मेघा फिर से आएगा

तुम किसी तेज नदी सी
मैं मिट्टी का, दोनों किनारा
चिर अन्नंत से हो मानो जैसे
मैंने दो बाहें पसारा
तुम तीव्र , प्रवाहमान
कल-कल ध्वनि से गुंजमान
मैं मूक, गुमनाम!
तुम तेज बहती गयी
मैं तेजी से कटता गया!
कण कण मेरा तुममे
घुलता गया , मिलता गया
ये कहानी तबकी जब की
सब कुछ हरा भरा था
पर अब रूखा-सूखा है
तुम संकरी हो चली
किनारों से दूर कहीं खो चली
सब हैं कहते हैं कि
सागर से ही, तुम्हारा वास्ता है
मेरी उपस्थिति तो किंचित, एक रास्ता है
पर मैं अटल हूँ, आश्वस्त हूँ
कि तुम फिर से आओगी
फिर मुझे छू जाओगी
कि मेघा भी तो फिर से आएगा

…….अभय …….

Oh, I love rivers. Sitting on the banks of it, is my favorite task. I have also talked about my this hobby in some of my previous posts. Many of my poetry has taken its shape on these places. Sharing a latest one.

हिंदी साहित्य की जिस विधा का मैंने अतिसय प्रयोग इस कविता में किया हैं, उसे मानवीय अलंकार कहते है. आशा हैं आप तक सही शालमत पहुँचेगी.

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Clouds defeat Sun

Weather dramatically changed today here in my city and I was quick to cash it. Dark clouds surrounded the city and we felt quite relieved from the scorching heat. I was up to my favorite task, rode my bike for a long drive.

Nature displayed its different shades, I tried to captured few of those.

Feel it!

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Overcast

Yesterday night we had a heavy Pre-Monsoon shower, here in my city. Morning too was cool and overcast, something which I love. I planed a ride in my city along with one of my friend and clicked some images of nature all along my journey.  All the photos were clicked by my phone camera. Hope you would also enjoy it.

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Sun overshadowed by the Cloud

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A brick kiln on the opposite side of a river

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An Ephemeral river, preoccupied by algae, waiting for rain to become pure

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Water Buffalo, going for a swim

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A park

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This road is made up of waste plastic, Isn’t it a good idea?

एक गुमनाम कहानी ….. (कविता)

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River meet of Alaknanda and Bhagirathi, hereafter it’s known as Ganga. A place, I always want to go.  Credit: Google Image

एक गुमनाम कहानी ….. 

बर्फ सी थी वो जमी
उष्णता पाकर हुई नमी
टिप टिप कर रिसती रही
फिर भी आगे बढ़ती गयी
थी वो कोमल और सरल
चट्टानों ने रोका मगर
रुकी नहीं वो झुकी नहीं
ध्येय पथ से डिगी नहीं
दिशाएं बदली, बदली धाराएं
बन प्रपात चट्टानों से गिरी
पाषाणों को पार करी
अब आयी क्रूर मानव की बारी
ऊँचे ऊँचे बांध बनाये
फिर भी राहें रोक न पाए
धीरे धीरे शक्ति जुटाई
कृत्रिम बांध से मुक्ति पायी
आगे समतल था मैदान
उसको लगा है राह आसान
पर मानव ने फिर रंग दिखाया
उसे दूषित कर उसमें ज़हर मिलाया
बना नहरें धाराएं बाँटी
पड़ी अकेले उसे कोई मिला न साथी
थकी हारी, उसका मन भरमाया
चाल में उसके मंदी आया
गति उसकी इतनी धीमी हो चली
मानों वह बस अभी रुकी या तभी रुकी
नज़रें भी उसकी अब नीचे झुकी
तभी आश्चर्य हुआ
लगा उसे किसी अपने ने छुआ
नज़रें उठायी, उसकी आँखें भर आयी
सामने उसके विशाल सागर पड़ा था
दोनों बाहें फैलये स्वागत को खड़ा था
अपनी लहरों से उसको छूता
जैसे वर्षों से थके पांवो को
अपने हाथों से हो धोता
नदी पल भर न रुकी
अपने वजूद मिटा
सागर में मिली
कौन है सागर कौन नदी है
अब कौन ये जाने
नदी की संघर्ष गाथा को
कौन पहचाने ?

………अभय ……

Like yesterday, today also my routine was same. Early morning rise(4:30 AM), then went for a ride on the same river front. Actually, I enjoy spending time in front of water bodies, be it natural or artificial. If the atmosphere is cloudy and there is gentle breeze around, I can sit for hours there, contemplating.  So this poetry is also an outcome of today’s journey and I felt it very happy while framing it. Hope you will enjoy it.

Today I also observed that, I am becoming way too frequent on writing poems and publishing it here. Framing poem on myriad subjects and to give it a lyric needs time and energy. Since I have my other objective, which incidentally, also demands time and energy :),  so I thought I will be a little sporadic. I recently (4-5 moths) became active here and learnt a lot  and met some really lovely people, some were very like minded. Hoping your support in this Journey.

Do comment and let me know about the poem.