मेघा फिर से आएगा

तुम किसी तेज नदी सी
मैं मिट्टी का, दोनों किनारा
चिर अन्नंत से हो मानो जैसे
मैंने दो बाहें पसारा
तुम तीव्र , प्रवाहमान
कल-कल ध्वनि से गुंजमान
मैं मूक, गुमनाम!
तुम तेज बहती गयी
मैं तेजी से कटता गया!
कण कण मेरा तुममे
घुलता गया , मिलता गया
ये कहानी तबकी जब की
सब कुछ हरा भरा था
पर अब रूखा-सूखा है
तुम संकरी हो चली
किनारों से दूर कहीं खो चली
सब हैं कहते हैं कि
सागर से ही, तुम्हारा वास्ता है
मेरी उपस्थिति तो किंचित, एक रास्ता है
पर मैं अटल हूँ, आश्वस्त हूँ
कि तुम फिर से आओगी
फिर मुझे छू जाओगी
कि मेघा भी तो फिर से आएगा

…….अभय …….

Oh, I love rivers. Sitting on the banks of it, is my favorite task. I have also talked about my this hobby in some of my previous posts. Many of my poetry has taken its shape on these places. Sharing a latest one.

हिंदी साहित्य की जिस विधा का मैंने अतिसय प्रयोग इस कविता में किया हैं, उसे मानवीय अलंकार कहते है. आशा हैं आप तक सही शालमत पहुँचेगी.

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विदाई

Photo Courtesy: pinimg.com

सुनो कि अब तुम हो नहीं कि
घर का हर कोना सूना है
सब उत्सव जीवन से गए कि
अब बस, मन ही मन रोना है

~अभय

Recently attended a marriage ceremony. I was from the bride side. Despite having tremendous work load, I saw the hollowness in the father’s heart and his feeling towards his only daughter. To portray that feeling in words is difficult especially if you haven’t gone through it. I wrote just four lines, hope you would like it!

अँधेरा दिन

हुए दूर हम जब से तब से
खोया मेरा सवेरा है
रातें अँधेरी होती सबकी
यहाँ दिन भी हुआ अँधेरा है

आलम यह है कि
बेचैन हूँ मैं,
पर किसी से कह नहीं रहा
यादों का महल
जर्जर हो चला है
पर अब भी यह, ढह नहीं रहा

पलकों तले सैलाब समेटे
हँसते चले जाते हैं
रास्ता नया आता है
मंज़िल वहीं रह जाती है
………अभय ……..

मैं और मेरी नाव

शुक्रवार की रात से अगर कुछ अच्छा हो सकता है तो वो है शनिवार का दिन, psychologically थोड़ा सुकून रहता है कि चलो एक और दिन तो बचे हैं छुट्टी के. आज सवेरे बाइक लेकर मॉर्निंग वॉक पर निकला :-P. जैसा कि मैंने पहले भी शायद किसी लेख में लिखा है कि मुझे नदी किनारे अपने शहर की मरीन ड्राइव पर, जो शायद 10-12 किलोमीटर लम्बी होगी, सुबह सुबह गाड़ी चलाने में मज़ा आता हैं. उसी मरीन ड्राइव पर एक स्थान ऐसा भी हैं जहाँ दो नदियाँ मिलती हैं. वहां बैठने का प्रबंध भी हैं. मैं अक्सर वहां जाता हूँ तो कुछ देर रुकता हूँ. आज भी रुका.

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I was discussing about the same place, It is known as “Domuhani“, meaning two mouthed. A term to refer meeting of the two rivers. Clicked it few months back.

