अब भी मेरे सपनो में आती हो…

boy
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अब भी मेरे सपनो में आती हो…

हाथ पकड़ती थी वो,

कुछ दूर संग मेरे आती थी

देख न ले दुनिया,

जग से नज़रें चुराती थी

मेरे मन के हर कोने में

आशियाँ बनाती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…


अक़्सर लंबी थी जो राहें लगती,

संग तेरे सिमट जाती थी

जिसकी हर हँसी,

पीहू की याद दिलाती थी

हर सावन की पहली बारिश में,

संग मेरे भीग जाती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…


दिन तो बीते जैसे-तैसे,

पर रात ठहर जाती थी

अनायास ही मन को मेरे,

याद तेरी आती थी

हर पल हर क्षण संग हो मेरे,

एहसास कराती जो

तुम अब भी मेरे सपनो में आती हो…

………..अभय………..

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ढोंग ..

ढोंग

ढोंग करना अच्छा लगता है
तब, जब कि हम
धनवान हों तो, निर्धन का
ज्ञानी हों तो, अज्ञानी का
विनम्र हो, फिर अभिमानी का
होश में हैं, बेहोशी का
मदिरा छुई नहीं, मदहोशी का
राज़ पता हो, फिर ख़ामोशी का
जगे हुए हों, फिर सोने का
हर्षित मन हो, फिर रोने का
हरपल संग हों, पर उन्हें खोने का
भक्त हो ,तो अभक्ति का
कोमल ह्रदय हो, तब सख्ती का
मुखर हो, फिर मौन अभिव्यक्ति का
ढोंग करना अच्छा लगता है
…..अभय……

दीप, अंधकार, प्रकाश और मैं..

नमस्ते मित्रों, कैसे हैं आप लोग? पिछले कुछ समय से समय की व्यस्तता के कारण हिंदी कविताओं का सृजन और उनका प्रेषण नहीं कर पा रहा था. पर सिर्फ समय को दोष दूँ तो कोई ठीक बात नहीं, समय के संग संग मन में भी विचार पनपने चाहिए और खास कर तब जबकि आप कोई पेशेवर कवि न हों.
कई दिनों बाद आज कुछ विचार आया आप तक पहुँचाता हूँ, ज़रा संभालना 🙂

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जो तुम दीप बुझा दोगे अपनी
घोर अँधेरी रातों में
और सोचोगे कि मैं अब संग मौजूद नहीं
तो मैं बता दूँ आपको कि
मैं न तो प्रदीप्त प्रकाश हूँ
न ही खामोश अंधकार कोई
मेरा अस्तित्व न तो
चंद दीयों पर निर्भर करता है
दीये के जलने पर भी मैं हूँ
दीये के बुझने पर भी मैं ही
माना नज़र न आ सकूँ
पर नज़र न आना और अस्तित्व न होना
दोनों एक बात तो नहीं
बोलो, है कि नहीं ?

…….अभय…….

चक्रवात..

Chakrawat
Credit: Google Image

चक्रवात

ये जो तेरी यादों का समंदर है
लगे जैसे कोई बवंडर है
मैं ज्यों ही करता इनपे दृष्टिपात
मन में उठता कोई भीषण चक्रवात
मैं बीच बवंडर के आ जाता हूँ
और क्षत विछत हो जाता हूँ
इसमें चक्रवात का क्या जाता है
वह तो तांडव को ही आता है
अपने हिस्से की तबाही मचा कर
वह जाने कहाँ खो जाता है
मैं तिनका-तिनका जुटाता हूँ
और फिर से खड़ा हो जाता हूँ
पर, तेरी यादों की है इतनी आदत
ए चक्रवात ! तुम्हारा फिर से स्वागत

……अभय…..

 

अपनी राह../ My Way

Shubho Bijoya…

Today, I came up with one of my old poem along with its English Version. Though preferentially I desist from posting in English, as earlier I have told you, I lack lyrical sense in English which is a quintessential part of poetry. Still, I have tried this one for those who are not able to understand Hindi. 🙂 Let me know that does it make sense..

