मेरा मन..

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  मेरा मन जहाज़ सा,
उड़ने वाला नहीं
तैरने वाला,
पानी का जहाज
और तुम सागर सी,
हिन्द महासागर नहीं
प्रशांत महासागर
अथाह, असीमित, अन्नंत
मन चंचल था मेरा,
तैरता तुममें
कभी शांत
कभी हिचकोले करता हुआ
पर वह अब डूब रहा है
गर्त में, तह तक
जैसे किसी सागर में कोई
जहाज डूबता है,
अस्तित्व को भुला
जैसा कि पहले
कोई, कुछ था ही नहीं
केवल सागर का सन्नाटा
और लहरों के हिचकोले
सिर्फ तुम ही तुम,
मैं स्तब्ध, शुन्य, मौन!





I like sitting silently in any natural setting, contemplating on myriad thoughts. In cities, now there are hardly any pristine locations where one can sit and listen the chirps of the birds and can float in his/her imagination. But, of course, manmade parks come to rescue me at many occasions. If there is no one to disturb, I can sit there, hours and hours mutely. Perhaps, I should say this is my favourite time pass. Someone has rightly said “I am alive because I think and not that I think because I am alive”.

Yesterday, as we all know, was Dewali or Deepawali. The day, when Lord Ram returned to Ayodhya after conquering Ravana and serving exile for fourteen long and tortuous years. I went on to offer my obeisance to one of the temple of Lord Ram.


I spent nearly an hour or hour an half in temple. Then I decided to return. There is a park nearby that temple. On returning, I was up to my favourite task:-). I sat down and enjoyed the songs of the numerous birds and the frantic movements of the squirrels jumping from one tree to the ground and then to another tree.

I was recalling some of my past Diwali celebrations, and then suddenly a person came and sat beside me, which I usually don’t like when I want to be alone. But, that was a public park and in India, if your are having a seat in any public transportation and even if it is occupied to its maximum capacity, still a new person will come and ask you “please adjust” or “Bhai Thoda adjust kar lo”. So his usurpation was legitimate on that account. 🙂

Soon he opened his bag pack and took out three plastic bags from it. Two of the bags were filled with grains and one with sugar. He started to scatter it in specific locations, as I can see there were some earlier remnants of those grains as if he usually do it. He poured some sugar near by the habitats of ants which was adjacent to the bench where I was sitting. Then he started to disperse the grains in the bottom of the trees and then he was leaving the place.

Seeing the generosity of that person towards those animals and birds who can’t speak, cannot demand, cannot assert their share; I asked him “Do you regularly do this generous act?”

His humble answer caught my imagination. He smilingly said “Who am I to do this? What is my capacity? I am in slippers (hawai chappa as he said it)? I am from very humble background. The one, sitting inside that structure (pointing towards temple) does it all, for me and for entire universe.” Before I could have asked any supplementary questions he ran away from the place towards the temple, as if he was in hurry. I remained silent. Even though he went from that place, he left many thoughts in my mind. I am concluding all these in point wise manner:-

  1. There is something about Indian Culture. Since ancient times, people thorough myriad instructions and teaching via scriptures, are told to not to take credit anything done out of generosity and dedicate it to the Lord
  2. If we start taking credit of the act, then it will result in developing ego and ego is one of the root causes of evil.
  3. From the point of views of birds, insects and other species which may have benefitted through the act of that person, in reality they don’t know or will never be able to know about the person who has actually done it. Similarly in our life also, there are many persons which help us but we are not able to recognize their contribution and in turn never able to show our gratitude towards them
  4. Even if the person would not have arranged those stuffs, still those little creatures would have survived. Alternatively we can say that, these species are not dependent on anyone’s generosity. They derive everything necessary for their survival from the Mother Nature, yet the persons act as facilitator. This also has been the teaching of the Bhagavad Gita.
  5. Sometime we may not know the mean, but whatever is required for us to survive is being arranged by someone, somehow, somewhere.
  6. Spirituality makes us humble and humbleness is revered as crown jewel of all qualities.
  7. You don’t have to be a millionaire to serve others and to make this place beautiful, what you all need to have a gentle heart.

That’s it for the day. I hope you had a memorable and safe Diwali this time and if you are in National Capital, then must have abide by the orders of Honourable Supreme Court,  and for those like me, who are not the resident of that part had Diwali as usual 😀


मोरा मन..