वातावरण, जो दिन में आज-कल काफी गर्म हो जाता हैं, सुबह में काफी सुहावना सा हो रहा था. कोयल उसमें मिठास घोल रही थी. कल रात की तेज बारिश और तूफ़ान के बाद आम के पेड़ से काफी मंजर नीचे गिरे हुए थे, पर उनकी अलग से खुसबू अब तक आ रही थी, एक पका हुआ बेल भी गिरा हुआ था, मैं उठाने जा ही रहा था कि एक अधेड़ उम्र की माता जी ने उस पर दूर से ही चिल्लाकर कब्ज़ा जमा लिया, मैंने उठाकर उनको दे दिया और बोला कि मैं आप ही के लिए उठा रहा था 😛 😛 …..वो भी मेरे परोपकार को  समझ रही थी . उन्होंने मुस्कुरा के कहा चलो रहने दो , मैंने भी अपनी दांत दिखा दी.
उसके बाद कुछ देर बैठा, तो कुछ विचार निकले…फ़ोन पर ही ड्रॉफ्ट कर लिया. थोड़ी संसोधन के पश्चात आपके सामने प्रस्तुत है…अपने मनोभाव को मुझ तक पहुँचाना मत भूलियेगा

Boat
Google se uthaya

मैं और मेरी नाव 

मैं नदी के इस किनारे
तुम बैठी थी उस पार
बारिश का मौसम
बाढ़ थी आयी
नदी हुई विकराल
पर मुझे तो था आना
कैसे भी तेरे पास
तैरकर जाना मुश्किल था
नदी में प्रचंड बहाव था
सोचा एक नाव बनाते हैं
सहारे नाव के
तेरे पास हो आते हैं
लग गया नौका बनाने में
सुध नहीं रही ज़माने की
ऐसा व्यस्त हुआ कि
मौसम तक बदल गया
बारिश बीत गयी
ग्रीष्म चरम पर आ गयी
नदी बरसाती थी
तलछटी तक वो सूख गयी
आज मेरी नौका तैयार है
विडंबना ऐसी कि
नदी में जल नहीं है
न ही तुम खड़ी हो उस किनारे पर
मैं हूँ और संग मेरे, मेरी नाव ….

…………..अभय ……………

मंजिल

मंजिल  

अकेले ही तुम निकल पड़े ,
कितनी दूर , कहाँ तक जाओगे ?
बैठोगे ज्यों किसी बरगद की छावों  में
मुझे याद कर जाओगे

मैं तेज नहीं चल सकती
मेरी कुछ मजबूरियां हैं
और यह भी सच है, जो मैं सह न सकुंगी
तेरे मेरे दरमियाँ, ये जो दूरिया हैं

कुछ पल ठहरते
तो मेरा भी साथ होता
सुनसान राहों में किसी अपने का
हाथों में हाथ होता

कोई शक नहीं तुम चल अकेले
अपनी मंज़िल को पाओगे
पर देख मुझे जो मुस्कान लबों पे तेरे आती थी
क्या उसे दुहरा पाओगे ?

…….अभय ……..

सुनहरा धागा …

आज विश्व काव्य दिवस है, मतलब #World Poetry Day. आप सभी को बधाई. आज मेरी लिखी कुछ पंक्तियाँ आपके समक्ष …..धागे को विश्वास या भरोसे से बदल कर देखिये और इस कविता में इसकी सटीकता को ढूंढिए  …

 

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Background Image Credit: Google Image.

बसंत

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Image Credit: Dinesh Kumawat

बसंत

आज मेरे आँगन में
आम के पेड़ पर मंजर आया है
जाने वो मंज़र कब आएगा
जब तुम मेरे आँगन में आओगे !

उसी पेड़ की किसी शाख पे बैठे,
कोयल ने राग भैरवी गाया है
जाने तुम कब आकर आँगन में
राग बासंती गाओगे!

मंज़र की ख़ुशबू में
शमा पूरी तरह है डूबा
जाने कब तेरी महक
घर आँगन में छाएगा
वह मंज़र कब आएगा !

सूरज ढली, चाँद शिखर पर आयी
विचलित हुई, तुम्हें आवाज़ लगायी
पदचाप सुनी, भागी चली आयी
पर अब भी आंगन सूना है!!!
वह मंज़र कब आएगा
जब तुम आँगन में आओगे!