिया

अब जब आदत हो चली इस पिंजरे की
और उड़ना भी मैं भूल गया
तो ये खुला पिंजरा भी क्या कर पायेगा
जो उन्मुक्त नभ में उड़ता था पंक्षी
बस धरा पर रेंगता रह जाएगा

 

………अभय ……..

अनायास ही नहीं..3

मैं फिर से वापस आऊंगा…

मैं कोई बरसाती झरना नहीं जो
कुछ पल बहकर खो जाऊंगा
हिमखंडो सा बना हुआ मैं
अविरल प्यास बुझाऊंगा

मैं कोई सतरंगी इंद्रधनुष नहीं जो
पल भर में ग़ुम हो जाऊंगा
मैं तो वो असीमित गगन हूँ जो
हर पल तुम पर छाऊँगा

मैं तुम्हारी छाया नहीं जो
केवल दिन में ही संग निभाऊंगा
मैं तो वह प्रकाशपुंज हूँ जो
घने अंधकार मिटाऊंगा

मैं कोई बासंती पवन नहीं जो
कुछ क्षण बहकर थम जाऊंगा
मैं तो तेरी साँसे हूँ जो
पलपल जीने का एहसास दिलाऊंगा

मैं वह अनकही गाथा नहीं जो
इतिहास के पन्नो में खो जाऊंगा
वर्षो तक गुमनाम रहूँगा ,
मैं फिर से वापस आऊंगा

…………अभय……….

  1. शीर्षक और कविता में सामंजस्य न ढूंढें, मिलेगी नहीं। Encrypted है ☺️