घट-घट का पानी हमरे गले उतर आया

सिर पर पड़ी कईयन पेड़ की छाया

पर हमरे समझ ये नहीं आया

काहे तोहरे पर ही आ के, मोरा मन भरमाया   🙂


अनायास ही नहीं..3

मैं फिर से वापस आऊंगा…

मैं कोई बरसाती झरना नहीं जो
कुछ पल बहकर खो जाऊंगा
हिमखंडो सा बना हुआ मैं
अविरल प्यास बुझाऊंगा

मैं कोई सतरंगी इंद्रधनुष नहीं जो
पल भर में ग़ुम हो जाऊंगा
मैं तो वो असीमित गगन हूँ जो
हर पल तुम पर छाऊँगा

मैं तुम्हारी छाया नहीं जो
केवल दिन में ही संग निभाऊंगा
मैं तो वह प्रकाशपुंज हूँ जो
घने अंधकार मिटाऊंगा

मैं कोई बासंती पवन नहीं जो
कुछ क्षण बहकर थम जाऊंगा
मैं तो तेरी साँसे हूँ जो
पलपल जीने का एहसास दिलाऊंगा

मैं वह अनकही गाथा नहीं जो
इतिहास के पन्नो में खो जाऊंगा
वर्षो तक गुमनाम रहूँगा ,
मैं फिर से वापस आऊंगा


  1. शीर्षक और कविता में सामंजस्य न ढूंढें, मिलेगी नहीं। Encrypted है ☺️

कुछ और..

कुछ और..

Credit: Internet

कुछ और नहीं मन में मेरे

बस मिलने को आ जाता हूँ

मत पूछो तेरी यादों में

मैं क्यों घर बसाता हूँ

मिलते ही तेरी आँखों से

आँसू झर-झर बहते हैं

लोग कहे उन्हें पानी,  मुझे वो 

मोती ही लगते हैं

अगणित रातों में जब-जब

नींद तुम्हे न आती हो

मेरी क्या गलती है उसमें, जो तुम

दोषी मुझे बताती हो

माना अपना दूर शहर है

मंज़िल भी नहीं मिलती है

मेरी आँखों में झाँक के देखो

तुमसे वो क्या-क्या कहती है

तिमिर चीरने के खातिर

मैं एक  दीया जलाता हूँ

मत पूछो तेरी यादों मैं

मैं क्यों घर बसाता हूँ


ओ माँ ..

समयाभाववश कविता को उतना लयबद्ध नहीं कर पाया, जितनी मेरी अपेक्षा थी. पर भावनाएं हर क्षण लय में ही हो, यह आवश्यक नहीं. सो मैं इस कविता को यथारूप प्रेषित कर रहा हूँ, पहुँचाना मत भूलिए कि कैसी लगी..

ओ माँ ..

बिन अपराध किये भी जग के
कई आरोप सह जाता हूँ
एक माँ की नज़रें ही है जहाँ
दोषी रहकर भी, हर पल खुद को
मैं निर्दोष पाता हूँ!

बिना शर्त सम्बन्ध की बातें,
कहाँ सुनने को मिलती हैं!
एक सम्बन्ध है इन शर्तों से ऊपर
माँ का स्नेह मुझपर,
हरक्षण झर झर कर बहती है!

जटिल जगत है, कुटिल है दुनियाँ
षड़यंत्र हर पग पर मिलते हैं
माँ की निर्मल सरलता
और स्नेहमयी आशीर्वचन से
हर पग फूल खिलतें हैं


एक गुमनाम कहानी ….. (कविता)

River meet of Alaknanda and Bhagirathi, hereafter it’s known as Ganga. A place, I always want to go.  Credit: Google Image

एक गुमनाम कहानी ….. 

बर्फ सी थी वो जमी
उष्णता पाकर हुई नमी
टिप टिप कर रिसती रही
फिर भी आगे बढ़ती गयी
थी वो कोमल और सरल
चट्टानों ने रोका मगर
रुकी नहीं वो झुकी नहीं
ध्येय पथ से डिगी नहीं
दिशाएं बदली, बदली धाराएं
बन प्रपात चट्टानों से गिरी
पाषाणों को पार करी
अब आयी क्रूर मानव की बारी
ऊँचे ऊँचे बांध बनाये
फिर भी राहें रोक न पाए
धीरे धीरे शक्ति जुटाई
कृत्रिम बांध से मुक्ति पायी
आगे समतल था मैदान
उसको लगा है राह आसान
पर मानव ने फिर रंग दिखाया
उसे दूषित कर उसमें ज़हर मिलाया
बना नहरें धाराएं बाँटी
पड़ी अकेले उसे कोई मिला न साथी
थकी हारी, उसका मन भरमाया
चाल में उसके मंदी आया
गति उसकी इतनी धीमी हो चली
मानों वह बस अभी रुकी या तभी रुकी
नज़रें भी उसकी अब नीचे झुकी
तभी आश्चर्य हुआ
लगा उसे किसी अपने ने छुआ
नज़रें उठायी, उसकी आँखें भर आयी
सामने उसके विशाल सागर पड़ा था
दोनों बाहें फैलये स्वागत को खड़ा था
अपनी लहरों से उसको छूता
जैसे वर्षों से थके पांवो को
अपने हाथों से हो धोता
नदी पल भर न रुकी
अपने वजूद मिटा
सागर में मिली
कौन है सागर कौन नदी है
अब कौन ये जाने
नदी की संघर्ष गाथा को
कौन पहचाने ?

………अभय ……

Like yesterday, today also my routine was same. Early morning rise(4:30 AM), then went for a ride on the same river front. Actually, I enjoy spending time in front of water bodies, be it natural or artificial. If the atmosphere is cloudy and there is gentle breeze around, I can sit for hours there, contemplating.  So this poetry is also an outcome of today’s journey and I felt it very happy while framing it. Hope you will enjoy it.

