माँ ..

कोई विश्व विजय को जाता है पर सब कुछ हार वो आता है संचित सारा धन खो जाता है वर्षों का ज्ञान व्यर्थ नज़र आता है सम्मान धरा पर सोता है पुरुषार्थ प्रश्न में होता है अपने मुख से भी वो डरता है न वो जीता है न मरता है बस एक आश्रय अब बच …

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द्वंद्व

धूप शीतल छाँव तप्त जिसे वर मिला था वही अभिशप्त जो दृढ खड़ा था संदेह में है अकर्मण्यता से नेह में है जो पथप्रदर्शक था पथभ्रष्ट है वो शिथिलता से आकृष्ट है जो नित्य स्वरूप का उसे कोई तो स्मरण कराये इस हनुमान को कोई जामवंत तक ले जाये .........अभय ........

मुट्ठी भर रेत

मुट्ठी भर रेत शीशे के पात्र में संचित रेत तुम्हारा जो रखा था वह धीरे धीरे बह रहा कुछ-कुछ तुमसे शायद वो कह रहा क्या तुम भी उसे सुन रहे ? इस शीशे के पात्र का आकार अलग हो सकता है इसमें संचित रेत की मात्रा भी असमान हो सकती है क्या तुम्हें अपने बचे …

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