This world is nothing but full of duality. The phone which I had bought two years back gave me immense happiness at that time, but now it doesn’t give me the same pleasure because it’s not up to the standards which are prevalent in the market. “Remember the phone is same”. The ecstasy which one may have when being in certain kind of relationships with someone, may turn into a constant source of agony when it falters. “Remember the source of pleasure and pain is the same person.” The moon, the rain, the flowers or any other aspects of nature can make someone fall in love, but for someone who may have separated from his/her love, the same moon, same rain, same flower seems like forest fire.  The water is same everywhere with same Chemical Formula H2O. Parched land of deserts and people living there desperately hankers for it, but the same water has created much havoc in God’s Own Country. “Remember water is same”. In Sanskrit, there is very popular section of verse “Sa Vidya ya Vimuktaye” meaning knowledge is one that liberates. But many a times the knowledge becomes the source of bondage.


Day-Night, Happiness-Sorrow, Cold-Hot, Weak-Strong, Love-Hate, Victory-Defeat, Birth-Death……… Oh the list of duality in this creation is endless. I may not be able to list it down all and frankly speaking it will not be of great use. Through analogy we can easily relate this. What is important, in my view, is to understand this deeply because understanding this nature of the world in quintessential to live peacefully.

Just before the War of Mahabharata, Arjuna was in complete delusion about his action. He pleaded Lord Krishna to enlighten him with transcendental knowledge. Then a song, or Geet in Sanskrit, came in to existence, which later became popularized as Bhagvad Gita. In second chapter of this book, this dualism is discussed in details by Krishna to make Arjuna aware of his duties. Out of many instructions…one goes as…..

“Do thou fight for the sake of fighting, without considering happiness or distress, loss or gain, victory or defeat…….”

Everyone of us is fighting our own battle in our own capacities…Understanding the plot is helps a lot.


Reflect, don’t cling.

Credit: Google Image

Our past is nothing but stagnant water. As you grow old, the amount of water gets added to it. More water, then more and more. Still water has a tendency to decay gradually. After some time it smells bad, it stinks. But in the perspective of our past, this analogy may not hold 100% correct as we cherish some of them, if not all. I have seen people and also read some of them when they open up on Word Press that their constant source of misery is their past. Past is a vicious trap (ironically, created by themselves) which they find difficult to come out. Initially they cling on it, later clinging on past becomes their habit and we all know to change habit is mountainous task. As I mentioned earlier, stagnant water stinks after few days. But there is a specialty of still water. We can see our reflection very clear in stationary water, which we will not find in water with motion. Reflection of past is good for progress, clinging on it may not so.

जाल ..

“मानव ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ रचना है” एक वक्ता को जैसे ही मैंने कहते हुए सुना, मन में सैकड़ो ख्याल सरपट दौड़ने लगे. अब क्या कहूँ, कोई योगी तो हूँ नहीं कि एक बार में एक ही ख्याल से मनोरंजन कर सकूँ या विचारशून्यता की सतत स्थिति में रहकर परम आनंद का अनुभव ले सकूँ! हाँ भाई, विचार शून्यता भी आनन्द है..कभी खुद अनुभव नहीं किया तो उनसे पूछिये जो विचारों के अनंत प्रहार से सतत छत-विछत होते रहते हैं और सोचते हैं कि मन में कोई विचार न आता तो श्रेयस्कर रहता..

Embed from Getty Images

खैर, वापस विषय वास्तु पर आते हैं “मानव ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ रचना है”. क्यों भाई? यदि कुत्ते आपस में बात कर रहे होते तो वे भी यह कह सकते थे “कुत्ते, ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ रचना है”!!! या फिर गधे!!! या शेर !!!

पर मनुष्य उनकी बातों पर विश्वास नहीं कर पाते. क्यों? कारण स्पष्ट है. मानव अपने विचारों का उपयोग करके जितने भी जीव हैं उन सब पर नियंत्रण कर सकता है. अपना प्रभुत्व जमा सकता है. अपने बुने हुए जाल में अन्य सभी जीवों को फ़ांस सकता हैं. अन्य जीव ऐसा नहीं कर सकते. क्या कभी सुना हैं कि मनुष्य मछली के जाल में फँस गया!!! हा!!! लोग पागल ही कहेंगे, यदि आपने अपने मन में ऐसा विचार भी लाया तो!!!

तो फिर मनुष्य महान क्यों ? और अधिक गहन चिंतन करने पर मेरे मन में यह विचार कौंधा. ब्लॉग पर विचार व्यक्त करने कि आजादी होती है, चाहे विचार कैसा भी हो, जो दूसरों को आहत न करे. और भारतीय संविधान के आर्टिकल 19(2) के तहत यह मेरा मौलिक अधिकार भी है. अब आप सम्भालिये इसे..

मनुष्य महान इसलिए कि यह वह जाल बुन सकता है, उस जाल कि विशेषता यह है कि अगर अन्य प्राणी जाल बनाते तो उसका उपयोग वह दूसरे प्रजाति को फांसने में लगाते. पर मनुष्य तो श्रेष्ठ जीव हैं, तो कुछ अलग तो बनता है. मनुष्य श्रेष्ठ इसलिए कि वह आपने बनाये जाल में खुद ही फँस सकता है और अक्सर ही फँसता हैं, खुद ही फँसकर उसमे तड़पता है, छटपटाता है, और जब कष्ट असह्य हो जाता है, तो वह पुनः मुक्ति का मार्ग ढूँढता है….

खुद ही जाल बुनो, उसमें फँसो और फिर मुक्ति का मार्ग ढूंढो…यह चक्र मजेदार है न??

चलिए अभी जाते-जाते संस्कृत की एक उक्ति आपके लिए छोड़ जाता हूँ.. ज्यादा चिंतन मत कीजिये.. क्योंकि अत्यधिक चिंतन भी एक जाल हैं

सा विद्या या विमुक्तये।
ज्ञान वह है जो मुक्त कर दे!!

एक और दिसंबर बीत गया..

Sun Rise or Sun Set? Clicked it in Pondicherry, Bay of Bengal

एक और दिसंबर बीत गया

अभी तो सूरज निकला ही था
और झट में फिर वो डूब गया
एक और दिसंबर बीत गया

अभी बसंत की हुई थी दस्तक
पर अब, पत्ता पत्ता सूख गया
एक और दिसंबर बीत गया

जनवरी में कई कस्में खायी थी हमने
पर अगणित बार वो टूट गया
एक और दिसंबर बीत गया

लाख कोशिशें कर उन्हें मनाया था हमने
पर एक नादानी से वो, हरपल के लिए रूठ गया
एक और दिसंबर बीत गया

हार की कई गाथाएं लिख दी इसने
पर आशाओं के कई पन्नों को भी जोड़ गया
एक और दिसंबर बीत गया

सोचा शाश्वत सा यह पल है
पर बारह किश्तों में ही पीछा छूट गया
एक और दिसंबर बीत गया

स्मृति पटल पर कुछ धुंधले चेहरे
और कई नई छवि को जोड़ गया
एक और दिसंबर बीत गया

स्थिरता मरण, गति जीवन है
शायद से वो, चीख-चीख कर बोल गया
एक और दिसंबर बीत गया

………अभय ………