Today I also observed that, I am becoming way too frequent on writing poems and publishing it here. Framing poem on myriad subjects and to give it a lyric needs time and energy. Since I have my other objective, which incidentally, also demands time and energy :),  so I thought I will be a little sporadic. I recently (4-5 moths) became active here and learnt a lot  and met some really lovely people, some were very like minded. Hoping your support in this Journey.

Do comment and let me know about the poem.


दूसरी तरफ से …(कविता )

दूसरी तरफ से…….

दिल में बोझ लिए मैं
भटका इधर उधर
सोचा, कोई तो मिलेगा,
क्या हाल है मेरा
हूँ क्यों जर्जर पतझर सा
किस अवसाद ने घेरा
बंटेगा दर्द दिल का तो
मन, सुकून पायेगा
इस अनजान सी नगरी में
कौन जाने,
कोई अपना मिल जायेगा

बीते बरसों
कोई मिला न मुझको
पर मिली एक सच्चाई थी
हर किसी के दिल के अंदर
दर्द भरी इक खायी थी
फिर वो क्या किसी कि मदद करते
जो थे अकेले में आहें भरते

तो मैंने सोचा कि
चलो एक काम करते हैं
उनके ही दर्द बांटकर
कुछ अपने नाम करते हैं
यूँ ही चलता रहा फ़साना
कटते रहे दिन
भूल गया मैं कि
अपना कष्ट क्या था
उनके दर्द बाँटने का
अपना ही मज़ा था


अल्हड़ होली

नमस्कार मित्रों!!!

आशा है, आपका फागुन माह उत्साह में बीत रहा होगा. कल वर्डप्रेस से notification आया कि मेरे ब्लॉग पर followers की संख्या 200 के पार पहुँच गयी है, जानकार ख़ुशी हुई. जो सारा खेल दो तीन महीने पहले शुरू हुआ था अब आप सब लोगों द्वारा सराहा जा रहा है. प्रोत्साहन किसे अच्छा नहीं लगता! आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद..आशीष बनाये रखें..

ब्लॉग लिखने का सबसे अच्छा पहलु मुझे यह लगा कि इसकी पहुँच वैसे लोगों तक भी होती है जिन्हें आप पहले से जानते नहीं है और फिर जो response मिलता है, वह unbiased और straight forward होता है. कई बार response मजेदार भी होते हैं. ऐसा ही एक response आपसे साझा करता हूँ. एक ने कहा (नाम नहीं लूंगा, क्योंकि वह भी पढ़ेगा और privacy सबको पसंद है 😛 ) कि ” भाई आपकी कविताओं में विरह का भाव बहुत ज़्यादा रहता है, कभी प्रेम पर भी लिखिए”. मैंने अपने ब्लॉग पर प्रकशित कविताओं के संग्रह को वापस मुड़कर देखा. पाया कि कुछ कवितायेँ जैसे मॉनसून और मैंमैं और तुमविरह गीतधीरज … में यह भाव तो था, पर मुझे यह लगता है कि विरह और प्रेम की कविता को आप अलग करके नहीं देख सकते, क्या देख सकते हैं?

खैर छोड़िये, मैंने उस बंधु को वादा किया था कि मेरी अगली कविता में आपकी मांग को पूरा करने का प्रयास करूँगा, तो आज कि कविता आप सबके समक्ष प्रस्तुत है . होली सप्ताह भर दूर है , सो मैंने सोचा कि उसके परिवेश को ही चुना जाए.. आप सभी पढ़िए और मुझ तक पहुँचाना मत भूलिये कि कैसी लगी….

Credit: Picked from internet 

अल्हड़ होली

रंग जो तुम्हें पसंद हो
मैं वही रंग ले आऊंगा
फिर तुम्हारे गालों पर
धीरे से उसे लगाऊंगा

पेड़ों की पत्तियों से
हरा रंग मिल जाएगी
सूरज में जो छुपी है लाली
वह भी बाहरआएगी
काँटों की परवाह नहीं है
गुलाबी गुलाल समां में छाएगी
और इससे भी जो मन न भरा तो
इंद्रधनुष धरा पर आएगी

यह मत कहना कि इस दफे
नहीं खेलनी होली है
सखियों बीच , बच न सकोगी इस बार तुम
कहीं बड़ी मेरी टोली है
अगर छुपी जो तुम किसी कमरे में तो
थोड़ी अव्यवस्था सह लेना
और हो सके तो एक नए दरवाजे की
पहले से ही व्यवस्था कर लेना :-p

बेहतर यही होगा कि
पहले से ही होली को तैयार रहो
रंग भरी पिचकारी रखो और
मुट्ठी में गुलाल भरो

नोक झोक और तकरार रहेगी
रंग गुलाल उड़ेंगे
प्यार की भी फुहार बहेगी
खेलेंगे हम ऐसी होली
जो वर्षों तक याद रहेगी