कभी कभी तो…

कभी कभी तो आँखों से

अश्रुधार अनवरत बह जाने दो

क्या पता कि अतीत के

कई दर्द भी उनमें धुल जाये

.

कभी कभी तो खुद की नौका

उफनते सिंधु में उतर जाने दो

क्या पता कि लहरों से टकराकर

उस पार किनारा मिल जाये

.

कभी कभी किसी मरुभूमि को

अकारण ही जल से सींचो

क्या पता कि कोई सूखा पौधा

फिर से पल्लवित हो जाये

.

कभी कभी अनायास ही

अन्यायी से सीधे टकराओ

क्या पता कि कई मुरझाया चेहरा

एक बार फिर से मुस्कुरा जाये

.

कभी कभी तो खुद से ज़्यादा

नियति पर भरोसा रखकर देखो

क्या पता कि सब संदेह तुम्हारा

क्षणभर में क्षीण हो जाये

.

कभी कभी तो संभावनाओं को

विश्वास से भी बढ़ कर तौलो

क्या पता कि आशाओं की चिंगारी

इतिहास नया कोई लिख जाये

.

कभी कभी तो ईश चरण में

शीश झुकाकर के  देखो

क्या पता फिर और कहीं

मस्तक तुमसे न झुकाया जाये

…..अभय…..

It took me some days to finally compose this poem. Hope you will like it.विशुद्ध हिंदी के पाठकों से विशेषअनुरोध है कि अपनी राय से जरूर अवगत कराएं.🙂

41 thoughts on “कभी कभी तो…”

  1. I loved the poem but just wanted to bring to your notice a typo in the 2nd line of last para….. the 2nd word. The poem is very motivating and touching.

    Liked by 9 people

    1. Yeah..Thanks so much for pointing that out. It should be झुकाकर, and not झुककर.. I will correct it.
      I am also pleased that you liked the underlying message…thanks once again!

      Liked by 4 people

  2. प्रत्येक पद का अपना महत्व। बहुत दिनों बाद आपके कलम से एक बेहतरीन रचना निकलती हुई। लाजवाब भाई जी।

    Liked by 5 people

  3. सुना है श्रद्धा हो तो रब
    पत्थर में मिल जाते हैं,
    प्रेम की भाषा इंसां क्या,
    पशु-पक्षी,
    जानवर भी समझ जाते हैं,
    माँ खुश होती,जब बच्चा दूध पी लेता,
    दानी खुश होता जब किसी को कुछ दे देता,
    प्रफुल्लित होती नदियाँ,
    किसी की प्यास मिटाकर,
    झूम उठते वृक्ष,
    किसी को फल खिलाकर,
    हिम ना पिघलता,
    नदियों का कोई वजूद नही होता,
    तुम ना होते,
    इन शब्दों का भी
    कोई मूल्य ना होता,
    पतझड़,मधुमास,पावस,
    आते जाते
    और
    आते जाते,
    दिवस-रात्रि,
    सूर्य और चांद भी,
    रुकता कहाँ कुछ!
    फिर ये तेरी उदासी कैसी?
    ठीक नही ज्यादा बोलना माना मैंने,
    मगर इतनी चुप्पी भी तो ठीक नही,
    हवाओं में घुले मेरे शब्द सुनाई नही दे रहे,
    मगर दिल में उठते ज्वार भाटे की शोर,
    दबाना भी तो ठीक नही,
    देख प्रकृति मुस्कुरा रही,
    हवाएँ सरगम सुना रही,
    चिड़ियों की शोर,
    कभी गोधूलि,कभी भोर,
    तुम्हें जीवन का यथार्थ समझा रही,
    कुछ भी स्थिर नही,
    फिर तुम स्थिर कैसे?
    कभी तो झुकी पलकें उठाकर देखो,
    कभी तो बेतमलब मुस्कुराकर कर देखो,
    कभी तो हमसे कुछ सुनाकर देखो,
    क्या पता
    सूखी नदी को जल स्रोत मिल जाए,
    और हमें हमारा दोस्त,
    जीवन-साथी।
    !!!मधुसूदन!!!

    Liked by 6 people

    1. और ये रहा नहले पे दहला! बहुत उम्दा सरकार🙏
      जितनी तारीफ़ की जाए कम है

      Liked by 3 people

      1. हा हा हा। हम तो खुश हो जाते जब कोई बेहतरीन रचना पढ़ने को मिलती और किसी पद से एक छोटी रचना मेरी भी बन जाती। धन्यवाद आपका।

        Liked by 3 people

  4. बहुत सुंदर कविता सुदर शब्द चयन हिंदी का मान बढ़ाती हुई 🌸❤

    Liked by 2 people

  5. बहुत सुंदर । आप मेरी साइट भी विज़िट कर लाइक और कमेंट कर बताएं कि मेरा प्रयास कैसा है 🙏🙏

    Liked by 2 people

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