Understanding and Misunderstanding

Don’t make any close relationship without complete understanding

and

Don’t break close relationship with small misunderstanding

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सूक्ति (Beautiful Thought)

Sanskrit is world’s oldest language. They say “Old is Gold”. But the decline in Sanskrit suggests that we have not valued the Gold. There may be many reasons of its decline. One of the foremost reason was that we remained under the control of foreign rulers for way too long period (nearly 1000 years, isn’t it a very long period ?). Whenever any foreign power reins its subject, their first attack is on the cultural aspects of their occupation and to promote their own culture to the natives.

Anyway I am not going in to the details of the apathy of Sanskrit, because reflection in past never fetches any substantial gain but the present action can, however past can be a chaperone.

Today I am starting a new series in my blog, named “सूक्ति/ Beautiful Thought”

“सू+उक्ति; सू =अच्छा, सुन्दर ; उक्ति = विचार “.

It will consist texts, verses, thoughts, quotes, anecdotes etc. from Sanskrit language with its translation. I will try to write those episodes which will be relevant to our day to day life. The source of my quote will be multiple. Texts may be from Srimad Bhagavad Gita, Bhagwat Puran, Vedas, Upanishad, Quotes from various personalities such as Chanakya.

My purpose is that through this small initiative readers will feel proud about our great heritage and can develop some interest in knowing them. India was known as “Golden Bird” at the time, when Sanskrit was rife. I am not saying that there is some connection between it, but I also believe that it can not be a mere coincident.

Here is the first one ..

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संस्कृत दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है. लोग कहते हैं “ओल्ड इस गोल्ड “. लेकिन संस्कृत में गिरावट से पता चलता है कि हमने “गोल्ड” को महत्व नहीं दिया है. इसकी गिरावट के कई कारण हो सकते हैं. सबसे महत्वपूर्ण कारण यह था कि हम विदेशी शासकों के नियंत्रण में बहुत लंबे समय तक रहे (लगभग 1000 साल, क्या यह बहुत लंबी अवधि नहीं है?)। जब भी किसी भी विदेशी शक्ति ने अपने अधीन पर शाशन करती है तो उनका पहला हमला अधीन के सांस्कृतिक पहलुओं को नाश्ता करना और अपने सांस्कृतिक पहलुओं को उनपर थोपना होता है.

फिर भी मैं संस्कृत की उदासीनता का ब्यौरा में नहीं देने जा रहा हूं, क्योंकि सिर्फ अतीत झाँकने से किसी भी महत्वपूर्ण लक्ष्य की पूर्ति नहीं करता है, लेकिन वर्तमान में काम करने से यह प्राप्त किया जा सकता है, हालांकि अतीत एक सीख का काम कर सकती है

आज मैं अपने ब्लॉग में एक नई श्रृंखला शुरू कर रहा हूं, जिसका नाम रखा है “सूक्ति ” . इसमें संस्कृत भाषा से पाठ, छंद, विचार, उद्धरण, उपाख्यानों आदि शामिल होंगे। मैं उन लेखों को लिखने का प्रयास करूंगा जो हमारे दिन-प्रतिदिन जीवन के लिए प्रासंगिक होंगे। मेरे उद्धरण का स्रोत एकाधिक होगा. ग्रंथों में श्रीमद् भगवद गीता, भागवत पुराण, वेद, उपनिषद, चाणक्य जैसे विभिन्न व्यक्तित्वों से उद्धरण भी हो सकते हैं।

मेरा उद्देश्य यह है कि इस छोटी सी पहल के माध्यम से पाठकों को हमारी महान विरासत के बारे में पढ़कर गर्व महसूस होगा और उन्हें जानने में कुछ रुचि पैदा हो होगी। भारत को “सोने की चिड़िया” कहा जाता था, जब संस्कृत व्यापक थी। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इसके बीच कुछ संबंध हैं, लेकिन मेरा यह भी मानना है कि यह एक संयोगमात्र नहीं हो सकता।