Reflect, don’t cling.

past
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Our past is nothing but stagnant water. As you grow old, the amount of water gets added to it. More water, then more and more. Still water has a tendency to decay gradually. After some time it smells bad, it stinks. But in the perspective of our past, this analogy may not hold 100% correct as we cherish some of them, if not all. I have seen people and also read some of them when they open up on Word Press that their constant source of misery is their past. Past is a vicious trap (ironically, created by themselves) which they find difficult to come out. Initially they cling on it, later clinging on past becomes their habit and we all know to change habit is mountainous task. As I mentioned earlier, stagnant water stinks after few days. But there is a specialty of still water. We can see our reflection very clear in stationary water, which we will not find in water with motion. Reflection of past is good for progress, clinging on it may not so.

जी लें आज को…

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Sun Dial, Credit: Google

 

जी लें आज को…

 

डूबे हो क्यों अतीत में ,

फिर से आता क्या वो कल है!

हँसना तुम आज में सीख लो

जो है बस यही पल है..

 

कल हुए सफल तो उसका

कब तक तुम जश्न मनाओगे

या किसी बिगड़ी बातों से हो आहात

कब तक अश्क़ बहाओगे

जो बीती सो बात गयी

कब आगे को कदम बढ़ाओगे

आज में , हर-रोज उभरते हैं प्रश्न नए

हर दिन मिलता उनका हल है!

हँसना तुम आज में सीख लो

जो है बस यही पल है..

 

कभी अतीत से निकल भविष्य में

खुद को हम ले जाते

मन मुताबिक सुन्दर सा

सपनों का महल सजाते

पर दिवा स्वपन तो व्यर्थ है होता

न ही मिलता उससे कोई फल है

जो है केवल पुरुषार्थ आज का

होता इसमें ही बल है!

हँसना तुम आज में सीख लो

जो है बस यही पल है..

 

वर्तमान में रह कर ही तो

मंज़िल कइयों ने पायी है

जीवन रूपी इस नैय्या ने

जाने कितने सागर पर लगायी है!

बीते हुए कल को छोड़ो

भविष्य में क्या होगा! इससे मुह मोड़ो

अनुभव करो इस वर्तमान को

पीकर देखो, होता इसका मीठा कितना जल है

हँसना तुम आज में सीख लो

जो है बस यही पल है..

 

………अभय………