 

अपनी राह..

राहों को अपनी, मैं खुद ढूंढ लूंगा
बन पथप्रदर्शक तुम, मुझे न उलझाओ||

मेरे उम्मीदों को अब, पर जो लगें है
अपनी आसक्तियों की, न जाल बिछाओ||

कष्टों का पहाड़ सीधे सिर पर सहा है
राह के रोड़ों से तुम, मुझे न डराओ||

सच है जो कड़वा, मैंने खुद चख लिया है
उसपर झूठ की मीठी तुम, परत न चढ़ाओ||

मंज़िल है मुश्किल औ’ लंबा सफर है
जो बीच में हो जाना, शुरू से साथ न आओ||

ज्ञान की दीपक अब जो जली है
अपने आंसुओं से उसे न बुझाओ||

जाना जहाँ है, राहों में कांटे बिछे हैं||
मेरे लिए अभी फूलों की हार न लाओ||

निराश लोगों की लम्बी पंगत लगी है
सांत्वना भरे गीत तुम, उन्हें ही सुनाओ||

नम्रता में मैंने जीवन है जीया
मेरे खुद पे भरोसे को, मेरा अहम् न बताओ||

………..अभय…………

 

My Way

I will carve out my own way

Don’t pretend to be my guide and confuse me

 

My aspirations have found its wings

Don’t entrap it by your frail attachment

 

I have already faced mountainous hardships

Don’t scare me, with the petty pebbles of the road

 

I have already tasted the bitter truth

Don’t present it to me by coating sugar on it

 

All my ignorance is burning in the bonfire of Knowledge

Don’t extinguish it with your incessant tears

 

Destination is distant and path is treacherous

Don’t accompany me, if you are thinking of leaving in midway

 

There seems to be a long queue of despondent

Don’t console me, go and cheer them up

 

I have spent my whole life in humility

Don’t term my self-belief, as an act of arrogance

@Ab

 

 

 

 

जाने क्यों ?

जाने क्यों ?

 

तुम दीपक की लौ सी सुलगती हो

जाने क्यों

मैं मोम सा पिघलता हूँ!

 

तुम बारिश में मचलती हो

जाने क्यों

मैं हर दो कदम पर फिसलता हूँ!

 

तुम बिजली सी चमकती हो

जाने क्यों

मैं तड़ित चालक बनता हूँ!

 

तुम बिन कहे सब कह जाती हो

जाने क्यों

मैं चीखकर भी मौन रहता हूँ!

 

…….अभय……

 

शब्द सहयोग:

तड़ित चालक: Lightening arrester; its used as a tool which  arrest or capture lightening yet doesn’t store it, rather let it pass through itself in to the ground. Now use it in context of the poem, do you find any relevance 🙂

पढ़ने के लिए शुक्रिया….

पर्यावरण संरक्षण

pb

On 5th June, World Environment Day is celebrated all across the globe. On this day I am republishing one of my poem,  which is dedicated to this theme . Hope you would like it.

पर्यावरण संरक्षण

सड़के हो रही हैं चौड़ी
पेड़ काटे जा रहे!
बांध बनाकर नदियों के
अविरल प्रवाह हैं रोके जा रहे!

ध्रुवों से बर्फ है पिघल रहा
समुद्रों का जल भी है बढ़ रहा ,
कहीं तपिश की मार से,
पूरा शहर उबल रहा!

कहीं पे बाढ़ आती है
कहीं सुखाड़ हो जाती है,
तो कहीं चक्रवात आने से
कई नगरें बर्बाद हो जाती है

कहीं ओलावृष्टि हो जाती है
तो कहीं चट्टानें खिसक जाती है
प्रकृति का यूं शोषण करने से,
नाज़ुक तारतम्य खो जाती है

है देर अब बहुत हो चुकी
कई प्रजातियां पृथ्वी ने खो चुकी
सबका दोषी मानव ही कहलायेगा,
पर्यावरण संरक्षण करने को जो
अब भी वो कोई ठोस कदम नहीं उठाएगा!

………….अभय ………….