ओह! ये प्रश्न!!!

ओह! ये प्रश्न!!!

मैं चुप हूँ
इसलिए नहीं कि
पूछने को पास मेरे
कोई सवाल नहीं है
सोचता हूँ
अगर कहीं जो
सवाल कोई मैं पूछ गया
तो तुम
जवाब कहाँ से लाओगे?
मनगढंत उत्तर के सघन वन में
कहीं तुम लापता तो न हो जाओगे
या किसी बहरूपिये का भेष धरकर
मेरे सामने आओगे
फिर मेरी नज़रों से खुद को
न छुपा पाओगे
और निरुत्तर हो जाओगे
पर निरुत्तर तुम्हे देखकर
शर्मिंदगी मुझे होगी
कि जानकर भी
ये प्रश्न मैंने क्यों पूछा
बेहतर यही होगा कि
मैं, मेरे मन के
सवाल की स्याही को
सूख ही जाने देता हूँ
कि सुना है, समय की कोख में
कई प्रश्नो के उत्तर
स्वतः जन्म लेते हैं

…….अभय…..

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