पैदल ही चल दूंगा…

बिन विवशता के पक्षी

अपना नीड़ छोड़ता  है क्या ?

अपनों खेत खलिहानो से

मुँह  मोड़ता  है  क्या ?

मैंने  भी  घर  छोड़ा  था

स्वजनों के जीवन बचाने को

दो वक़्त की रोटी कमाने को

अविरल अश्रुधार पोछ जाने को

देश नहीं मैंने छोड़ा,

पर गांव ने परदेशी बोला

शहरो ने न कभी मुझको अपनाया

दूर कहीं झुग्गियों में मुझे फेंका आया

बिन  शिकायत  के  मैं

उनके फरमानों को सुनता, सहता रहा

नारकीय  दृश्य  देख  कर  भी

आँखों  को  मूँदता  रहा

अब आज  महामारी  आयी  है

जब  पूरी  दुनिया  में  छायी  है

शाषन तंत्र  का  नग्न  चेहरा

सबके  सम्मुख  आयी  है

विदेशों   से  प्रवासी

विमानों  से  लाये  जायेंगे

अपने देश में ही अपनों के हाथों

हम  ही  सताए  जायेंगे

हमें  सड़कों पर चलता देख

कुछ की  नींद  खुली  है

नींद  इसलिए  नहीं  खुली  कि

वो  संवेदनशील  हो  चले  हैं

इसलिए  खुली  कि  लॉक डाउन  में

सो-सो  कर  थक  चुके  हैं

उन्हें  एंटरटेनमेंट  चाहिए

मीम   का  कंटेंट  चाहिए

गावों  में  अपने  ही  लोग

संदेह  कि  दृष्टि  से  देखंगे

पुलिस  राहों  में

लाठियां  बरसायेंगे

लम्बा  सफर  है ,

तय  कर  ही  लूंगा

कि मेरे पाँवों  में

संघर्ष  का  बल  है

पर  तुम  चुनाव  में

नज़रें  तो  मिलाओगे  फिर  से

कि तेरी  आँखों  में

कहाँ  शर्म  का  जल  है ?

…….अभय…….

18 thoughts on “पैदल ही चल दूंगा…”

  1. Abhay, you have brought out the human suffering so beautifully. My heart really goes out to those migrant workers, who have all of a sudden become unwanted. It is not about the politicians, we know them all. The saddest part is that it is the normal populace, who used to depend upon their services and have abandoned them, showcasing their pusillanimous character.

    Liked by 3 people

    1. Thanks so much! I am just puzzled and perplexed to see and understand the term called “marginalisation”. No better example than the prevailing situation. The corner stone and source of authority of the constitution “We, the people” has lost somewhere.

      Liked by 2 people

  2. It is sad to see that when decisions are taken everybody’s views and suffering is not taken into account and hence not planned. The poor is always left on the roads high and dry out of his home whenever a calamity strikes… You have brought out the emotions strikingly in your poem.

    Liked by 2 people

  3. हृदयस्पर्शी रचना।🙏🙏

    आपदा भारी,मजबूर सभी,
    बेबस कौन?ये सवाल ना पूछो,
    लाचारी सर्वत्र है फिर भी,
    मजदूरों के हालात ना पूछो।
    मशीन एक लोहे की,
    दूजा हाड़-मांस का,
    संकट में वतन,
    मशीनों के जज्बात क्या,
    ताले जड़े कर्मस्थल पर,अल्लाह कहाँ दातार ना पूछो,
    लाचारी सर्वत्र है,मजदूरों के हालात ना पूछो।

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      1. सुरक्षित हूँ और अपने पराए सभी के जीवन की प्रार्थना करता हूँ। आप भी घर पर ही रहिये।

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  4. सच मे इस महामारी और लॉकडाउन के चलते स्थिति तो यही है, लेकिन ये लॉकडाउन ही एकमात्र उपाय है कम्यूनिटी स्प्रेड को रोकने के लिए । ये वायरस तो ऐसा दुश्मन बना है इंसानियत का कि जो दिखाई भी नहीं देता, कुछ समझ नहीं आता किसे लगा है किसे नहीं…

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    1. बिल्कुल सही कहा, पर गरीबों के लिए दोहरी मार है। स्थिति यह है कि कोरोना से बचें या भुखमरी से, दोनों के बीच चुनाव करना पर रहा है

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